सम्भल में बैसाखी की गूंज: खालसा सृजना दिवस पर संगतों में उमड़ा आस्था का सैलाब।

सम्भल के गुरुद्वारा श्री गुरु नानक दरबार में आज बैसाखी के पावन अवसर पर श्रद्धा, उत्साह और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। ‘खालसा

Apr 14, 2026 - 12:17
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सम्भल में बैसाखी की गूंज: खालसा सृजना दिवस पर संगतों में उमड़ा आस्था का सैलाब।
सम्भल में बैसाखी की गूंज: खालसा सृजना दिवस पर संगतों में उमड़ा आस्था का सैलाब।

उवैस दानिश, सम्भल 

सम्भल के गुरुद्वारा श्री गुरु नानक दरबार में आज बैसाखी के पावन अवसर पर श्रद्धा, उत्साह और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। ‘खालसा सृजना दिवस’ के रूप में मनाए जा रहे इस ऐतिहासिक पर्व पर दूर-दराज़ के गांवों से आई संगत ने पूरे जोश और श्रद्धा के साथ भाग लिया।

ज्ञानी बलविंदर सिंह ने बताया कि 14 अप्रैल 1699 की बैसाखी पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर सिखों को एक विशिष्ट पहचान दी थी। ‘पंज ककार’ देकर उन्होंने सिख धर्म को नई दिशा दी और ‘संत-सिपाही’ का संदेश दिया—जहां भक्ति के साथ-साथ अन्याय के खिलाफ खड़े होना भी जरूरी है। गुरुद्वारा परिसर में आज निशान साहिब की सेवा, चोला साहिब की सेवा और भव्य कीर्तन दरबार का आयोजन किया गया। संगत ने पूरी श्रद्धा के साथ सेवा में हिस्सा लिया और गुरु का लंगर भी प्रेमपूर्वक तैयार किया गया, जिसमें सभी धर्मों के लोगों ने मिलकर सेवा की मिसाल पेश की। वहीं कुलदीप सिंह ने बताया कि बैसाखी केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी खुशी का पर्व है। इस समय गेहूं की फसल पककर घर आती है और किसान गुरु महाराज का शुक्रिया अदा करते हैं। पूरे माहौल में ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ के जयकारों से गूंज उठी। बैसाखी का यह पर्व संभल में एकता, सेवा और भाईचारे का संदेश दे गया।

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