सीएम योगी की बायोपिक ‘अजेय’ की रिलीज पर संकट, सेंसर बोर्ड की देरी के खिलाफ निर्माता पहुंचे बॉम्बे हाईकोर्ट। 

Entertainment News: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ अ योगी’ की रिलीज पर संकट मंडरा रहा...

Jul 16, 2025 - 14:02
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सीएम योगी की बायोपिक ‘अजेय’ की रिलीज पर संकट, सेंसर बोर्ड की देरी के खिलाफ निर्माता पहुंचे बॉम्बे हाईकोर्ट। 
सीएम योगी की बायोपिक ‘अजेय’ की रिलीज पर संकट

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ अ योगी’ की रिलीज पर संकट मंडरा रहा है। फिल्म के निर्माता, सम्राट सिनेमैटिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) पर फिल्म, इसके टीजर, ट्रेलर और प्रोमोशनल गाने के सर्टिफिकेशन में देरी करने का आरोप लगाया है। यह फिल्म, जो शांतनु गुप्ता की किताब ‘द मॉन्क हू बिकम चीफ मिनिस्टर’ से प्रेरित है, 1 अगस्त 2025 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। निर्माताओं ने सीबीएफसी के ‘मनमाने, अनुचित और अस्पष्ट’ विलंब के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है। 15 जुलाई 2025 को कोर्ट ने सीबीएफसी को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा, साथ ही अगली सुनवाई 17 जुलाई को तय की। निर्माताओं ने दावा किया है कि इस देरी से उन्हें 30 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हो रहा है, और प्रचार के लिए 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च भी प्रभावित हो सकता है।

फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ अ योगी’ योगी आदित्यनाथ के जीवन और उनके एक साधु से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की यात्रा को दर्शाती है। यह फिल्म शांतनु गुप्ता की किताब पर आधारित है, जिसे मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने आधिकारिक तौर पर समर्थन दिया है। निर्माताओं ने 5 जून 2025 को मुख्य फिल्म, टीजर, ट्रेलर और एक प्रोमोशनल गाने के लिए सर्टिफिकेशन के लिए सीबीएफसी को आवेदन जमा किया था। सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 और सिनेमैटोग्राफ (सर्टिफिकेशन) नियम, 2024 के तहत, सीबीएफसी को आवेदनों की जांच सात दिनों के भीतर और फिल्म की स्क्रीनिंग 15 दिनों के भीतर करानी होती है। हालांकि, निर्माताओं का आरोप है कि सीबीएफसी ने लगभग एक महीने तक कोई कार्रवाई नहीं की।

3 जुलाई को निर्माताओं ने प्राथमिकता योजना के तहत तीन गुना शुल्क देकर दोबारा आवेदन किया, जैसा कि सीबीएफसी अधिकारियों ने सलाह दी थी। इसके तहत 7 जुलाई को स्क्रीनिंग तय हुई, लेकिन 6 जुलाई को इसे बिना किसी कारण के रद्द कर दिया गया। 12 जुलाई को जब निर्माताओं ने आवेदन की स्थिति जांची, तो उसे ‘अपूर्ण’ दिखाया गया, जिसमें ‘डॉक्यूमेंट्री साक्ष्य प्रदान करें’ जैसा अस्पष्ट टिप्पणी थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन से दस्तावेज चाहिए। निर्माताओं का कहना है कि सीबीएफसी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) की मांग की, जो सिनेमैटोग्राफ एक्ट या इसके नियमों में अनिवार्य नहीं है।

निर्माताओं ने अपनी याचिका में कहा कि यह मांग ‘त्रुटिपूर्ण और निराधार’ है और रिलीज में देरी का एक बहाना है। उन्होंने दावा किया कि इस देरी से उनके प्रचार के प्रयास रुक गए हैं, जिससे बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान हो रहा है। फिल्म में पहले से ही 30 करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है, और प्रचार के लिए 10 करोड़ रुपये और खर्च होने हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस नीला गोखले शामिल हैं, ने सीबीएफसी को दो दिन में जवाब देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि सीबीएफसी को कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर सर्टिफिकेट जारी करना अनिवार्य है और वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।

सीबीएफसी, जिसे सेंसर बोर्ड के नाम से भी जाना जाता है, भारत में फिल्मों को सिनेमाघरों में रिलीज करने से पहले सर्टिफिकेशन प्रदान करता है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि फिल्में कानून और सामाजिक मानदंडों के अनुरूप हों। हालांकि, हाल के वर्षों में सीबीएफसी पर कई बार मनमानी और देरी के आरोप लगे हैं, खासकर उन फिल्मों के लिए जो राजनीतिक या सामाजिक रूप से संवेदनशील मानी जाती हैं। ‘अजेय’ का मामला भी ऐसा ही है, क्योंकि यह एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती, योगी आदित्यनाथ, के जीवन पर आधारित है।

निर्माताओं ने दावा किया कि जिस किताब पर यह फिल्म आधारित है, उसे मुख्यमंत्री कार्यालय ने समर्थन दिया है, फिर भी सीबीएफसी ने एनओसी की मांग की। यह मांग न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या सेंसर बोर्ड राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने इस देरी को राजनीतिक साजिश करार दिया। एक एक्स पोस्ट में लिखा गया, “सीएम योगी की बायोपिक को रोकने की कोशिश हो रही है। सेंसर बोर्ड को जल्दी फैसला लेना चाहिए।” हालांकि, इस तरह की टिप्पणियां सट्टा हैं और इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

सीबीएफसी का इतिहास विवादों से भरा रहा है। 2016 में फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ के मामले में सेंसर बोर्ड ने 94 कट्स की मांग की थी, जिसमें ड्रग्स और पंजाब से जुड़े संदर्भ हटाने की बात थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब हस्तक्षेप करते हुए फिल्म को केवल एक कट के साथ रिलीज की अनुमति दी थी। इसी तरह, 2024 में कंगना रनौत की फिल्म ‘इमरजेंसी’ को भी सेंसर बोर्ड की देरी और कट्स की मांग का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद निर्माताओं को कोर्ट का रुख करना पड़ा। इन मामलों से पता चलता है कि सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और समयबद्धता की कमी एक बार-बार उठने वाली समस्या है।

‘अजेय’ के मामले में निर्माताओं का कहना है कि सेंसर बोर्ड की देरी न केवल उनके वित्तीय हितों को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता को भी प्रभावित कर रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2016 में ‘उड़ता पंजाब’ केस में कहा था कि दर्शकों को बच्चों की तरह नहीं माना जा सकता और रचनात्मक स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। इस मामले में भी कोर्ट ने सीबीएफसी को अपनी जिम्मेदारी निभाने की याद दिलाई है।

‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ अ योगी’ योगी आदित्यनाथ के जीवन की कहानी को दर्शाती है, जो एक साधु से भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक के मुख्यमंत्री बने। उनकी यह यात्रा न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। फिल्म का टीजर पहले ही रिलीज हो चुका है, जिसने दर्शकों में उत्साह पैदा किया है। हालांकि, इसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों के कारण इसे संवेदनशील माना जा रहा है।

निर्माताओं का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व और उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी को सामने लाना है। लेकिन सेंसर बोर्ड की देरी ने इसके रिलीज शेड्यूल को खतरे में डाल दिया है। अगर 1 अगस्त तक सर्टिफिकेशन नहीं मिलता, तो फिल्म की रिलीज टल सकती है, जिससे प्रचार और वितरण योजनाएं प्रभावित होंगी।

इस मामले ने सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी है। कुछ लोग इसे सेंसर बोर्ड की नाकामी मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक दबाव का नतीजा बता रहे हैं। एक यूजर ने एक्स पर लिखा, “योगी जी की बायोपिक को रोकने की कोशिश क्यों हो रही है? सेंसर बोर्ड को पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए।” दूसरी ओर, कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह फिल्म किसी खास एजेंडे को बढ़ावा देने की कोशिश है। हालांकि, ये दावे सट्टा हैं और इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ अ योगी’ की रिलीज में देरी का मामला सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली और रचनात्मक स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है। सम्राट सिनेमैटिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी याचिका में साफ कहा है कि सीबीएफसी की मनमानी और एनओसी की अवैध मांग से उन्हें भारी नुकसान हो रहा है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और 17 जुलाई को अगली सुनवाई में सीबीएफसी से जवाब मांगा है। यह मामला न केवल इस फिल्म की रिलीज के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भविष्य में सेंसर बोर्ड की जवाबदेही और पारदर्शिता को भी प्रभावित कर सकता है। योगी आदित्यनाथ जैसे प्रमुख नेता की बायोपिक होने के नाते यह फिल्म पहले से ही चर्चा में है, और कोर्ट का फैसला इसके भविष्य को तय करेगा।

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