Sambhal: रमज़ान से पहले खजला-फेनी की खुशबू से महका संभल, महँगाई के बावजूद कारीगरों की मेहनत जारी। 

सम्भल में रमज़ान उल मुबारक की दस्तक के साथ ही पारंपरिक खजला-फेनी बनाने का काम तेज़ हो गया है। शहर के कारीगर दिन-रात मेहनत

Feb 18, 2026 - 12:20
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Sambhal: रमज़ान से पहले खजला-फेनी की खुशबू से महका संभल, महँगाई के बावजूद कारीगरों की मेहनत जारी। 
रमज़ान से पहले खजला-फेनी की खुशबू से महका संभल, महँगाई के बावजूद कारीगरों की मेहनत जारी। 

उवैस दानिश, सम्भल 

सम्भल में रमज़ान उल मुबारक की दस्तक के साथ ही पारंपरिक खजला-फेनी बनाने का काम तेज़ हो गया है। शहर के कारीगर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं ताकि रोज़ेदारों की थाली तक समय पर यह खास व्यंजन पहुँच सके।

खजला-फेनी कारीगर आमिर हुसैन बताते हैं कि रमज़ान से करीब 15 दिन पहले ही इसकी तैयारी शुरू कर दी जाती है। फिलहाल खजला-फेनी की सप्लाई शहर के भीतर ही हो रही है और बाहर के शहरों में नहीं भेजी जा रही। आमिर के अनुसार रोज़ाना करीब एक क्विंटल खजला-फेनी तैयार की जाती है, जो पूरी तरह लेबर की उपलब्धता पर निर्भर रहती है। उन्होंने बताया कि पिछले साल के मुकाबले इस साल खजला-फेनी के दाम में ₹5 का इज़ाफा हुआ है। पहले जहाँ इसका भाव ₹15 था, वहीं अब ₹20 हो गया है। हालांकि कारीगरों का कहना है कि असली मार कच्चे माल की महँगाई ने डाली है। घी और मैदा जैसे जरूरी सामान के दाम बढ़ने से लागत काफी बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद ग्राहकों को ज्यादा बोझ न पड़े, इसका भी ध्यान रखा जा रहा है। करीब चार-पाँच साल से इस काम में लगे आमिर बताते हैं कि खजला-फेनी बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह मेहनत-तलब है। मैदा गूँधने से लेकर पतली-पतली फेनी खींचने, फिर कड़ाही में सिकाई तक का पूरा काम लगभग दो घंटे में पूरा होता है। इसमें तीन से चार कारीगर लगातार जुटे रहते हैं। कारीगरों का कहना है कि खजला-फेनी सिर्फ रमज़ान के महीने में ही बनती है और इसी दौरान इसकी सबसे ज्यादा मांग रहती है। महँगाई के बावजूद रमज़ान की रौनक और परंपरा को कायम रखने के लिए कारीगर पूरी लगन से अपने काम में जुटे हुए हैं।

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