नेपाल में 48 घंटों का अभूतपूर्व संकट- सोशल मीडिया बैन से हिंसा और सत्ता परिवर्तन तक
8 सितंबर 2025 को काठमांडू की सड़कों पर हजारों युवा, जिनमें ज्यादातर जनरेशन जेड (1995-2010 के बीच जन्मे) के लोग शामिल थे, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने उतरे। ये प्र
पिछले 48 घंटों में नेपाल ने एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व संकट का सामना किया, जो सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध से शुरू होकर हिंसा, अराजकता और सत्ता परिवर्तन तक पहुंच गया। 4 सितंबर 2025 को नेपाल सरकार द्वारा 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे फेसबुक, यूट्यूब, और एक्स, पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया। यह प्रतिबंध कथित तौर पर इन प्लेटफॉर्म्स के नए पंजीकरण नियमों का पालन न करने के कारण लगाया गया था। हालांकि, इस कदम को जनता, खासकर युवाओं ने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना। इसके परिणामस्वरूप, 8 सितंबर 2025 को काठमांडू और अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जो जल्द ही हिंसक हो गए। इन दो दिनों में संसद भवन में आगजनी, मंत्रियों के घरों पर हमले, जेल से कैदियों की फरारी, हवाई अड्डे का बंद होना और अंततः प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का इस्तीफा जैसे घटनाक्रम देखने को मिले। यह अवधि नेपाल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और अशांत अध्याय के रूप में दर्ज हो गई।
8 सितंबर 2025 को काठमांडू की सड़कों पर हजारों युवा, जिनमें ज्यादातर जनरेशन जेड (1995-2010 के बीच जन्मे) के लोग शामिल थे, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने उतरे। ये प्रदर्शनकारी न केवल सोशल मीडिया बैन के खिलाफ थे, बल्कि सरकार पर भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और आर्थिक अवसरों की कमी के आरोप भी लगा रहे थे। प्रदर्शनकारियों के नारे जैसे “सोशल मीडिया नहीं, भ्रष्टाचार बंद करो” और “युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ” ने उनकी नाराजगी को साफ जाहिर किया। काठमांडू में संसद भवन के पास स्थिति तब बिगड़ गई, जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़कर संसद परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछार, रबर की गोलियां, आंसू गैस और यहां तक कि गोलीबारी का सहारा लिया। इस हिंसक झड़प में कम से कम 19 प्रदर्शनकारी मारे गए और 400 से अधिक घायल हो गए। राष्ट्रीय ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख डॉ. बद्री रिसाल ने बताया कि कई घायलों की हालत गंभीर थी, क्योंकि उन्हें सिर और छाती पर गोलियां लगी थीं।
प्रदर्शनकारियों ने न केवल संसद भवन को निशाना बनाया, बल्कि सिंगदरबार, जो नेपाल का केंद्रीय प्रशासनिक परिसर है, को भी आग के हवाले कर दिया। हिंसा काठमांडू तक सीमित नहीं रही; रूपंदेही और पोखरा जैसे शहरों में भी प्रदर्शन और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए काठमांडू और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया और स्कूलों को बंद करने का आदेश दिया। इसके बावजूद, प्रदर्शनकारियों का गुस्सा कम नहीं हुआ।
8 सितंबर की रात को आपातकालीन कैबिनेट बैठक के बाद गृहमंत्री रमेश लेखक ने हिंसा की “नैतिक जिम्मेदारी” लेते हुए इस्तीफा दे दिया। उसी रात सरकार ने सोशल मीडिया बैन को हटाने की घोषणा की, और 9 सितंबर की सुबह तक फेसबुक, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स फिर से उपलब्ध हो गए। हालांकि, इस कदम से प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। 9 सितंबर को हिंसा और बढ़ गई। प्रदर्शनकारियों ने मंत्रियों और पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों को निशाना बनाया। पूर्व प्रधानमंत्री झाला नाथ खनाल की पत्नी रबी लक्ष्मी चित्रकार की मृत्यु तब हो गई, जब उनके घर पर आगजनी के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गईं।
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के घर पर भी हमला हुआ, जहां प्रदर्शनकारियों ने खिड़कियां तोड़ीं, फर्नीचर को उलट-पुलट किया और परिसर में आग लगा दी। स्थिति बेकाबू होने पर ओली ने 9 सितंबर को अपने इस्तीफे की घोषणा की और वह काठमांडू के पास शिवपुरी में एक सैन्य बैरक में शरण लेने के लिए भाग गए। प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन और राष्ट्रपति भवन को भी आग लगाई, जिससे काठमांडू में घना धुआं छा गया। इस बीच, त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया, और सेना ने इसका नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
हैरानी की बात यह थी कि हिंसा के दौरान जेलों से कैदियों के फरार होने की खबरें भी सामने आईं। कुछ स्रोतों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने जेलों पर हमला किया और कई कैदियों को रिहा कर दिया, जिससे अराजकता और बढ़ गई। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी। संयुक्त राष्ट्र की नेपाल में रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर हाना सिंगर-हैम्डी ने स्थिति को “नेपाल के लिए असामान्य” बताया और घायलों के लिए तत्काल चिकित्सा सुविधा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।
इस संकट की जड़ें केवल सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं थीं। नेपाल की आर्थिक स्थिति, जहां प्रति व्यक्ति आय केवल 1,447 डॉलर है और युवा बेरोजगारी 20 प्रतिशत से अधिक है, ने जनता, खासकर युवाओं, में गहरी निराशा पैदा की थी। सोशल मीडिया पर “नेपो किड” ट्रेंड, जिसमें नेताओं और उनके परिवारों की अय्याशी को निशाना बनाया गया, ने इस गुस्से को और भड़काया। नेपाल की औसत आयु 25 वर्ष है, और युवा आबादी, जो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा उपयोग करती है, ने इस प्रतिबंध को अपनी आवाज दबाने की कोशिश के रूप में देखा।
प्रधानमंत्री ओली ने अपने इस्तीफे से पहले एक जांच समिति गठित करने की घोषणा की, जो 15 दिनों के भीतर हिंसा के कारणों की जांच करेगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुझाव देगी। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे और घायलों के लिए मुफ्त इलाज की भी घोषणा की। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनका आंदोलन केवल सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं है; वे भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और आर्थिक असमानता के खिलाफ लड़ रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने तो ओली के इस्तीफे को भी नाकाफी बताया और कठोर कार्रवाई की मांग की।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस संकट पर चिंता जताई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पुलिस द्वारा गोलीबारी की निंदा की और पारदर्शी जांच की मांग की। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ, स्थिति पर नजर रख रही हैं और जरूरत पड़ने पर सहायता प्रदान करने को तैयार हैं। इस बीच, कुछ स्रोतों ने नेपाल में राजशाही की वापसी की मांग को भी उभरते हुए बताया, जो इस संकट को और जटिल बनाता है।
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