दादर कबूतरखाना विवाद- जैन समुदाय द्वारा भूख हड़ताल की चेतावनी, बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर तनाव। 

मुंबई के दादर में स्थित ऐतिहासिक कबूतरखाना एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा कबूतरों को दाना डालने पर लगाए ...

Aug 11, 2025 - 16:59
Aug 11, 2025 - 17:09
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दादर कबूतरखाना विवाद- जैन समुदाय द्वारा भूख हड़ताल की चेतावनी, बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर तनाव। 
दादर कबूतरखाना विवाद- जैन समुदाय द्वारा भूख हड़ताल की चेतावनी, बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर तनाव। 

मुंबई के दादर में स्थित ऐतिहासिक कबूतरखाना एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा कबूतरों को दाना डालने पर लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखने के बाद जैन समुदाय ने आक्रामक रुख अपनाया है। कोर्ट के आदेश के बावजूद, जैन समुदाय के कुछ सदस्यों ने दादर कबूतरखाना के पास कबूतरों को दाना डालने की कोशिश की, जिसे पुलिस ने तुरंत रोक दिया। इस घटना ने न केवल समुदाय और प्रशासन के बीच तनाव को बढ़ाया है, बल्कि जैन समुदाय ने इस फैसले के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू करने की चेतावनी दी है। जैन मुनि नीलेशचंद्र विजय ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे शांतिपूर्ण सत्याग्रह करेंगे, लेकिन जरूरत पड़ने पर धर्म की रक्षा के लिए हथियार भी उठा सकते हैं।

दादर का कबूतरखाना, जो 1933 में स्थापित हुआ और एक ग्रेड-II धरोहर स्थल है, जैन और गुजराती समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र रहा है। कबूतरों को दाना डालना जैन धर्म में 'जीव दया' का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है, जो अहिंसा और सभी जीवों के प्रति करुणा के सिद्धांत पर आधारित है। जैन समुदाय के लिए यह प्रथा न केवल धार्मिक है, बल्कि यह उनके पूर्वजों की परंपराओं और आध्यात्मिक विश्वासों से भी जुड़ी हुई है। हालांकि, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और बॉम्बे हाई कोर्ट ने कबूतरों को दाना डालने को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा मानते हुए इस पर प्रतिबंध लगाया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कबूतरों की बीट और पंखों से होने वाली स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस या 'पिजन लंग', एक गंभीर चिंता का विषय हैं।

इस विवाद की शुरुआत तब हुई, जब बीएमसी ने बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश पर मुंबई के सभी 51 कबूतरखानों को बंद करने और दाना डालने पर रोक लगाने का फैसला किया। दादर कबूतरखाना, जो शहर के सबसे प्रमुख कबूतरखानों में से एक है, को तिरपाल और बांस की संरचनाओं से ढक दिया गया, ताकि कबूतरों को दाना डालना रोका जा सके। इसके साथ ही, बीएमसी ने उन लोगों पर 500 रुपये का जुर्माना लगाना शुरू किया, जो इस नियम का उल्लंघन करते पाए गए। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बीएमसी ने कुछ ही हफ्तों में 142 लोगों पर 68,700 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसमें से 61 मामले अकेले दादर कबूतरखाना से थे। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नियम तोड़ने वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाए।

इसके बावजूद, जैन समुदाय ने इस आदेश को अपनी धार्मिक परंपराओं पर हमला माना और इसके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। समुदाय के सैकड़ों सदस्यों, विशेष रूप से महिलाओं ने, दादर कबूतरखाना पर इकट्ठा होकर तिरपाल को हटाने और कबूतरों को दाना डालने की कोशिश की। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने बांस की संरचनाओं पर चढ़कर तिरपाल को फाड़ दिया और कबूतरों के लिए अनाज बिखेरा। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की, लेकिन कोई हिंसक घटना नहीं हुई। इस प्रदर्शन को जैन समुदाय ने अपनी धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए एक शांतिपूर्ण कदम बताया, लेकिन बीएमसी और पुलिस ने इसे कोर्ट के आदेश का उल्लंघन माना।

जैन मुनि नीलेशचंद्र विजय ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि जैन समुदाय शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह और भूख हड़ताल के माध्यम से अपनी मांगों को उठाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जैन समाज अहिंसा का पालन करता है, लेकिन अगर उनकी धार्मिक परंपराओं पर हमला हुआ, तो वे धर्म की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा सकते हैं। उनका यह बयान, जिसमें उन्होंने हथियार उठाने की बात कही, ने विवाद को और हवा दी। कई लोगों ने इसे अतिवादी और अनुचित करार दिया, क्योंकि जैन धर्म अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित है। हालांकि, नीलेशचंद्र ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका इरादा हिंसा को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता के लिए उनके समुदाय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इस घटना ने न केवल जैन समुदाय और बीएमसी के बीच तनाव को बढ़ाया, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक बहस का भी केंद्र बन गया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए बीएमसी को निर्देश दिया कि कबूतरों को दाना डालने की नियंत्रित व्यवस्था की जाए, ताकि पक्षियों की भुखमरी को रोका जा सके। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से कबूतरों की बीट के स्वास्थ्य प्रभावों का विश्लेषण किया जाए और वैकल्पिक स्थानों, जैसे बीकेसी और आरे कॉलोनी, में दाना डालने की व्यवस्था की जाए। फडणवीस ने कहा, “कबूतरों की जान बचाना, पर्यावरण की रक्षा करना और नागरिकों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना, ये तीनों महत्वपूर्ण हैं।”

इस बीच, शिव सेना (यूबीटी) के नेता आदित्य ठाकरे ने सरकार पर पाखंड का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार केवल चुनावों के समय जैन समुदाय की भावनाओं को याद करती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि कबूतरखानों को बंद करने से कबूतर आवासीय क्षेत्रों में फैल सकते हैं, जिससे और समस्याएं पैदा होंगी। दूसरी ओर, पशु अधिकार संगठन पीईटीए ने सुझाव दिया कि कबूतरों को दाना डालने की प्रक्रिया को नियंत्रित और स्वच्छ एवियरी में करना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सके।

जैन समुदाय ने दादर कबूतरखाना ट्रस्ट के नेतृत्व में शांतिदूत यात्रा का आयोजन किया, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया। इस यात्रा में समुदाय ने कबूतरखानों को फिर से खोलने और दाना डालने की अनुमति देने की मांग की। कुछ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि बंदी के कारण सैकड़ों कबूतर भुखमरी का शिकार हो गए हैं। हालांकि, बीएमसी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि कबूतरखानों को बंद करने का उद्देश्य पक्षियों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है।

यह विवाद न केवल धार्मिक परंपराओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच टकराव को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे कितनी जल्दी राजनीतिक रंग ले सकते हैं। जैन समुदाय की भूख हड़ताल की चेतावनी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का हल निकालने के लिए सरकार, बीएमसी और समुदाय के बीच बातचीत जरूरी है। बिना किसी ठोस समाधान के, यह विवाद और बढ़ सकता है, जिससे सामाजिक तनाव और कानूनी उलझनें बढ़ेंगी।

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