Special: निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी की 700 वर्ष पुरानी परंपरा, हिंदू-मुस्लिम एकता की जीती-जागती मिसाल। 

बसंत पंचमी हिंदू धर्म में वसंत ऋतु के आगमन और मां सरस्वती की पूजा का प्रमुख पर्व है लेकिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह

Jan 23, 2026 - 13:54
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Special: निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी की 700 वर्ष पुरानी परंपरा, हिंदू-मुस्लिम एकता की जीती-जागती मिसाल। 
निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी की 700 वर्ष पुरानी परंपरा, हिंदू-मुस्लिम एकता की जीती-जागती मिसाल। 
  • दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पर बसंत पंचमी मनाई जाती है, अमीर खुसरो ने गुरु के शोक को दूर करने के लिए शुरू की पीली रंग की यह परंपरा
  • बसंत पंचमी पर निजामुद्दीन दरगाह में पीले वस्त्र और फूलों से सजावट, अमीर खुसरो की रचना से जुड़ी 700 साल पुरानी परंपरा जारी

By Sukhmaal Jain(Senior Journalist & Social Activist)

बसंत पंचमी हिंदू धर्म में वसंत ऋतु के आगमन और मां सरस्वती की पूजा का प्रमुख पर्व है लेकिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर भी यह त्योहार पिछले 700 वर्षों से मनाया जा रहा है। इस परंपरा की शुरुआत सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरो से जुड़ी है। दरगाह पर इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग पीले वस्त्र पहनते हैं और पीले फूल लेकर उत्सव मनाते हैं। हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग मिलकर जश्न मनाते हैं। दरगाह पर पीले फूलों से सजावट की जाती है और कव्वाली गाई जाती है। यह परंपरा सूफी बसंत के नाम से जानी जाती है और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

यह परंपरा तब शुरू हुई जब हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भांजे ख्वाजा तकीउद्दीन नूह की मृत्यु से गहरे शोक में थे। भांजे को उन्होंने पुत्र की तरह पाला था और उनकी मृत्यु के बाद संत कई महीनों तक उदास रहे। वे मुस्कुराना बंद कर चुके थे और दरगाह में सभी गतिविधियां रुक गई थीं। उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो ने इस शोक को देखा और गुरु को प्रसन्न करने का उपाय सोचा। एक दिन अमीर खुसरो ने हिंदू महिलाओं को पीले वस्त्र पहने, सरसों के फूल लेकर बसंत पंचमी मनाते देखा। महिलाओं ने बताया कि यह उत्सव देवता को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है।

इससे प्रेरित होकर अमीर खुसरो ने पीले वस्त्र धारण किए। उन्होंने सरसों और टेसू के पीले फूल इकट्ठे किए। पीले रंग की साड़ी या पोशाक पहनकर वे जुलूस लेकर हजरत निजामुद्दीन के पास पहुंचे। उन्होंने पुरबी बोली में गीत गाया जिसमें सरसों के फूलों के खिलने का वर्णन था। प्रसिद्ध रचना है सकल बन फूल रही सरसों। अमीर खुसरो ने फूल गुरु के चरणों में अर्पित किए। इस दृश्य को देखकर हजरत निजामुद्दीन भावुक हो गए और मुस्कुराए। उनका शोक समाप्त हुआ और वे उत्सव में शामिल हो गए।

इस घटना के बाद से निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी की परंपरा शुरू हुई। हर साल इस दिन दरगाह को पीले फूलों से सजाया जाता है। पीले रंग की चादर चढ़ाई जाती है जबकि अन्य दिनों में हरी चादर चढ़ती है। लोग पीले वस्त्र पहनकर आते हैं और कव्वाली सुनते हैं। अमीर खुसरो की रचनाएं गाई जाती हैं। यह उत्सव वसंत के आगमन और आनंद का प्रतीक बन गया। परंपरा 13वीं-14वीं शताब्दी से चली आ रही है और आज भी जारी है।

दरगाह पर इस दिन हजारों लोग विभिन्न धर्मों से आते हैं। उत्सव में संगीत, फूल और पीला रंग प्रमुख होते हैं। अमीर खुसरो की यह पहल सूफी परंपरा में शामिल हो गई। यह घटना सूफी संत और उनके शिष्य के प्रेम को दर्शाती है। परंपरा दरगाह के वार्षिक कैलेंडर का हिस्सा है। लोग यहां एकत्र होकर खुशी मनाते हैं और भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।

बसंत पंचमी पर निजामुद्दीन दरगाह में आयोजित उत्सव भारत की संयुक्त संस्कृति का उदाहरण है। अमीर खुसरो ने हिंदू परंपरा से प्रेरणा लेकर सूफी परंपरा में शामिल किया। हजरत निजामुद्दीन ने इसे अपनाया और तब से यह मनाया जाता है। उत्सव में पीले फूल, वस्त्र और गीत प्रमुख हैं। यह परंपरा सदियों से बिना रुके चली आ रही है।

निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी की परंपरा अमीर खुसरो की गुरु भक्ति और वसंत के प्रति प्रेम से शुरू हुई। भांजे की मृत्यु के शोक को दूर करने के लिए की गई यह पहल आज हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। दरगाह पर पीले रंग का उत्सव 700 वर्षों से जारी है।

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