मदद के लिए बिकेगा कीमती प्लॉट: यासिर, अमान और सुबर मुस्तफा ने ईरान में पीड़ित बच्चों के स्वजन के लिए खोला अपना खजाना।
मेरठ के लावड़ क्षेत्र के रहने वाले तीन भाइयों यासिर मुस्तफा, अमान मुस्तफा और सुबर मुस्तफा ने मानवता की सेवा के लिए एक ऐसा संकल्प लिया
- ईरान में पीड़ित परिवारों की मदद के लिए मेरठ के तीन भाइयों ने दांव पर लगाई अपनी संपत्ति
- सरहदों के पार पहुंची संवेदना की लहर: अंजुमन हुसैनिया संस्था के जरिए ईरान पहुंचेगी मेरठ के भाइयों की बड़ी आर्थिक मदद
मेरठ के लावड़ क्षेत्र के रहने वाले तीन भाइयों यासिर मुस्तफा, अमान मुस्तफा और सुबर मुस्तफा ने मानवता की सेवा के लिए एक ऐसा संकल्प लिया है जो समाज के लिए प्रेरणा बन गया है। इन तीनों भाइयों ने फैसला किया है कि वे ईरान में हालिया संघर्षों और हमलों में अपनी जान गंवाने वाले बच्चों के शोक संतप्त परिवारों की सहायता करेंगे। इसके लिए उन्होंने अपनी सबसे बड़ी संपत्ति, जो कि एक कीमती भूखंड (प्लॉट) है, उसे बेचने का निर्णय लिया है। बुधवार को इन भाइयों ने औपचारिक रूप से इस प्लॉट के सभी जरूरी दस्तावेज 'अंजुमन हुसैनिया' संस्था के पदाधिकारियों को सौंप दिए। उनका उद्देश्य केवल पैसा देना नहीं, बल्कि उन परिवारों को यह अहसास कराना है कि इस दुख की घड़ी में दुनिया के दूसरे कोने में बैठे लोग भी उनके साथ खड़े हैं।
इस नेक कार्य की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए तीनों भाइयों ने संस्था के सचिव तनवीर काजमी को अपने आवास पर बुलाया और उन्हें प्लॉट के कागजात सुपुर्द किए। यासिर मुस्तफा ने जानकारी दी कि इस प्लॉट की वर्तमान बाजार कीमत लगभग 15 लाख रुपये के आसपास है। उन्होंने संस्था से अनुरोध किया है कि इस संपत्ति को जल्द से जल्द बेचकर जो भी धनराशि प्राप्त हो, उसे ईरान में उन परिवारों तक पहुँचाया जाए जिन्होंने अपने मासूम बच्चों को खो दिया है। भाइयों का मानना है कि जमीन और जायदाद फिर से बनाई जा सकती है, लेकिन जो मासूम जिंदगियां चली गईं, उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी, ऐसे में कम से कम उनके परिजनों को आर्थिक सहारा देना उनका नैतिक कर्तव्य है।
ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाला है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी अस्त-व्यस्त कर दिया है। मेरठ के इन भाइयों का हृदय तब पसीज गया जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उन मासूमों की तस्वीरें देखीं जो इस युद्ध का शिकार बने। यासिर और उनके भाइयों का कहना है कि जब हम अपने घर में सुरक्षित रहते हैं और दूसरे देशों में बच्चों को मरते देखते हैं, तो रूह कांप जाती है। उन्होंने तय किया कि वे केवल शोक व्यक्त नहीं करेंगे बल्कि धरातल पर कुछ ठोस मदद करेंगे। उनके इस निर्णय ने मेरठ ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से देशभर के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
- मेरठ का अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव और युद्ध का असर
मेरठ जिला हमेशा से ही संवेदनशील रहा है और यहाँ के कई छात्र और कामकाजी लोग ईरान व इजरायल जैसे देशों में रहते हैं। हाल ही में जिला प्रशासन की हेल्पलाइन पर कई परिवारों ने अपने परिजनों की सकुशल वापसी की गुहार लगाई है। ऐसे माहौल में जहाँ लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, मेरठ के इन तीन भाइयों का स्वैच्छिक रूप से अपनी जमीन बेचना वैश्विक भाईचारे (Global Brotherhood) का एक सशक्त उदाहरण पेश करता है। यह दर्शाता है कि आम आदमी शांति और सुरक्षा के प्रति कितना गंभीर है।
अंजुमन हुसैनिया संस्था, जिसे इन भाइयों ने चुना है, लंबे समय से सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सक्रिय रही है। संस्था के सचिव तनवीर काजमी ने भाइयों के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि यह दान की एक ऐसी मिसाल है जो बहुत कम देखने को मिलती है। संस्था अब कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए इस प्लॉट की बिक्री की प्रक्रिया शुरू करेगी। प्राप्त राशि को आधिकारिक बैंकिंग चैनलों या अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों के माध्यम से सीधे ईरान के उन क्षेत्रों में भेजा जाएगा जहाँ बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। संस्था यह भी सुनिश्चित करेगी कि सहायता राशि का एक-एक पैसा सीधे उन जरूरतमंदों तक पहुंचे जिनके लिए यह दान किया गया है।
मेरठ के इन भाइयों की इस पहल ने स्थानीय स्तर पर भी एक नई बहस छेड़ दी है। लोग उनकी निस्वार्थ सेवा भावना की तारीफ कर रहे हैं। गौरतलब है कि इन भाइयों की आर्थिक स्थिति कोई बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन उनके हौसले और इरादे पहाड़ जैसे ऊंचे हैं। उन्होंने अपने इस कदम से यह भी सिद्ध कर दिया है कि दूसरों की मदद करने के लिए करोड़पति होना जरूरी नहीं, बल्कि एक बड़ा दिल होना जरूरी है। मेरठ के अन्य सामाजिक संगठनों ने भी इस पहल से प्रेरणा लेते हुए युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में दवाइयां और खाद्य सामग्री भेजने के लिए विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।
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