Hardoi News: हरदोई खण्ड शारदा नहर के 100 वर्ष पूर्ण होने पर शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन।
प्रथम सत्र में उपस्थित विषेशज्ञों द्वारा कृषि एवं सिंचाई से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी....
हरदोई। सिंचाई विभाग के अन्तर्गत हरदोई खण्ड शारदा नहर के 100 वर्ष पूर्ण होने पर कैनाल कालोनी प्रागंण में शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत अखिलेश कुमार गौतम अधिशासी अभियन्ता, खण्ड शारदा नहर द्वारा शताब्दी वर्ष समारोह में मुख्य अतिथि अखिलेश कुमार प्रमुख अभियन्ता एवं विभागाध्यक्ष सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग उ०प्र० लखनऊ, महेश्वरी प्रसाद मुख्य अभियन्ता स्तर-1 रूहेलखण्ड बरेली, एच०एन० सिंह मुख्य अभियन्ता (शारदा) बरेली, अमर कुमार सेवानिवृत्त मुख्य अभियन्ता स्तर-1, नीलेश जैन अधीक्षण अभियन्ता, एस०के० झा० अधीक्षण अभियन्ता, एस०एन० शर्मा अधीक्षण अभियन्ता, आर0के0 वर्मा अधीक्षण अभियन्ता, ओ0पी0 वर्मा अधीक्षण अभियन्ता व अन्य अतिथियों को पगड़ी पहनाकर, अंग वस्त्र व पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया।
मुख्य अतिथि अखिलेश कुमार, प्रमुख अभियन्ता एवं विभागाध्यक्ष सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ माँ सरस्वती व इं० विश्वेश्वरैया के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। तत्पश्चात् राजकीय इण्टर कालेज हरदोई की छात्राओं द्वारा अत्यन्त भावपूर्ण रूप माँ शारदे की वंदना प्रस्तुत की।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में उपस्थित विषेशज्ञों द्वारा कृषि एवं सिंचाई से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी। कमरेन्द्र कुमार अग्रवाल, अधीक्षण अभियन्ता द्वारा बताया गया कि कैसे नहरों पर सोलर सिस्टम लगाकर बिजली की समस्या का समधान किया जा रहा है व घरेलू सोलर सिस्टम किस प्रकार आपकी बिजली की जरूरत को पूरा कर सकता है तथा सोलर ऊर्जा के सम्बन्ध में उपस्थित लोगों से संवाद किया।
सुन्दर राव ने केन्द्र-धुरी सिंचाई (पिवोट सिंचाई सिस्टम) पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह स्प्रिंकलर सिंचाई की तरह लगभग 90 प्रतिशत तक पानी का प्रयोग फसल के लिए करता है किन्तु स्प्रिंकलर सिस्टम से लगभग 90 प्रतिशत तक सस्ता है। केन्द्र धुरी सिंचाई (पिवोट सिस्टम) एक बार लगाने के बाद लगभग 20 से 25 वर्ष तक काम करता है। सिंचाई की इस पद्धति की शुरूआत सन् 1950 में हुई थी। आई0आर0आई0 के सेवानिवृत्त अनुसंधान अधिकारी ए०सी० पाण्डेय द्वारा नहर की संरचना व बनावट की तकनीकी जानकारी देते हुए नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्रफल बढ़ाने के विषय में जानकारी साझा की।
इस अवसर पर कृषकों को अधिक से अधिक सिंचाई का लाभ देने व हर खेत तक पानी पहुँचाने के उद्देश्य से नई पहल करते हुए 49 सिंचाई मित्रों (अवैतनिक) के मनोनयन की घोषणा की। सिंचाई विभाग के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए अधिशासी अभियन्ता अखिलेश गौतम द्वारा अवगत कराया गया सूखे एवं सिंचाई को दृष्टिगत 1856-57 में कैनाल निर्माण कार्य करने की परिकल्पना की गयी। शारदा नदी हिमालय के उच्च शिखरों से निकल कर चम्पावत जनपद की टनकपुर मण्डी के समीप मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। इस नदी के जल को सिंचाई हेतु प्रयोग में लाने के लिए सर्वप्रथम 1856-57 में मद्रास इंजीनियर कोर के लैफ्टीनेन्ट एण्डरसन ने सर्वेक्षण किया था।
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किन्तु वर्ष 1857 के विद्रोह में उनका समस्त अभिलेख गुम हो गया। सौभाग्यवश उनकी डायरी सुरक्षित बच गई जिससे वर्श 1867 में कैप्टन फॉरवेस ने सर्वेक्षण कार्य को आगे चलाया। इस परियोजना पर वर्ष 1920 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् सर बरनार्ड डायरले द्वारा कार्य प्रारम्भ किया गया। बनबसा के निकट शारदा नदी का अधिकाश भाग नेपाल सीमा में आता था, अतः शारदा बैराज तथा नदी नियन्त्रण कार्यों के निर्माण हेतु नेपाल दरबार से 2009 एकड भूमि ली गयी थी। इसके बदले नेपाल दरबार को बहराइच में लगभग इतनी ही भूमि दी गयी तथा सिंचाई विभाग हेतु बनबसा बैराज से कुछ पानी देना भी निश्चित किया गया।
इस बैराज के निर्माण में प्रारम्भ से ही अत्यन्त कठिनाइयाँ आई क्योंकि यहाॅ की जलवायु अत्यन्त खराब थी।खराब जलवायु के कारण अच्छे ठेकेदार काम करने से कतराते थे क्योंकि शुरू में बाहर से आने वाली लेबर बुखार आने पर ही कार्य छोड़ देती थी, जिससे लेबर को दी गयी पेशगी मरने से ठेकेदारों के कार्यों को नुकसान हुआ साथ ही डाकुओं के गैंग तथा दुर्दान्त भान्तु भी समय-समय पर ठेकेदारों की पसीने की कमाई लूट लेते थे। 8 वर्ष के निर्माण काल में लगभग 1000 व्यक्तियों ने इस परियोजना के निर्माण में अपनी जानें गँवाई ।
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