साइबर अपराधियों ने एटीएस अफसर बनकर स्कूल कर्मचारी को 10 दिन तक बंधक बनाया, गाजियाबाद में डिजिटल अरेस्ट का अब तक का सबसे खौफनाक मामला।

देशभर में तेजी से पैर पसार रहे डिजिटल अरेस्ट के मामलों के बीच उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद से एक बेहद चौंकाने वाला

May 16, 2026 - 14:35
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साइबर अपराधियों ने एटीएस अफसर बनकर स्कूल कर्मचारी को 10 दिन तक बंधक बनाया, गाजियाबाद में डिजिटल अरेस्ट का अब तक का सबसे खौफनाक मामला।
साइबर अपराधियों ने एटीएस अफसर बनकर स्कूल कर्मचारी को 10 दिन तक बंधक बनाया, गाजियाबाद में डिजिटल अरेस्ट का अब तक का सबसे खौफनाक मामला।
  • मनी लॉन्ड्रिंग के झूठे जाल में फंसाकर पीड़ित से हड़पे 15.20 लाख रुपये, आरटीजीएस के जरिए अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कराई रकम
  • आतंकवाद निरोधक दस्ते का लोगो और नकली दस्तावेज दिखाकर परिवार को दी जेल भेजने की धमकी, बेटे के दखल के बाद दर्ज हुआ मुकदमा

देशभर में तेजी से पैर पसार रहे डिजिटल अरेस्ट के मामलों के बीच उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद से एक बेहद चौंकाने वाला और डरावना वाकया सामने आया है। यहां सक्रिय शातिर साइबर अपराधियों ने एक प्रतिष्ठित स्कूल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को अपना निशाना बनाते हुए उन्हें लगातार दस दिनों तक मानसिक रूप से बंधक बनाए रखा। अपराधियों ने खुद को आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी एटीएस का वरिष्ठ अधिकारी बताते हुए पीड़ित के भीतर कानूनी कार्रवाई और पूरे परिवार की गिरफ्तारी का ऐसा खौफ पैदा किया कि वे पूरी तरह से उनके नियंत्रण में आ गए। इस लंबी अवधि के दौरान अपराधियों ने पीड़ित की जीवनभर की जमा-पूंजी और विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई कुल 15.20 लाख रुपये की मोटी रकम बड़ी ही चालाकी से अपने अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली। इस सनसनीखेज धोखाधड़ी के बाद जब पीड़ित का मानसिक तनाव चरम पर पहुंच गया, तब जाकर इस पूरे घटनाक्रम का पता चला और अब स्थानीय साइबर क्राइम थाने में इस संबंध में एक गंभीर मुकदमा दर्ज कर कानूनी तफ्तीश शुरू की गई है।

इस बेहद सुनियोजित साइबर अपराध का शिकार हुए 56 वर्षीय पीड़ित अर्जुन सिंह गाजियाबाद के तुराबनगर इलाके के निवासी हैं और वे घंटाघर के पास स्थित एक पुराने इंटर कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर कार्यरत हैं। पीड़ित के अनुसार, इस पूरे जालसाजी के खेल की शुरुआत बीते मार्च महीने की तीस तारीख को हुई थी, जब उनके व्यक्तिगत मोबाइल फोन पर एक अज्ञात नंबर से अचानक कॉल आई। फोन करने वाले अज्ञात व्यक्ति ने अपनी आवाज में भारी कड़कपन और रोब लाते हुए खुद का परिचय एटीएस के इंस्पेक्टर राजेंद्र त्रिपाठी के रूप में दिया। फर्जी इंस्पेक्टर ने पीड़ित को डराते हुए कहा कि उनके नाम और पहचान पत्रों का दुरुपयोग करके दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में एक फर्जी बैंक खाता संचालित किया जा रहा है और उस खाते के माध्यम से देश विरोधी गतिविधियों तथा करोड़ों रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग के अवैध वित्तीय लेनदेन को अंजाम दिया जा रहा है। डिजिटल अरेस्ट वर्तमान समय में साइबर अपराधियों द्वारा अपनाया जाने वाला एक बेहद खतरनाक और मनोवैज्ञानिक तरीका है। इसमें अपराधी पीड़ित को वीडियो कॉल के जरिए चौबीसों घंटे अपनी नजरों के सामने रहने पर मजबूर करते हैं। वे पीड़ित को कानून का डर दिखाकर किसी से भी संपर्क करने या कमरे से बाहर जाने की इजाजत नहीं देते, जिससे इंसान का विवेक काम करना बंद कर देता है और वह आसानी से वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है।

शुरुआती कॉल के तुरंत बाद जब पीड़ित ने खुद को बेकसूर बताते हुए अपनी बात रखनी चाही, तो ठगों ने उन्हें तुरंत एक स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर आने के लिए मजबूर किया। वीडियो कॉल शुरू होते ही अपराधियों ने पीड़ित के सामने एटीएस का आधिकारिक दिखने वाला नकली लोगो, भारतीय रिजर्व बैंक के कथित सील-सिक्के लगे फर्जी दस्तावेज और सुप्रीम कोर्ट के नाम पर तैयार किए गए फर्जी अरेस्ट वारंट जैसे गंभीर कागजात स्क्रीन पर प्रदर्शित किए। अपराधियों ने बेहद पेशेवर अंदाज में पीड़ित को यह विश्वास दिला दिया कि उनके खिलाफ एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जांच चल रही है। ठगों ने साफ शब्दों में धमकी दी कि यदि उन्होंने इस पूरी जांच प्रक्रिया में उनके साथ तत्काल और पूरी तरह से सहयोग नहीं किया, तो अगले कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस की एक विशेष टीम गाजियाबाद पहुंचकर उनके पूरे परिवार को कस्टडी में ले लेगी और उन्हें कई सालों के लिए जेल भेज दिया जाएगा।

इस खौफनाक धमकी और फर्जी अदालती माहौल के कारण पीड़ित अर्जुन सिंह गहरे मानसिक दबाव और अवसाद की स्थिति में चले गए। साइबर अपराधी उन्हें दिन के कई-कई घंटे लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने का आदेश देते थे और स्थिति यह थी कि उन्हें हर एक घंटे बाद अपनी उपस्थिति की रिपोर्ट अपराधियों को देनी पड़ती थी। इस चरम मानसिक प्रताड़ना के बीच, अपराधियों ने मामले को रफा-दफा करने और अदालती जांच से नाम हटाने के नाम पर पैसों की मांग शुरू की। पूरी तरह सहम चुके पीड़ित ने अपनी और परिवार की इज्जत बचाने के लिए दो अप्रैल को अपने बैंक खाते का रुख किया और वहां से अपराधियों द्वारा बताए गए एक अज्ञात खाते में आरटीजीएस के माध्यम से 2.20 लाख रुपये की पहली किस्त ट्रांसफर कर दी। इसके बाद भी ठगों का पेट नहीं भरा और उन्होंने जांच का दायरा बढ़ने की बात कहकर और पैसों का दबाव बनाया, जिसके चलते पीड़ित ने चार अप्रैल को दोबारा बैंक जाकर तीन लाख रुपये की एक और भारी रकम उनके खातों में जमा करवा दी।

आरोपियों का हौसला पीड़ित के अत्यधिक डर को देखकर और ज्यादा बढ़ गया था। छह अप्रैल को ठगों ने पीड़ित को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे तुरंत दस लाख रुपये का इंतजाम नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ तत्काल प्रभाव से रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर दिया जाएगा। कानूनी दांव-पेंचों से पूरी तरह अनभिज्ञ पीड़ित ने इस धमकी के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए और किसी तरह व्यवस्था करके छह अप्रैल को ही पूरे दस लाख रुपये और अपराधियों के खातों में आरटीजीएस के जरिए भेज दिए। लगातार दस दिनों तक इस अदृश्य डिजिटल कारागार में रहने और धमकियों का सामना करने के कारण पीड़ित शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे। वे अपने ही घर के भीतर एक कैदी की तरह जीवन जी रहे थे और किसी भी बाहरी व्यक्ति या अपने सगे-संबंधियों से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

इस पूरे काले कारनामे का पटाक्षेप तब हुआ जब सात अप्रैल को साइबर अपराधियों ने लालच की सभी हदें पार करते हुए पीड़ित अर्जुन सिंह से एक बार फिर दस लाख रुपये और जमा कराने की सख्त मांग की। इतनी बड़ी रकम का दोबारा इंतजाम करना पीड़ित के वश से पूरी तरह बाहर हो चुका था, जिसके कारण उनकी घबराहट और मानसिक स्थिति को देखकर उनके परिवार के सदस्यों को कुछ गंभीर गड़बड़ी होने का संदेह हुआ। काफी कुरेदने और सांत्वना देने के बाद आखिरकार अर्जुन सिंह ने अपने बेटों और पत्नी के सामने पिछले दस दिनों से चल रही इस पूरी खौफनाक दास्तां को विस्तार से बयान किया। उनके बेटे ने पूरी बात सुनते ही तुरंत स्थिति को भांप लिया और पिता को समझाया कि वे किसी असली पुलिस या एटीएस की जांच का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे एक बेहद शातिर अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड गैंग का शिकार हो चुके हैं।

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