Gonda: शहीद भगत सिंह कॉलेज मैदान में अमृत श्रीराम कथा के तीसरे दिन राम-सीता विवाह प्रसंग ने श्रोताओं को किया भाव-विभोर। 

शहर के शहीद भगत सिंह कॉलेज मैदान में चल रही अमृत श्रीराम कथा के तीसरे दिन श्रोताओं को राम-सीता विवाह प्रसंग की रसधार में सराबोर

By INA News Desk
Dec 17, 2025 - 18:04
210 Views
Gonda: शहीद भगत सिंह कॉलेज मैदान में अमृत श्रीराम कथा के तीसरे दिन राम-सीता विवाह प्रसंग ने श्रोताओं को किया भाव-विभोर। 
शहीद भगत सिंह कॉलेज मैदान में अमृत श्रीराम कथा के तीसरे दिन राम-सीता विवाह प्रसंग ने श्रोताओं को किया भाव-विभोर। 

गोण्डा। शहर के शहीद भगत सिंह कॉलेज मैदान में चल रही अमृत श्रीराम कथा के तीसरे दिन श्रोताओं को राम-सीता विवाह प्रसंग की रसधार में सराबोर कर दिया गया। कथाव्यास स्वामी प्रणवपुरी ने आध्यात्मिक भावों और सजीव संवादों के साथ जनकपुर की फुलवारी से लेकर विवाह तक के प्रसंग को ऐसा रूप दिया कि पूरा पंडाल भाव-विभोर हो उठा।

फुलवारी प्रसंग में सखियों की ठिठोली और भोलेपन से भरे संवाद कथा का केंद्र बने। प्रभु श्रीराम को देखते ही सखियां आपस में मुस्कुराती हैं, छेड़ती हैं और एक सखी प्रभु पर दांव लगा बोल उठती है—“सीता से विवाह हो तो ही प्रभाव मानूंगी।” कथाव्यास ने इस प्रसंग को अत्यंत जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते हुए चौपाइयों के माध्यम से भक्ति और माधुर्य रस का सुंदर समन्वय कराया।
“जो सखी मैं देखी नरनाहू…” जैसी पंक्तियों पर श्रोताओं की ताली गूंज उठी। सखियों के मनोभाव, उनकी उत्सुकता और प्रभु के सौम्य स्वरूप का वर्णन सुनकर वातावरण भक्तिमय हो गया।

 हनुमत शैली में (खड़े होकर) कथाव्यास कहते हैं 
“कोई कहै भूपति पहिचाने, मुनि समेत सादर सनमाने,”
तो मानो पूरा प्रसंग सजीव हो उठा। श्रोताओं को लगा जैसे जनकपुर की गलियों में स्वयं प्रभु विचरण कर रहे हों। कथा के इस भाग में यह संदेश भी उभरा कि प्रभु की पहचान उनके वैभव से नहीं, बल्कि उनके गुण, करुणा और मर्यादा से होती है।

जनकपुर में दोनों भाइयों को देखकर सखियों का उल्लास चरम पर पहुंच जाता है। वे आनंद में गाते हुए कहती हैं—
“राघव धीरे चलो, ससुराल की गलियां,”
इस गीतात्मक प्रस्तुति ने पूरे पंडाल को भावनाओं से भर दिया। विवाह प्रसंग में मर्यादा, प्रेम और लोकमंगल की भावना को प्रमुखता से रखा गया। कथाव्यास ने बताया कि राम–सीता का विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि आदर्श जीवन मूल्यों का संगम है।

कथा के दौरान श्रोताओं ने बार-बार “जय श्रीराम” के उद्घोष के साथ भाव प्रकट किए। संगीत, वाणी और भावों का ऐसा संगम बना कि कथा स्थल एक क्षण को जनकपुर और अयोध्या की पवित्र भूमि में परिवर्तित हो गया। तीसरे दिन की कथा ने न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत किया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि प्रभु का स्मरण प्रेम, विनय और मर्यादा के साथ किया जाए—यही सच्ची भक्ति है। यजमान जन्मेजय सिह, निर्विकार सिंह भदौरिया, राजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव व तमाम गणमान्य मौजूद रहे। 

Also Read- Lucknow: सीएम योगी और टाटा चेयरपर्सन की बैठक: लखनऊ में यूपी को मिल सकती है नई AI सिटी और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow