Pilibhit News: खुद को रौंदा हुआ महसूस कर रहे हैं कुम्हार- चाइनीज मोमबत्ती और झालरों से खत्म होती जा रही परंपरागत  माटी के दीयों की परंपरा। 

"माटी कहे कुम्हार से, तू क्यो रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय" यह पंक्तियां संत कबीर दास जी ने जीवन और मरण पर

Oct 27, 2024 - 16:51
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Pilibhit News: खुद को रौंदा हुआ महसूस कर रहे हैं कुम्हार- चाइनीज मोमबत्ती और झालरों से खत्म होती जा रही परंपरागत  माटी के दीयों की परंपरा। 

कुँवर निर्भय सिंह, आईएनए पीलीभीत

पीलीभीत। "माटी कहे कुम्हार से, तू क्यो रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूगी तोय" यह पंक्तियां संत कबीर दास जी ने जीवन और मरण पर कहीं लेकिन आज इसका दूसरा अर्थ चरितार्थ हो रहा है मिट्टी के महंगे दामों और  बाजार में  चाइनीज  दियों, मोमबत्ती ,झालरों  के तले  कुम्हार आज अपने आपको  रौंदा हुआ महसूस कर रहे हैं  यही कारण है की दीपावली से महीनों पहले शुरू होने वाली तैयारी केवल अब एक रस्म रिवाज बनकर ही रह गई है आधुनिकता के चलते कुम्हारों का मिट्टी व्यवसाय खत्म होता जा रहा है हालात यह कि इस व्यवसाय से जुड़े लोग भुखमरी की कगार पर है और सरकार भी इनकी तरफ कोई विशेष ख्याल नहीं रख रही है हर साल कुम्हार धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीयों को बनाते हैं लेकिन लगता है जैसे लक्ष्मी उनसे रूठ गई है कमाई ना होने के चलते कुम्हार अब मिट्टी के व्यवसाय के साथ और दूसरा व्यवसाय भी अपना रहे वर्षों से मिट्टी   से कुम्हारी कला का काम करने वाले कुम्हार (प्रजापति) अपने बच्चों को अब यह काम विरासत के तौर पर नहीं सौंपना  चाहते है बिजली की झालर और मोमबत्ती के बीच मिट्टी के दीप लोगों की आंखों में चमक पैदा नहीं कर पाते हैं अपने घरों को सजाने के लिए लोग दीपावली के अवसर पर चाइनीज झालरों मोमबत्ती, एलईडी लाइट आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं वही मिट्टी के दीपों को केवल पूजा आदि में रस्म अदायगी के लिए ही करते हैं।

दीपावली दीपों का पर्व माना जाता है इस पर्व के नजदीक आते ही महीनों पहले से ही कुम्हारों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ जाती है एक और जहां दीपावली से पहले छोटे बड़े दीयों  की डिमांड तेजी के साथ बढ़ जाती थी क्षेत्र के निर्मित दीयों की डिमांड पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत, रानीखेत खटीमा ,अल्मोड़ा ,बागेश्वर नैनीताल आदि स्थानों पर होने से सप्लाई किए जाते थे अब बदलते वक्त के साथ लोग मिट्टी के दीयों को कम तरजीही दे रहे हैं और चाइनीज मोमबत्ती, इलैक्ट्रोनिक झालरों आदि को ज्यादा महत्व दे रहे हैं जिस कारण मिट्टी के दीपों की सप्लाई कम हो पा रही है उसके चलते इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का मन भी उचट रहा है और वह अपनी संतानों को इस पुश्तैनी धंधे से दूर रखकर अन्य व्यवसायों में लगा रहे। 

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पिपरिया के प्रजापति विकास का कहना है कि अब माटी के दीए कारवां आदि पकाने के लिए ईंधन भी सस्ता नहीं रहा है कुम्हारी कला  केवल एक रस्म अदायगी ही रह गयी है। परिवार का जीवन यापन होना बड़ा मुश्किल हो रहा है दस हजार दीयों पर उन्हें तीन हजार रूपये मिलते हैं जिसमें से दो हजार रूपये दीयों को बनाने आदि में खर्च हो जाते हैं केवल एक हजार रूपये बचते है।



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