Deoband : सुप्रीम कोर्ट के हाईकोर्ट में जाने के निर्देश देना न्यायप्रिय लोगों के लिए निराशाजनक- मदनी
कहा कि ऐसे मामले जिनका संबंध हेट स्पीच, सांप्रदायिकता और किसी वर्ग के जीवन के अधिकार से हो उनमें सुप्रीम कोर्ट से कठोर और स्पष्ट कदम उठाने बल्कि स्वयं संज्ञान लेने (सुओ-मोटो) की कार्रवा
देवबंद। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष व पूर्व राज्यसभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के भड़काऊ भाषण और कृत्य के मामले में दायर की गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाईकोर्ट जाने के निर्देश दिए जाने और टिप्पणी पर गहरी चिंता जताई है। मौलाना महमूद मदनी की ओर से मंगलवार को जारी बयान में दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई को लेकर कहा कि यह न्यायप्रिय लोगों के लिए निराशाजनक रवैया है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 को डॉ. बीआर आंबेडकर ने संविधान का दिल और आत्मा बताया था। यह नागरिकों को अपने मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करने का अधिकार देता है।
कहा कि ऐसे मामले जिनका संबंध हेट स्पीच, सांप्रदायिकता और किसी वर्ग के जीवन के अधिकार से हो उनमें सुप्रीम कोर्ट से कठोर और स्पष्ट कदम उठाने बल्कि स्वयं संज्ञान लेने (सुओ-मोटो) की कार्रवाई की भी उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी भावना न केवल निराशा को बढ़ावा देती है बल्कि न्यायालय के सार्वजनिक सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा पर भी प्रभाव डालती है। मदनी ने कहा कि जमीयत न्यायपालिका के सम्मान में विश्वास रखती है, लेकिन साथ ही यह भी समझती है कि हेट स्पीच और सांप्रदायिकता उकसावे के मामलों में गंभीरता, निष्पक्षता और त्वरित न्याय अत्यंत जरुरी है। कहा कि वह हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
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