लखनऊ में डिजिटल स्ट्राइक: साइबर अपराधियों ने रिटायर्ड मेजर और शिक्षक सहित पांच लोगों को बनाया शिकार, रू.1.71 करोड़ उड़ाए

रिटायर्ड मेजर के साथ हुई धोखाधड़ी की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों के भी कान खड़े कर दिए हैं। मेजर को एक अनजान नंबर से फोन आया, जिसमें कॉल करने वाले ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताया। ठगों ने मेजर पर आरोप लगाया कि उनके ना

Mar 20, 2026 - 12:16
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लखनऊ में डिजिटल स्ट्राइक: साइबर अपराधियों ने रिटायर्ड मेजर और शिक्षक सहित पांच लोगों को बनाया शिकार, रू.1.71 करोड़ उड़ाए
लखनऊ में डिजिटल स्ट्राइक: साइबर अपराधियों ने रिटायर्ड मेजर और शिक्षक सहित पांच लोगों को बनाया शिकार, रू.1.71 करोड़ उड़ाए

  • राजधानी में साइबर ठगों का जाल: निवेश और डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बड़ी लूट, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी ने गंवाए लाखों
  • सावधानी हटी, जमापूंजी बटी: लखनऊ के पॉश इलाकों में सक्रिय हुए ऑनलाइन लुटेरे, पांच परिवारों की जीवन भर की कमाई पर किया हाथ साफ

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में साइबर अपराधियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ गया है कि अब समाज के सबसे जागरूक माने जाने वाले वर्ग भी इनके बिछाए जाल में फंस रहे हैं। हाल ही में घटित हुई पांच बड़ी घटनाओं ने शहर में हड़कंप मचा दिया है, जिसमें एक सेवानिवृत्त मेजर और एक वरिष्ठ शिक्षक सहित पांच अलग-अलग लोगों से कुल रू.1.71 करोड़ की भारी-भरकम राशि ठग ली गई। इन मामलों में अपराधियों ने मुख्य रूप से 'डिजिटल अरेस्ट' और 'शेयर मार्केट में निवेश' का लालच देकर पीड़ितों को मनोवैज्ञानिक रूप से बंधक बनाया। पुलिस और साइबर सेल की शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि इन ठगों का नेटवर्क न केवल अंतर्राज्यीय है, बल्कि इनके तार सीमा पार से भी जुड़े हो सकते हैं, जो बैंकिंग सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर चंद मिनटों में करोड़ों का ट्रांजैक्शन कर रहे हैं।

रिटायर्ड मेजर के साथ हुई धोखाधड़ी की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों के भी कान खड़े कर दिए हैं। मेजर को एक अनजान नंबर से फोन आया, जिसमें कॉल करने वाले ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताया। ठगों ने मेजर पर आरोप लगाया कि उनके नाम से जारी एक पार्सल में प्रतिबंधित सामग्री मिली है और वे एक बड़े मनी लॉन्ड्रिंग रैकेट का हिस्सा बन चुके हैं। मेजर को घंटों तक वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर किया गया, जिसे आजकल 'डिजिटल अरेस्ट' कहा जा रहा है। इस दौरान उन्हें डराया-धमकाया गया कि यदि उन्होंने अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया और 'वेरिफिकेशन' के नाम पर पैसे ट्रांसफर नहीं किए, तो उन्हें और उनके परिवार को तुरंत जेल भेज दिया जाएगा। दबाव में आकर मेजर ने अपनी जीवन भर की बचत के रू.70 लाख से अधिक की राशि ठगों द्वारा बताए गए खातों में हस्तांतरित कर दी।

इसी तरह का एक और गंभीर मामला एक प्रतिष्ठित शिक्षक के साथ सामने आया, जिन्हें शेयर बाजार में कम समय में दोगुना मुनाफा कमाने का लालच दिया गया। शिक्षक को एक सोशल मीडिया ग्रुप में जोड़ा गया था, जहां फर्जी स्क्रीनशॉट और मुनाफे के झूठे आंकड़े दिखाकर उनका भरोसा जीता गया। जब शिक्षक ने शुरुआत में कुछ छोटी राशि निवेश की, तो उन्हें एक फर्जी ऐप पर बड़ा मुनाफा होता हुआ दिखाया गया। इस वर्चुअल मुनाफे को हकीकत मानकर शिक्षक ने अपने बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट को तोड़कर बड़ी रकम निवेश कर दी। जब उन्होंने अपना पैसा निकालने की कोशिश की, तो उनसे 'टैक्स' और 'प्रोसेसिंग फीस' के नाम पर और पैसों की मांग की जाने लगी, जिसके बाद उन्हें अहसास हुआ कि उनके साथ रू.40 लाख से ज्यादा की धोखाधड़ी हो चुकी है।

शहर के अन्य तीन पीड़ितों में एक व्यवसायी और दो कामकाजी महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें अलग-अलग तरीकों से निशाना बनाया गया। व्यवसायी को केवाईसी अपडेट करने के बहाने एक संदिग्ध लिंक भेजा गया था, जिस पर क्लिक करते ही उनके मोबाइल का एक्सेस ठगों के पास चला गया और कुछ ही देर में उनके खाते से रू.25 लाख पार हो गए। वहीं, महिलाओं को 'पार्ट-टाइम जॉब' और 'यूट्यूब वीडियो लाइक' करने के बदले पैसे देने का झांसा दिया गया था। शुरुआत में उन्हें कुछ सौ रुपये दिए गए, लेकिन बाद में 'वीआईपी टास्क' के नाम पर उनसे लाखों रुपये निवेश करा लिए गए। इन पांचों घटनाओं में एक समानता यह रही कि अपराधियों ने पीड़ितों को किसी से भी बात करने या फोन काटने का मौका नहीं दिया, जिससे वे किसी की सलाह न ले सकें।

साइबर सेल की तकनीकी टीम ने जब इन खातों की जांच की, तो पाया कि ठगी गई रकम को तत्काल दर्जनों अलग-अलग 'लेयर' वाले खातों में भेजा गया। ये खाते अक्सर फर्जी दस्तावेजों पर खोले गए होते हैं या गरीब तबके के लोगों के 'किराए' पर लिए गए खाते होते हैं। लखनऊ पुलिस ने बताया कि अपराधी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेकर अपनी आवाज और पहचान भी बदल रहे हैं, जिससे आम नागरिक आसानी से झांसे में आ जाते हैं। रू.1.71 करोड़ की इस सामूहिक ठगी ने वित्तीय संस्थानों की सुरक्षा प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं कि आखिर कैसे इतनी बड़ी रकम संदिग्ध खातों में बिना किसी वेरिफिकेशन के स्थानांतरित हो जाती है।

पीड़ितों की शिकायतों के आधार पर साइबर थानों में एफआईआर दर्ज कर ली गई है, लेकिन रिकवरी की संभावना समय के साथ कम होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर ठगी के मामलों में पहले दो घंटे 'गोल्डन ऑवर' होते हैं; अगर इस दौरान शिकायत दर्ज हो जाए, तो बैंक खातों को फ्रीज कर पैसे वापस मिलने की उम्मीद रहती है। लखनऊ में हुई इन घटनाओं के बाद स्थानीय प्रशासन ने एडवाइजरी जारी कर लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अज्ञात लिंक पर क्लिक न करें और न ही किसी अनजान वीडियो कॉल के दबाव में आएं। अपराधियों का मुख्य हथियार डर और लालच है, जिससे केवल सतर्कता के जरिए ही बचा जा सकता है।

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