नोएडा जिला अस्पताल के डॉक्टर और वार्ड बॉय पर गिरी गाज, फर्जी मेडिकल रिपोर्ट के बदले 71 हजार रुपये घूस लेने का मामला।
गौतमबुद्ध नगर के नोएडा सेक्टर-30 स्थित जिला अस्पताल में भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्यों का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने
- भ्रष्टाचार के खिलाफ विजिलेंस टीम की बड़ी स्ट्राइक, बिना किसी चोट के गंभीर घाव दिखाने वाली रिपोर्ट बनाने का खेल खत्म
- सरकारी अस्पताल में 'सौदाबाजी' का सनसनीखेज मामला, रिश्वत की रकम के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार हुए स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी
गौतमबुद्ध नगर के नोएडा सेक्टर-30 स्थित जिला अस्पताल में भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्यों का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे स्वास्थ्य विभाग की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना में अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक और उनके सहायक वार्ड बॉय को भ्रष्टाचार निवारण संगठन (विजिलेंस) की टीम ने एक गुप्त सूचना के आधार पर जाल बिछाकर गिरफ्तार किया है। इन पर आरोप है कि इन्होंने एक व्यक्ति से फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने के एवज में 71 हजार रुपये की मोटी रकम रिश्वत के तौर पर मांगी थी। यह मामला इसलिए अधिक गंभीर हो जाता है क्योंकि यह सीधे तौर पर न्यायिक और पुलिसिया कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश थी। सरकारी संस्थान में बैठकर कानून के साथ इस तरह के खिलवाड़ ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।
घटना के विस्तार में जाने पर पता चलता है कि एक व्यक्ति, जिसके खिलाफ थाने में कोई कानूनी विवाद चल रहा था, वह अपने प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए एक ऐसी मेडिकल रिपोर्ट चाहता था जिसमें उसे गंभीर चोटें दिखाई गई हों। हकीकत में उस व्यक्ति को कोई शारीरिक चोट नहीं लगी थी, लेकिन वह अस्पताल के रिकॉर्ड में खुद को घायल दिखाना चाहता था ताकि विपक्षी पार्टी पर गैर-जमानती धाराएं लगवाई जा सकें। इस काम के लिए उसने जिला अस्पताल के ईएमओ (आपातकालीन चिकित्सा अधिकारी) और वहां तैनात वार्ड बॉय से संपर्क किया। आरोपियों ने इस अवैध कार्य के लिए शुरुआत में भारी रकम की मांग की, जिसे बाद में 71 हजार रुपये पर तय किया गया।
- कैसे पकड़े गए भ्रष्ट कर्मचारी
विजिलेंस टीम को पीड़ित (जिसने बाद में शिकायत की) के माध्यम से इस सौदेबाजी की जानकारी मिली थी। टीम ने पूरी योजना के साथ अस्पताल परिसर में घेराबंदी की और जैसे ही वार्ड बॉय ने डॉक्टर के इशारे पर केमिकल युक्त नोटों की गड्डी पकड़ी, टीम ने उसे दबोच लिया। इसके तुरंत बाद संबंधित डॉक्टर को भी हिरासत में ले लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद की गई शुरुआती जांच में यह पाया गया है कि जिला अस्पताल के भीतर इस तरह का सिंडिकेट काफी समय से सक्रिय हो सकता है। यह केवल एक अकेला मामला नहीं है, बल्कि संदेह जताया जा रहा है कि पूर्व में भी कई मारपीट के मुकदमों में इसी प्रकार की हेराफेरी करके मेडिकल रिपोर्ट बदली गई होंगी। पुलिस और विजिलेंस विभाग अब आरोपियों के पिछले रिकॉर्ड और उनके द्वारा जारी किए गए हालिया मेडिकल सर्टिफिकेट्स की गहन समीक्षा कर रहे हैं। इस कार्यवाही के दौरान अस्पताल के अन्य कर्मचारियों में भी डर का माहौल है और प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के प्रति उनकी नीति बिल्कुल स्पष्ट है—दोषी चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे दंड भुगतना ही होगा।
भ्रष्टाचार की इस घटना ने चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे की गरिमा को भी ठेस पहुँचाई है। जिला अस्पताल, जहाँ गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इलाज के लिए आते हैं, वहाँ डॉक्टरों का इस तरह की जालसाजी में लिप्त होना तंत्र की विफलता को दर्शाता है। यह मामला सामने आने के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने भी अपनी आंतरिक जांच शुरू कर दी है। विभाग अब इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या इस रैकेट में अस्पताल के कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारी या लिपिक वर्ग के लोग भी शामिल थे। फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करना न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह भारतीय दंड संहिता के तहत एक गंभीर अपराध भी है, जिसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है।
विजिलेंस की टीम ने पकड़े गए आरोपियों के पास से बरामद की गई रिश्वत की राशि को साक्ष्य के तौर पर जब्त कर लिया है। बताया जा रहा है कि ट्रैप के दौरान इस्तेमाल किए गए नोटों पर विशेष पाउडर लगाया गया था, जिसके निशान आरोपियों के हाथों पर पाए गए। यह साक्ष्य अदालत में दोष सिद्धि के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। आरोपियों को स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। इस बीच, नोएडा जिला अस्पताल के प्रबंधन ने आरोपी डॉक्टर और वार्ड बॉय को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने की संस्तुति शासन को भेज दी है।
इस मामले का एक अन्य पहलू यह भी है कि फर्जी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कई बार निर्दोष लोगों को जेल जाना पड़ता है। जब डॉक्टर बिना जांच के या जानबूझकर गलत चोटें रिपोर्ट में लिख देते हैं, तो पुलिस उसे आधार मानकर मुकदमा दर्ज करती है। नोएडा की इस घटना ने पुलिस को भी अब मेडिकल रिपोर्टों के सत्यापन के प्रति अधिक सतर्क कर दिया है। भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अस्पताल परिसर में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी बढ़ाने और मेडिकल रिपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल और 'सेंट्रलाइज्ड' करने की योजना पर विचार किया जा रहा है।
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