परम्परागत प्रसंस्करण- ग्रामीण महिलाओं को देगा रोजगार। 

"पांच सितारा होटलों की शोभा बिखेरती हैं कैर सांगरी व कुंमट की सब्जी। इसमें काचरी व अमचुर का मेल बेहद निराला है। कोई राजस्थान की शाही सब्जी ...

Nov 13, 2024 - 16:12
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परम्परागत प्रसंस्करण- ग्रामीण महिलाओं को देगा रोजगार। 

अरविन्द सुथार पमाना

लेखक परिचय- वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक

 "पांच सितारा होटलों की शोभा बिखेरती हैं कैर सांगरी व कुंमट की सब्जी। इसमें काचरी व अमचुर का मेल बेहद निराला है। कोई राजस्थान की शाही सब्जी की बात करे तो समझ लीजिए वह कैर सांगरी व कुंमट की बात कर रहा है। प्रसंस्कृत ग्वारफली बैमोसमी सब्जियों की अहसास दिलाती है। राजस्थान का सुप्रसिद्घ पंचकुट इन्हीं से बनता है। शीतला सप्तमी के बास्योड़ा का दारोमदार इसी सब्जी पर निर्भर है।" 

गांवों में महिलाएं किसान, खेतिहर मजदूर, घर परिवार संभालने वाली कुशल ग्रहणी आदि कई बहुमुखी भूमिकाओं में हैं। इसके अलावा महिलाएं अपने हुनर से कृषिगत सहायक उद्यमों के साथ-साथ बागवानी, सब्जी उत्पादन, उपज बिक्री, प्रसंस्करण आदि के कार्य बखूबी निभा रही हैं। प्रसंस्करण एक ऐसा विषय है जिसमें महिलाओं की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। महिला सशक्तिकरण के लिए कृषक महिलाओं को इस हेतु और अधिक प्रशिक्षित व प्रेरित किया जाना बेहद जरूरी है। राजस्थान के रेगिस्तान व अर्द्धरेगिस्तान जिलों में वर्तमान में बेर, खजूर, अनार की बागवानी का विस्तार हो रहा है। फिर भी पश्चिमी राजस्थान की महिलाओं द्वारा परंपरागत विधि "सुखाना" ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से बहुत ही लाभदायक साबित हो सकती है। केर, सांगरी, कुंमट, काचरी आदि उत्पादों को पानी के साथ उच्च तापमान पर उबालकर सूर्य की धूप में सुखाया जाता है। फिर इन्हें नमी के हिसाब से जांच करके पैकिंग कर लिया जाता है। धूप में सुखाने की यह विधि कोई नई नहीं है। हमारे पुरखों द्वारा काम में ली जाने वाली प्रसंस्करण की यह लोकप्रिय विधि है। इसे गांवों में प्रत्येक महिला द्वारा काम में लिया जाता रहा है। महिलाओं को प्रसंस्कृत उत्पादों की अच्छी पैकिंग व बाजार में भेजने तक की प्रक्रियाओं के लिए प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है। 

सांगरी का प्रसंस्करण:- सांगरी राजस्थान के परंपरागत पंचकूट का अभिन्न हिस्सा है। केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान बीकानेर द्वारा तैयार थारशोभा खेजड़ी वर्तमान परिपेक्ष्य में ग्रामीण महिलाओं की किस्मत बदल सकती है। राजस्थान के राज्यपेड़ खेजड़ी से हरी अवस्था में फलियां प्राप्त होती है, इन्हें सांगली कहते हैं। सांगरी को दाना पकने से पूर्व की अवस्था में काट कर उन्हें पानी के साथ उच्च ताप पर नमक डालकर उबाला जाता है। उबलकर सांगरी गलने लगती है, फिर इन्हें एक जाली में पानी सहित उड़ेल कर पानी को अलग किया जाता है। तत्पश्चात कपड़े या ओढ़नी पर इन्हें सूर्य की धूप में सुखा देते हैं। दो-तीन दिन तक सूखने पर यह सख्त हो जाती है वह काले भूरे रंग में कुरकुरी बन जाती हैं। इसके बाद इन्हें मचल कर बारीक टुकड़े बनाकर पैकिंग कर दिया जाता है। सांगरी का बाजार भाव 900 से ₹1000 प्रति किलो है। एक खेजडी़ से सालाना 4-5 हजार की सांगरी मिल जाती। यदि अपने खेत में 50 खेजड़ी के पेड़ हो तो सालाना 2 लाख से ऊपर की आमदनी बिना किसी खर्च से होने की गुंजाइश है। कैर, कुंमट, सांगरी की सब्जी में काचरी या अमचुर का मेल बेहद स्वादिष्ट होता है। राजस्थान में इसे शाही सब्जी भी कहते हैं। आजकल यह सब्जी घरों से निकलकर पांच सितारा होटलों की शोभा बिखेरती नजर आ रही है। 

कैर का प्रसंस्करण:- केर की छाया राजस्थान में जितनी लोकप्रिय है, उतना ही लोकप्रिय कैर का अचार है। कैर को कई रूपों में काम में ले सकते हैं। कैर गोलाकार होता है, जिसे कच्ची अवस्था में तोड़ा जाता है।

 (i) कैर का अचार:- कैर को 5 घंटे तक भिगोकर रखें, छोटी कड़ाही में तेल डालकर 3 मिनट तक तेज आंच पर गर्म करें। आंच बंद करके तेल को ठंडा होने दें। दूसरे बर्तन में सरसों के दाने, मेथी के दाने, लाल मिर्च पाउडर, सौंफ, हल्दी, अमचूर, नमक आदि को गर्म सरसों के तेल में डालकर अच्छी तरह मिलाकर मसाला तैयार कर लें। कैर को पानी से निकालकर तेल वाले मसाले में डालें व उसमें अन्य गर्म किया हुआ शेष तेल डाल दें। तत्पश्चात अचार को चीनी मिट्टी या कांच के बर्तन में डालकर रख लें।
 (ii) कैर को सुखाना:- कैर को हरी अवस्था में तोड़कर उनके डंठल हटा कर नमक के पानी में डाल दें। पानी को हर 12 घंटे बाद बदल दें। दो-तीन दिन पश्चात इन्हें बाहर निकालें व कड़ाही में वापस नमक के पानी में उबालें। उबलने पर यह गल जाएंगे, उसके पश्चात इन्हें जाली पर गिराकर पानी को अलग कर दें। कैर को कपड़े पर बिखेर कर दो तीन दिनों तक धूप में सुखा दें। सूखने के बाद कैर का आकार छोटा हो जाएगा।इन्हें कठोर अवस्था में पैकिंग करते हैं। सूखे हुए कैर 1200 से 1500  रुपए प्रति किलो के भाव से बाजार में बिकते हैं।

कुंमट को प्रसंस्करण:- कुंमट पश्चिमी राजस्थान में होने वाली जंगली वनस्पति है। कृषि वानिकी के अंतर्गत यह अब खेती का भी हिस्सा बनने लगा है। कुछ किसानों ने इसे खेती के रूप में अपनाया है। कुंमट की फलियों से दानों को अलग कर दें, फिर दानों को पानी में उबाल लें, इन्हें तब तक उबालें जब तक कि यह गलने लग जाए। गलने के बाद उनको जाली पर उड़ेल कर पानी को अलग कर दें। तत्पश्चात कपड़े पर धूप में सुखा दें। सूखे हुए कुंमट की पैकिंग कर दें। कुमट को भी 400-500 रू प्रति किलो के हिसाब से बाजार में बेचा जा सकता है।

काचरी का प्रसंस्करण:- काचरी वर्षा ऋतु में खेतों व बाड़ों पर फैलने वाली बेलों से प्राप्त होती है। इन्हें उगाया भी जा सकता है। इनका आकार अंडाकार होता है, यह 70-80 दिन में तोड़ने योग्य हो जाती है। काचरी को अधपकी अवस्था में तोड़कर चाकू या दरांती से पतली पतली फांक या चिप्स के रूप में काटा जाता है। काटने के बाद सीधे ही कपड़े पर डालकर धूप में सुखाया जाता है। 5-7 दिन बाद सूखने पर यह कठोर हो जाती है फिर इन्हें पैकिंग करके घर पर बैमौसमी सब्जी के रूप में काम में ले सकते हैं और बाजार में भी भेज सकते हैं।

ग्वारफली का प्रसंस्करण:- ग्वार जायद व खरीफ में होने वाली फसल है। यह अपनी नाइट्रीकरण शक्ति से जमीन को उपजाऊ करती ही है साथ ही यदि इसकी सब्जी बनाई जाए तो राजस्थानी शाही चस्खे का अहसास कराती है। इसकी कच्ची फलियों की सब्जी में ककड़ी व कच्ची कैरी का संगम तो और भी निराला है। ग्रामीण राजस्थान में होने वाली शादियों में ग्वारफली की सब्जी की भूमिका बहुत ज्यादा है। बात करें इसके प्रसंस्करण की तो प्रसंस्करण का कार्य बहुत आसान है। इन्हें कच्ची अवस्था में तोड़कर पानी में उबाला जाता है। तत्पश्चात पानी को अलग करके धूप में सुखा देते हैं। सुखी हुई ग्वारफली को पैकिंग करके रख देते हैं। प्रसंस्कृत ग्वारफली बैमोसमी सब्जी के रूप में काम आती है, उस वक्त यह ताजा ग्वारफली का अहसास कराती है।

राजस्थान में इनके भण्डारण की तकनीकी भी परम्परागत है। प्रसंस्कृत सांगरी, कैर, कुमट, ग्वारफली आदि को पुराने मटके में रख देते हैं फिर उसको कपड़े से बांध देते हैं। जब आवश्यकता हो तब इनको सब्जी बनाने के काम में लेते हैं।

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इस प्रकार पश्चिमी राजस्थान में जहां एक तो वर्षा की कमी, दूसरी और संसाधन भी विलेपन में ही हैं। ऐसे में महिलाओं को संस्थागत व गैर संस्थागत रूप से प्रशिक्षित करके उन्हें आजीविका के लिए मजबूत बनाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र में समय-समय पर प्रशिक्षण आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीण महिलाओं को इस हेतु जागरूक रहकर प्रशिक्षण में हिस्सा लेना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्र में गृह विज्ञान के तहत महिला विशेषज्ञ द्वारा समय समय पर महिला सशक्तिकरण हेतु कौशल संबंधित बातें सिखाई जाती है।

 इनका कहना- 

महिलाएं परम्परागत प्रसंस्करण के कार्यों से कुछ आमदनी कमाना चाहती हैं तो स्वयं सहायता समूह बनाकर या अन्य रजिस्टर्ड महिला समूह द्वारा अपने उत्पादों को आकर्षक पैकिंग व ग्रेडिंग करके बाजार में भेज सकती हैं। राज्य विपणन बोर्ड या जिला उद्योग केन्द्र से सम्पर्क करके सरकारी सहयोग का भी लाभ ले सकती हैं। इसके अलावा फूड सेक्युरिटी लाइसेंस लेकर कैर, सांगरी, काचरी, ग्वारफली आदि प्रसंस्कृत उत्पादों को किसी कम्पनी के साथ अनुबंध करके भी आय का विकल्प बनाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केन्द्रों में महिलाओं के लिए समय समय पर प्रशिक्षणों का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिलाएं हिस्सा लेकर अपने कौशल को बढा सकती हैं। 
-डॉ प्रकाशचन्द यादव, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र, बामनवाङा, सांचौर।

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