Politics: अमित शाह का राजभाषा समारोह में संदेश- 'हिंदी भारतीय भाषाओं की सखी, भारत को एकजुट करने का बनेगी माध्यम'।
'हिंदी किसी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं, सभी भाषाएं मिलकर बढ़ाएंगी स्वाभिमान' - अमित शाह
केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गुरुवार, 26 जून 2025 को नई दिल्ली में आयोजित राजभाषा विभाग के स्वर्ण जयंती समारोह में हिस्सा लिया। इस समारोह में उन्होंने हिंदी और भारतीय भाषाओं की एकता पर जोर देते हुए कहा कि पिछले कुछ दशकों में भाषा का इस्तेमाल भारत को बांटने के साधन के रूप में किया गया है, लेकिन अब समय है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं देश को एकजुट करने का सशक्त माध्यम बनें। उन्होंने स्पष्ट किया, "मैं मन से मानता हूं कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं हो सकती। हिंदी सभी भारतीय भाषाओं की सखी है। हिंदी और भारतीय भाषाएं मिलकर हमारे स्वाभिमान कार्यक्रम को उसके अंतिम लक्ष्य तक पहुंचा सकती हैं।" यह बयान न केवल हिंदी की भूमिका को रेखांकित करता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को एकजुट करने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। इस समारोह में राजभाषा विभाग के 50 वर्षों की उपलब्धियों का जश्न मनाया गया और हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गई।
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के तहत 1975 में स्थापित हुआ था, और 26 जून 2025 को इसके स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन विज्ञान भवन, नई दिल्ली में किया गया। इस अवसर पर अमित शाह ने विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि राजभाषा विभाग ने हिंदी को सरकारी कामकाज में बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने हिंदी को 'लोकप्रिय और कार्यात्मक' बनाने के लिए तकनीकी नवाचारों, जैसे कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित अनुवाद उपकरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, के उपयोग पर जोर दिया।
शाह ने समारोह में 'राजभाषा कीर्ति पुरस्कार' और 'राजभाषा गौरव पुरस्कार' भी प्रदान किए, जो हिंदी के प्रचार-प्रसार में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों और संगठनों को दिए गए। इसके अलावा, उन्होंने 'कंठस्थ' नामक एक AI-संचालित भाषा अनुवाद सॉफ्टवेयर लॉन्च किया, जो हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जोड़ने में मदद करेगा। इस सॉफ्टवेयर को क्षेत्रीय भाषाओं में सरकारी दस्तावेजों के अनुवाद और प्रशिक्षण के लिए डिजाइन किया गया है।
- अमित शाह का बयान
अमित शाह ने अपने संबोधन में भाषा को लेकर भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "पिछले कुछ दशकों में भाषा का इस्तेमाल भारत को बांटने के लिए किया गया। वे हमें तोड़ नहीं पाए, लेकिन प्रयास जरूर किए गए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी भाषाएं—चाहे वह हिंदी हो, तमिल हो, बंगाली हो, या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा—भारत को एकजुट करने का सशक्त माध्यम बनें।" यह बयान भारत में भाषाई विवादों के इतिहास को संबोधित करता है, खासकर 1960 के दशक में हिंदी को राजभाषा बनाने के खिलाफ दक्षिण भारत में हुए विरोधों को।
शाह ने हिंदी को 'सखी' के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा, "हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं है। यह सभी भारतीय भाषाओं की सहयोगी है। हिंदी और क्षेत्रीय भाषाएं मिलकर हमारे सांस्कृतिक स्वाभिमान को मजबूत करेंगी।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार का लक्ष्य हिंदी को 'जन-जन की भाषा' बनाना है, जो न केवल सरकारी कार्यालयों में, बल्कि शिक्षा, तकनीक, और रोजमर्रा के जीवन में भी प्रचलित हो।
शाह का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत में भाषा को लेकर बहस फिर से गरमाई है। हाल के वर्षों में, कुछ राज्यों, खासकर तमिलनाडु और कर्नाटक, ने हिंदी को 'थोपने' के आरोप लगाए हैं, जबकि केंद्र सरकार ने हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए कई कदम उठाए हैं। 2019 में अमित शाह के 'एक राष्ट्र, एक भाषा' वाले बयान ने विवाद खड़ा किया था, जिसके बाद सरकार ने स्पष्ट किया था कि हिंदी को बढ़ावा देने का मतलब अन्य भाषाओं को दबाना नहीं है। इस बार, शाह ने सावधानीपूर्वक अपने बयान में सभी भारतीय भाषाओं की एकता पर जोर दिया, जिसे विश्लेषकों ने एक संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा है।
सामाजिक स्तर पर, यह बयान भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को एकजुट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भारत में 22 अनुसूचित भाषाएं और सैकड़ों बोलियां हैं, और भाषा अक्सर क्षेत्रीय अस्मिता का प्रतीक बन जाती है। शाह का यह कहना कि हिंदी 'सखी' है, न कि 'विरोधी', क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना को दर्शाता है।
- सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं
शाह के बयान और स्वर्ण जयंती समारोह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा की गईं। कई यूजर्स ने उनके बयान की सराहना की और इसे भारत की भाषाई एकता की दिशा में सकारात्मक कदम बताया। एक यूजर ने लिखा, "हिंदी को सभी भाषाओं की सखी कहना एक खूबसूरत विचार है। यह भारत की एकता को मजबूत करेगा।" हालांकि, कुछ यूजर्स, खासकर दक्षिण भारत से, ने सतर्कता बरतते हुए कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर क्षेत्रीय भाषाओं को दबाया नहीं जाना चाहिए। एक यूजर ने लिखा, "हमें अपनी मातृभाषा की रक्षा करनी होगी। हिंदी को बढ़ावा ठीक है, लेकिन तमिल और अन्य भाषाओं को भी बराबर सम्मान मिलना चाहिए।"
- राजभाषा विभाग की उपलब्धियां
समारोह में राजभाषा विभाग की 50 वर्षों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया। विभाग ने सरकारी कार्यालयों में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं, और डिजिटल पहल शुरू की हैं। हाल ही में लॉन्च किए गए 'कंठस्थ' सॉफ्टवेयर को 14 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की क्षमता के लिए सराहा गया। इसके अलावा, विभाग ने 'हिंदी तरंग' नामक एक डिजिटल पत्रिका शुरू की है, जो युवाओं को हिंदी साहित्य और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
शाह ने भविष्य की योजनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार अगले पांच वर्षों में सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी के उपयोग को 75% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखती है। साथ ही, क्षेत्रीय भाषाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ावा देने के लिए नई योजनाएं शुरू की जाएंगी।
शाह का यह बयान भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भाषा भारत में न केवल संचार का माध्यम है, बल्कि यह संस्कृति, इतिहास, और अस्मिता का भी प्रतीक है। हिंदी को 'सखी' के रूप में प्रस्तुत करना क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना को दर्शाता है, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जरूरी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का राजभाषा विभाग के स्वर्ण जयंती समारोह में दिया गया बयान भारत की भाषाई और सांस्कृतिक एकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने हिंदी को सभी भारतीय भाषाओं की 'सखी' बताकर यह स्पष्ट किया कि सरकार का लक्ष्य किसी भी भाषा को दबाना नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलना है। यह बयान और समारोह न केवल हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देगा, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने में भी योगदान देगा।
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