Deoband: दहेज़ के ख़िलाफ़ बोलते हैं, फिर भी दहेज़ लेते हैं- क़ारी इसहाक़ गोरा की सख़्त टिप्पणी

जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक व जाने माने मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक गोरा ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा कि

By INA News Desk
Jan 5, 2026 - 12:05
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Deoband: दहेज़ के ख़िलाफ़ बोलते हैं, फिर भी दहेज़ लेते हैं- क़ारी इसहाक़ गोरा की सख़्त टिप्पणी
दहेज़ के ख़िलाफ़ बोलते हैं, फिर भी दहेज़ लेते हैं- क़ारी इसहाक़ गोरा की सख़्त टिप्पणी
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देवबंद: जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक व जाने माने मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक गोरा ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा कि “आज हमारा समाज एक गंभीर नैतिक संकट से गुजर रहा है। अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि हमारी सोच के दो चेहरे बन चुके हैं। मंचों और भाषणों में हम सब दहेज़ जैसी सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ बोलते हैं, उसे ग़ैर-इस्लामी और ज़ुल्म क़रार देते हैं, लेकिन जब वही मामला हमारे घरों और रिश्तों तक पहुँचता है, तो हम चुपचाप उसी दहेज़ को स्वीकार कर लेते हैं। यह दोहरापन सिर्फ़ शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार और फैसलों में साफ़ नज़र आता है।

मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि दहेज़ जैसी बुराई तब तक ख़त्म नहीं हो सकती जब तक दहेज़ लेने से साफ़ इनकार करने वाले लोग सामने नहीं आएँगे। उन्होंने खास तौर पर लड़के वालों से अपील की कि अगर लड़की वाले किसी दबाव या सामाजिक रस्म के तहत दहेज़ देने पर ज़िद भी करें, तो लड़के वालों को साफ़ शब्दों में कह देना चाहिए कि अगर दहेज़ के नाम पर एक छोटी-सी चीज़ भी आई, तो वे शादी नहीं करेंगे।

उन्होंने समाज की इस विडंबना की ओर इशारा किया कि हम दहेज़ लेने में तो पीछे नहीं रहते, लेकिन जब निकाह के समय मेहर की बात आती है, तो यही कहकर पीछे हट जाते हैं कि लड़के की इतनी हैसियत नहीं कि वह ज़्यादा मेहर अदा कर सके। जबकि शरीअत में मेहर औरत का हक़ है और दहेज़ की कोई धार्मिक हैसियत नहीं है।

क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि यही दोहरा मापदंड हमारे समाज को अंदर से खोखला कर रहा है। इस्लाम निकाह को आसान बनाने की तालीम देता है, लेकिन हमने उसे इतना मुश्किल बना दिया है कि न जाने कितनी लड़कियाँ सिर्फ़ इस वजह से बैठी रह जाती हैं कि उनके माता-पिता के पास देने के लिए दहेज़ नहीं होता।

उन्होंने चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि कितने ही माँ-बाप इसी फ़िक्र और ग़म में दुनिया से रुख़्सत हो गए कि वे अपनी बेटियों को इज़्ज़त के साथ कैसे विदा करें। आख़िर में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आज हमें सिर्फ़ नारे लगाने की नहीं, बल्कि अपने अमल को दुरुस्त करने की सख़्त ज़रूरत है। जब तक हम दीन की तालीमात को सही मायनों में समझकर अपनी ज़िंदगी में लागू नहीं करेंगे, तब तक ऐसी सामाजिक बुराइयाँ यूँ ही हमारी नस्लों को नुक़सान पहुँचाती रहेंगी।

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