विशेष खबर: सई ( भैसटा) न सह सकी कलियुग के 'पाप', राम को पवित्र करने वाली सई (भैसटा) नदी के अस्तित्व पर खतरा।

By INA News Desk
Jun 24, 2024 - 12:43
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विशेष खबर: सई ( भैसटा) न सह सकी कलियुग के 'पाप', राम को पवित्र करने वाली सई (भैसटा) नदी के अस्तित्व पर खतरा।
पिहानी की सई भैसटा नदी भीषण गर्मी में सूख गई
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  • नवनीत कुमार राम जी (भीषण गर्मी में नदियों के सूखने पर विशेष खबर)

बुंदेलखंड में पानी पर सियासत तो खूब हो रही, पर सरकार के 'पड़ोस' पिहानी क्षेत्र के सराबर में एक नदी दम तोड़ गई उसका मातम नहीं दिखता। धर्म ग्रंथों में जिस सई नदी का वर्णन त्रेता फिर द्वापर की चर्चा में हुआ वह अब कलियुग में काल कलवित हो गई।

पवित्र गंगा से तुलना तो नहीं की जा सकती लेकिन सई का ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व कम नहीं है। नदी से नाला बन चुकी सई कुछ दिन बाद मात्र इतिहास रह जाएगी। वन से वापस आते हुए भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने जिस सई नदीं में स्नान कर रावण से युद्ध में गलतियों से अपने को पवित्र किया, वह अपनी पवित्रता स्वच्छता ही नहीं अस्तित्व खोने के कगार पर है।

कई सौ एकड़ जमीन को सिंचित और उपजाऊ बनाने वाली इस नदी को बचाने के लिए आवाज जरूर उठी लेकिन चर्चा मात्र बाढ़ के लिए हुई। रमन जयतेयुगों-युगों तक जिस सदानीरा ने पीढि़यों को पाला वही उसके काल का कारण बन गईं। किनारे के जंगलों की कटान, झाबरों पर हुए कब्जों ने उस नदी की सांसें छीन लीं जिनका नमन भगवान राम तक ने किया। जिसके जल से हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को ¨सचित किसान सोना उपजाते रहे उसकी धारा तक के लिए उन्होंने जमीन नहीं छोड़ी, धारा को समेट वहां भी खेत काट लिये।

हरदोई के  पिहानी विकासखंड के उचौलिया  सल्लिया सरावर गांव  की दहर झील और लखीमपुर जिले के एक-एक स्त्रोत से आई सई नदी हरदोई, उन्नाव, लखनऊ, रायबरेली, प्रतापगढ़ होकर जौनपुर के राजेपुर में गोमती नदी में जाकर मिली। करीब 750 किमी. लंबी सई नदी दो दशक पूर्व तक सदानीरा और निर्मल थी। जेठ की भीषण गर्मी में भी लबालब नदी रही। तभी सालों साल नदी क्षेत्र के किसान भरपूर फसल लेते रहे। नतीजा जिस नदी के जल से भगवान राम ने आचमन किया आज उसमें बूंद पानी नहीं।

चुनाव में बनारस गए मोदी को सत्ता का आशीर्वाद मिला तो उनकी सरकार मां गंगा को निर्मल करने में जुट गई। गंगा को निर्मल करने को सरकार ने मंत्रालय तक गठित किया। तमाम संगठन भी गंगा को अविरल, निर्मल बनाने का अभियान चलाकर हित साध रहे हैं।

तो सूबे की समाजवादी सरकार नदी सफाई में केंद्र को आइना दिखाने को गोमती नदी जीवन देने में लग गई। दोनों ही सरकारों को उस सई की याद नहीं जिसका उल्लेख रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने वनवास के बाद माता सीता और लक्ष्मण के साथ भगवान राम के अयोध्या जाने के प्रसंग में लिखा है कि 'सई उतर गोमती नहाये, चौथे दिवस अवधपुर आये'।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के श्लोक गोमती चापयती क्रमय राघव: शीघ्र गैर्ह में मयूर हंसा भिरूता ततार स्यन्दिका नदीम'' के जरिए सई का उल्लेख है। शिव पुराण में भी नदी के उल्लेख का दावा जानकार करते। रामेश्वरम के बाद श्रीराम द्वारा पूजित आठ शिवालय भी नदी के किनारे होने की मान्यता है। त्रेता युग से पहले के पौराणिक इतिहास की गवाह सई नदी के लिए कुछ करना तो सरकारों को शायद इसके महत्व का भी पता न होगा।

कोख में हो रही खेती

युगों-युगों से सदानीरा सई के हालात बिगड़े तो नदी किनारे के जंगलों की कटान और झाबरों पर खेती के लिए पट्टे हो जाने के बाद। मैदानी नदी में पानी के इन स्त्रोतों के उजड़ने से पानी कम तो हुआ पर धारा तब भी नहीं टूटी। हालात बिगड़े तब जब तलहटी में भी खेती होने लगी, इससे नदी में बने प्राकृतिक जल स्त्रोत बंद हो गए। खेतों की जुताई और परेवट के चलते पाताल से नदी को मिलने वाले पानी का मार्ग अवरुद्ध हो गया। नतीजा नदी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी।

प्यास से मर रहे वन्य जीव

नदी के किनारे के गांवों के बुजुर्ग कहते हैं कि दो दशक पूर्व तक किनारे के जंगलों में रहने वाले वन्य जीव नदी के जल पर आश्रित थे। पिछले साल तक गनीमत थी नदी में बने गड्ढों में भरे पानी से वन्य जीवों की प्यास बुझ रही थी। इस साल नदी बिल्कुल ही सुध जाने से वन्य जीव प्यास से मर रहे हैं। पिहानी के जंगलों तो वन्य जीवों के अवशेष ग्रामीणों को दिख जाते।

जंगलों की कटान से सूखे जलस्त्रोत

सदियों से मैदानी नदी को मिलने वाले जल में उसके किनारे के जंगलों का भी विशेष योगदान रहा। घने जंगलों में रुका वर्षा जल पेड़ों के जड़ों के मार्फत नदी को पानी मुहैया कराते रहे। पर दो दशक में हुए अवैध कटान ने नदी किनारे के जंगलों को लगभग खत्म ही कर दिया। आसपास पेड़ नहीं रहे तो नदी को मिलने वाला 'अमृत' भी सूख गया।

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