स्थानीय लैब में पास 4 सडकों के नमूने फेल, 60 करोड़ की निर्माणाधीन सड़कों में भारी घोटाला
धानमंत्री सड़क योजना में भी अब तक 362 .621 किलोमीटर सड़कों का निर्माण करवाया गया, जिस पर 18822 लाख रुपये की धनराशि व्यय की जा चुकी है। इतनी भारी भरकम धनराशि खर्च करने वाले विभाग के जिम्मेदारों ने इन कार्यों की गुणव...
By INA News Hardoi.
60 करोड़ की लागत से बनने वाली जिन चार मार्गों के नमूने शासन स्तर से लैब में कराई गई जांच में फेल हुए वह सब स्थानीय लैब में पास दिखाए गए थे। इसमें एक अधीक्षण अभियंता, दो अधिशासी अभियंता समेत 16 अभियंता निलंबित तो हुए, लेकिन इससे कमीशन के खेल की पोल खोल दी है। स्थानीय लैब में कोई नमूने फेल नहीं हुए। वित्तीय वर्ष 2023-24 में लोक निर्माण विभाग ने जनपद में 1164.80 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण कराया, इस पर लगभग 152217 लाख रुपये व्यय किए गए। 552.97 किलोमीटर अन्य जिला मार्ग, एमडीआर एवं राज्य मार्गों सड़कों की मरम्मत पर भी 10699 लाख रुपये की धनराशि व्यय की गई।
प्रधानमंत्री सड़क योजना में भी अब तक 362 .621 किलोमीटर सड़कों का निर्माण करवाया गया, जिस पर 18822 लाख रुपये की धनराशि व्यय की जा चुकी है। इतनी भारी भरकम धनराशि खर्च करने वाले विभाग के जिम्मेदारों ने इन कार्यों की गुणवत्ता जांचने के लिए कभी भी थर्ड पार्टी जांच नहीं करवाई। अपने निजी हित साधते हुए अपने चहेते ठेकेदारों की जांच के लिए विभागीय जांच और विभागीय लैब पर ही निर्भर रहे। लोक निर्माण विभाग की सड़कों में काले तालकोल का खेल किसी से छिपा नहीं है। सबसे खास बात तो यह कि विभागीय अधिकारी इस खेल में पूरी तरह से शामिल होकर हकीकत पर पर्दा डाले रहते हैं। शासन स्तर से हुई कार्रवाई इसकी गवाही दे रही है।
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विभागीय अधिकारियों की मानें तो बीते वित्तीय वर्ष में एक हजार किलोमीटर से अधिक नवनिर्मित सड़कों और मरम्मत की गई सड़कों के सैंकड़ों नमूने लिए गए पर जांच में एक नमूना भी फेल नहीं पाया गया। मामूली कमी मिली भी तो अधिकारियों ने मानक के अनुसार सड़क बनवाने की औपचारिकता पूरी करने के लिए दिशा निर्देश दिए और भूल गए। छोटी मोटी कटौती अथवा जुर्माना को छाेड़ दिया जाए तो विभागीय अधिकारियों ने किसी भी ठेकेदार पर कभी भी भारी भरकम जुर्माना नहीं लगाया। अपनी लैब और अपने अधिकारियों पर भरोसा करने वाले ठेकेदार इस कृपा के बदले अधिकारियों को उपकृत करते रहे और जम कर मनमानी की जाती रही। जानकारों का कहना है कि शासन ने तो चार सड़कों की जांच कराई तो हकीकत सामने आ गई।
ऐसे न जाने किती सड़कों में किया गया होगा। 16 अभियंताओं के निलंबन के बाद एक अवर अभियंता के रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार होने के बाद विभाग चर्चा में है। जनपद की सड़कों की हालत किसी से छिपी नहीं है। राज्यमार्ग, अन्य जिला मार्ग की हालत तो खराब है ही, ग्रामीण सड़कों का हाल उससे भी अधिक खराब है। आए दिन सड़क मार्गों के बनने के साथ ही खराब होने के आरोप लगते रहते हैं। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है, सड़कों की मरम्मत, नवीनीकरण एवं निर्माण के नाम पर लोक निर्माण विभाग के जिम्मेदार एवं ठेकेदार सरकारी धनराशि का किस तरह से वारा न्यारा कर रहे हैं। नियमों को दरकिनार कर गुणवत्ताहीन कार्य से जहां प्रत्येक वर्ष सरकार को करोड़ों का चूना लग रहा है, वहीं आम जन मानस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मानक के अनुरूप निर्माण सामग्री न लगाने से सड़कें गुणवत्ताहीन बन रही हैं, वहीं सड़कों कुछ महीनों में ही दम निकलना शुरू हो जाता है।
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वहीं ठेकेदारों का कहना है, अनुमानित बजट से दस से 15 प्रतिशत तक कम धनराशि का टेंडर भरते हैं। 12 से 15 प्रतिशत विभागीय अधिकारियों को बतौर कमीशन देना होता है। सारे खर्च जोड़ लें तो काम करवाने के लिए 50 प्रतिशत धनराशि ही बचती है। जांच के आधार पर मेसर्स प्रोग्रेसिव कंस्ट्रक्शन कंपनी, मेसर्स इंडिया कंस्ट्रक्शन, मेसर्स सायरन इंफ्रा, मेसर्स ओम प्रकाश चौबे पर 30 करोड़ रुपये की सरकारी धनराशि के दुरुपयोग की वसूली के निर्देश दिए गए हैं। अधीक्षण अभियंता, दो अधिशासी अभियंता सहित लोक निर्माण विभाग के 16 कर्मचारियों का निलंबन किया जा चुका है। जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने बताया कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता के साथ कोई समझौता बर्दाश्त नहीं है।
स्थानीय स्तर से सड़कों की जांच कराई जाती है, जिसमें कार्रवाई भी होती। शासन स्तर से जो रिपोर्ट मांगी गई थी, उसे विधिवत जांच कराकर दिया गया था। अगर किसी भी विभाग में भ्रष्टाचार की शिकायत मिली तो इसी प्रकार की कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री के निर्देश पर जनपद की की चार सड़कों की जांच की गई थी, अनियमितता पाए जाने पर फर्मों से 30 करोड़ की वसूली के निर्देश जारी किए जा चुके हैं। 35 करोड़ की लागत से बनने वाली सांडी शाहाबाद, तीन करोड़ की हरदोई सांडी, 21 करोड़ की बेहटा मंसूरनगर, 2.5 करोड़ की मंझोला खटेली मार्ग की जांच रिपोर्ट में लगभग 50 प्रतिशत धनराशि की अनियमितता पाई गई है। ऐसा नहीं है, कि लोक निर्माण विभाग के जिम्मेदारों को विभागीय जांच में कमी नहीं मिली।
कमी पाई गई तो वो ठेकेदारों और अधीनस्थ कर्मचारियों अधिकारियों के उत्पीड़न का जरिया बन कर रह गई। विभागीय जिम्मेदारों के अनुसार जब कभी भी सड़कों की गुणवत्ता की जांच की गई तो कमिया पाए जाने पर उच्चाधिकारियों ने अपने अधीनस्थों को कार्रवाई का डर दिखा कर दबाव में लाना शुरू कर दिया। ठेकेदारों व अधीनस्थों को डरा धमका कर विभागीय जिम्मेदारों ने जेब भरी, और फेल नमूने पास दिखा दिए गए। इसकी पोल तब खुली जब मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार की भनक लगी और उनके निर्देश पर सड़कों की उच्च स्तरीय अधिकारियों की उपस्थिति में जांच करवाई गई। जिस सड़क का भी सैंपल लिया गया वो फेल पाया गया।
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