कफ सिरप से 6 मासूमों की दर्दनाक मौत, साधारण सर्दी-खांसी के लिए इलाज न मिला, मिली तो सिर्फ मौत

परिवारों की जुबानी ये कहानियां और भी दर्द भरी हैं। न्यूटन चिखली गांव की रहने वाली आफरीन परवीन अपनी आंखों में आंसू लिए बताती हैं कि उनके पांच साल आठ महीने के बेटे अदनान को हल्का सा

Oct 1, 2025 - 13:27
Oct 1, 2025 - 13:27
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कफ सिरप से 6 मासूमों की दर्दनाक मौत, साधारण सर्दी-खांसी के लिए इलाज न मिला, मिली तो सिर्फ मौत
कफ सिरप से 6 मासूमों की दर्दनाक मौत, साधारण सर्दी-खांसी के लिए इलाज न मिला, मिली तो सिर्फ मौत

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक ऐसी घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है, जहां साधारण सर्दी-खांसी के इलाज के लिए दिए गए कफ सिरप ने छह मासूम बच्चों की जान ले ली। ये बच्चे, जिनकी उम्र मात्र तीन से दस साल के बीच थी, अगस्त महीने से फैली वायरल बुखार की चपेट में आए। शुरू में उन्हें हल्का बुखार और खांसी लगी, लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी किडनी फेल हो गई। डॉक्टरों की जांच में सामने आया कि समस्या का मुख्य कारण दूषित कफ सिरप है, जिसमें डायएथिलीन ग्लाइकॉल नामक जहरीला केमिकल मिला हुआ था। यह केमिकल किडनी को नुकसान पहुंचाने वाला होता है और बच्चों के लिए घातक साबित होता है। जिला प्रशासन ने तुरंत दो संदिग्ध सिरपों पर बैन लगा दिया है और जांच के लिए सैंपल भेजे हैं। यह मामला न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है कि दवाओं की गुणवत्ता पर कितना ध्यान देना जरूरी है।

कहानी की शुरुआत अगस्त के आखिर से हुई। छिंदवाड़ा के परासिया विकासखंड और आसपास के गांवों में बारिश के बाद वायरल फीवर के मामले बढ़ने लगे। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले परिवारों ने बच्चों को स्थानीय डॉक्टरों या दुकानों से दवाएं दिलाईं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर नरेश गोन्नाडे के अनुसार, 24 अगस्त को पहला संदिग्ध केस सामने आया। एक बच्चे को तेज बुखार आया और उसे परासिया के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उसे कफ सिरप दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद बच्चे को पेशाब करने में दिक्कत होने लगी। परिवार ने उसे छिंदवाड़ा के अस्पताल ले जाया, लेकिन हालत बिगड़ने पर नागपुर रेफर किया गया। वहां इलाज के बावजूद बच्चा बच नहीं सका। इसी तरह, सितंबर के पहले हफ्ते में एक के बाद एक बच्चे बीमार पड़ने लगे। चार सितंबर से सात सितंबर के बीच तीन बच्चों की मौत नागपुर के एक निजी अस्पताल में हो गई। डॉक्टरों ने पोस्टमॉर्टम में पाया कि उनकी किडनी पूरी तरह फेल हो चुकी थी।

परिवारों की जुबानी ये कहानियां और भी दर्द भरी हैं। न्यूटन चिखली गांव की रहने वाली आफरीन परवीन अपनी आंखों में आंसू लिए बताती हैं कि उनके पांच साल आठ महीने के बेटे अदनान को हल्का सा बुखार आया था। उन्होंने स्थानीय डॉक्टर से सलाह ली और कफ सिरप दिलाया। दो-तीन दिन तो सब ठीक लगा, लेकिन अचानक अदनान को पेशाब रुक गया। परिवार घबरा गया। उन्हें छिंदवाड़ा ले गए, फिर नागपुर। वहां डॉक्टरों ने बताया कि किडनी में गंभीर संक्रमण है। अदनान को बचाने की सारी कोशिशें नाकाम रहीं। इसी तरह, दिघावनी गांव के चार साल के विकास यादवांशी को भी सिरप देने के बाद यही समस्या हुई। 26 सितंबर को उनकी मौत हो गई। परिवार के लोग आज भी सोचते हैं कि एक साधारण जुकाम ने उनके लाल को क्यों छीन लिया। छिंदवाड़ा कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने बताया कि कुल छह मौतें 4 सितंबर से 26 सितंबर के बीच हुईं। सभी बच्चे परासिया ब्लॉक के ही थे और उनकी उम्र पांच साल से कम थी।

जांच में जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले हैं। मृत बच्चों की किडनी की बायोप्सी रिपोर्ट में पाया गया कि दूषित डायएथिलीन ग्लाइकॉल के कारण ही किडनी फेल हुई। यह केमिकल सिरप को मीठा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्लिसरीन में मिल जाता है, अगर दवा कंपनी गुणवत्ता जांच न करे। ज्यादातर बच्चों को कोल्ड्रिफ और नेक्सट्रो-डीएस नामक सिरप दिए गए थे। कलेक्टर सिंह ने 30 सितंबर को इन दोनों सिरपों की बिक्री और इस्तेमाल पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मेडिकल स्टोर संचालकों को सख्त निर्देश दिए कि बच्चों को कोई कॉम्बिनेशन सिरप न दें। केवल सादा सिरप ही उपलब्ध कराएं। साथ ही, अभिभावकों से अपील की कि झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज न कराएं। कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत योग्य चिकित्सक से संपर्क करें। प्रशासन ने सैंपल एकत्र कर राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरण को भेज दिए हैं। रिपोर्ट आने पर दोषी कंपनियों पर कार्रवाई होगी।

यह पहली बार नहीं है जब कफ सिरप से ऐसी त्रासदी हुई हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में 2022 में गाम्बिया जैसे देशों में भारतीय कंपनियों के सिरप से 70 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी। उसी डायएथिलीन ग्लाइकॉल की वजह से। भारत में भी 2019 में जम्मू-कश्मीर और मुंबई में इसी तरह के मामले सामने आए थे। तब डिजिटल विजन फार्मा कंपनी पर कार्रवाई हुई। लेकिन सबक लेने के बावजूद ऐसी घटनाएं रुक नहीं रही। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में दवाओं की निगरानी कमजोर है। कंपनियां सस्ते में उत्पाद बनाती हैं और टेस्टिंग में लापरवाही बरतती हैं। डॉक्टर नितेश चौहान, जो नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ हैं, बताते हैं कि किडनी इंफेक्शन के शुरुआती लक्षण तेज बुखार, उल्टी, कमजोरी और पेशाब में कमी होते हैं। बच्चों में यह तेजी से फैलता है। अगर छह घंटे तक पेशाब न हो तो तुरंत अस्पताल ले जाएं।

छिंदवाड़ा प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की टीम ने इलाके का दौरा किया और पानी, चूहों के नमूने लिए। रिपोर्ट नेगेटिव आई। अब फोकस दवाओं पर है। जिला पंचायत के सीईओ, मेडिकल कॉलेज डीन और ड्रग इंस्पेक्टरों की बैठक हुई। कलेक्टर ने एडवाइजरी जारी की कि सिरप और दवाएं सावधानी से इस्तेमाल करें। वर्तमान में 12 से ज्यादा बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं। पांच को नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया है। डॉक्टर गोन्नाडे कहते हैं कि अब तक कोई नया केस नहीं आया, लेकिन सतर्कता बरती जा रही है। परासिया को हाई-अलर्ट जोन घोषित कर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग ने घर-घर जाकर जागरूकता अभियान चलाया। माता-पिता को बताया कि बुखार आने पर पैरासिटामॉल जैसी सादा दवा दें, सिरप न पिलाएं।

यह घटना पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर रही है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। लोग अक्सर स्थानीय दुकानों से दवाएं ले लेते हैं बिना प्रिस्क्रिप्शन के। लेकिन अब समय आ गया है कि दवा कंपनियों पर सख्ती हो। केंद्र सरकार ने पहले भी ऐसे मामलों में चेतावनी जारी की थी। अब राजस्थान के सीकर में भी एक बच्चे की इसी सिरप से मौत हो चुकी है। वहां 19 बैचों पर बैन लगा। मध्य प्रदेश सरकार ने भी राज्य स्तर पर जांच शुरू की है। स्वास्थ्य सचिव गायत्री राठौड़ ने कहा कि रिपोर्ट आने पर कड़ी कार्रवाई होगी।

परिवारों का दर्द कम नहीं हो रहा। एक मां कहती हैं कि उनका बच्चा खेलने-कूदने वाला था, अब घर सूना पड़ा है। प्रशासन ने मृतकों के परिवारों को सहायता राशि देने का वादा किया है। लेकिन पैसे से खोई जिंदगी वापस नहीं आती। यह हादसा हमें सिखाता है कि छोटी सी लापरवाही बड़ी त्रासदी ला सकती है। अभिभावक सतर्क रहें, डॉक्टर सावधानी बरतें और कंपनियां जिम्मेदारी निभाएं। तभी हम अपने बच्चों को सुरक्षित रख सकेंगे। छिंदवाड़ा की यह घटना एक सबक है कि स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत बनाने की जरूरत है। उम्मीद है कि जल्द ही दोषियों को सजा मिलेगी और ऐसी घटनाएं न हों।

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