Special Article: नववर्ष उत्सव- देसी बनाम विदेशी कैलेंडरों का ऐतिहासिक संदर्भ।

विश्व के पाश्चात्य देशों की भाँति भारतवर्ष में भी जॉर्जियाई ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष पड़ने वाले 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष का स्वागत

Jan 1, 2026 - 11:48
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Special Article:  नववर्ष उत्सव- देसी बनाम विदेशी कैलेंडरों का ऐतिहासिक संदर्भ।
नववर्ष उत्सव- देसी बनाम विदेशी कैलेंडरों का ऐतिहासिक संदर्भ।
लेखक - विवेकानंद सिंह
               बलिया, उत्तर प्रदेश

विश्व के पाश्चात्य देशों की भाँति भारतवर्ष में भी जॉर्जियाई ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष पड़ने वाले 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष का स्वागत करते हुए नववर्ष का उत्सव मनाने की परम्परा क़ायम है। यद्यपि आज भी विश्वभर में कई ऐसे देश हैं, जहाँ यह रिवाज़ नहीं है, जैसे चीन, ईरान, नेपाल इथियोपिया, थाइलैंड, श्रीलंका, वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान, ताजिकिस्तान, कुर्दिस्तान, अज़रबैजान, तुर्कमेनिस्तान आदि देशों में नववर्ष अपने स्थानीय कैलेंडर के अनुसार मनाने की परम्परा है।
अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि आख़िर स्थानीय कैलेंडर और ग्रेगोरियन कैलेंडर में क्या अंतर है? ग्रेगोरियन कैलेंडर की स्थापना कब हुई? इसके पहले यूरोप में कौनसा कैलेंडर प्रचलित था? भारत में ग्रेगोरियन कैलेंडर कब आया? हमारे देश में कौन-कौन सा कैलेंडर प्रचलन में है और भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर क्या है? 
वाराणसी स्थित बीएचयू के भूगोल विभाग से सेवानिवृत्त हुए प्रो. राणा पी. बी. सिंह ने बताया कि वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही ईसाईधर्म के चर्चों में प्राचीन जूलियन कैलेंडर का प्रचलन है और यदि हम भारत में प्रचलित स्थानीय कैलेंडरों की बात करें तो इसमें प्रमुख रूप से विक्रम संवत् (२०८२); कल्पाद् वर्ष (१,९५५,८८५,१२६); भगवान् श्रीराम संवत्सर (७१३९); भगवान् श्रीकृष्ण संवत्सर (५२५१); कलि युगाब्द (५१२७); कोषुर सप्तर्षि काश्मीर वर्ष (५१०१); महावीर जैन संवत् (२६४०); बुद्ध संवत् (२५६९); शालिवाहन सौर शक् (१९४७); बंगला-फसली वर्ष (१४३२); इस्लामी हिजरी (१४४७); तमिल कैलेंडर; कोल्लम वर्षम; तेलुगु और कन्नड़ कैलेंडर; मीतेई कैलेंडर; नानकशाही कैलेंडर आदि कैलेंडर प्रचलन में हैं। 
रोम के अलावा अन्य यूरोपीय देशों में पहले रोमन जूलियन कैलेंडर का प्रयोग होता था, जो रोमन सम्राट जूलियस सीज़र के आदेशानुसार 01 जनवरी, 45 ईसापूर्व को लागू हुआ था, लेकिन इसमें कई एक गणितीय त्रुटियां थीं, जिसे रोम स्थित कैथोलिक चर्च के प्रमुख, पोप ग्रेगरी XIII ने 1582 में सुधारा और एक नया कैलेंडर पेश किया, जिसे ग्रेगोरियन कैलेंडर के नाम से जाना जाता है। 
 
 कुछ धार्मिक अड़चनों के चलते इंग्लैंड और उसके तमाम उपनिवेशों, यानी भारत, अमेरिका आदि देशों में ग्रेगोरियन कैलेंडर को सितंबर 1752 में लागू किया गया। भारतवर्ष में पहली बार यह कैलेंडर आधिकारिक रूप से उस समय की राजधानी, कलकत्ता (अब कोलकाता) के फोर्ट विलियम में आया और फिर इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया, लेकिन देश की स्वतंत्रता के बाद कैलेंडर सुधार समिति, जिसकी अध्यक्षता, खगोलविद् मेघनाद साहा कर रहे थे, ने 22 मार्च 1957 को आधिकारिक तौर पर शक संवत् को भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अंगीकार किया गया, जिसकी स्थापना 78 ईस्वी में हुई थी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि भारतीय हिंदू समाज अपने तमाम धार्मिक अनुष्ठान, तीज-त्योहार तथा हर प्रकार के मांगलिक आयोजनों के लिए 57 ईसापूर्व में उज्जैन नरेश, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा लागू किए गए विक्रम संवत् पर निर्भर है, गुजरात में इस संवत् का प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से और उत्तरी भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है।
अब यहाँ पेंच यह है कि हम भारतीय किस दिन अपना नववर्ष उत्सव मनाएं? 01 जनवरी को या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को? तो देखिए! भारत के राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी एक कविता में इस विषय पर क्या लिखा है? 
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्योहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं।
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है।
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है।.........
 
प्रो. राणा पी. बी. सिंह के कथनानुसार हम भरतवंशियों को अपनी सनातन संस्कृति के रक्षार्थ ग्रेगोरियन कलेंडर द्वारा प्रेरित एवं प्रतिपादित, अंग्रेज़ो द्वारा प्रसारित व अनुमोदित, आंग्ल नववर्ष के बदले अपने स्थानीय कैलेंडर के प्रथम दिवस को अपना नववर्ष उत्सव मनाना चाहिए, क्योंकि माँ भारती की यही पुकार - चलो रचे अपना नव-संसार।

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