Ajab Ghazab : शादी के 18 साल बाद पति ने पंचायत में बीवी को प्रेमी के हाथों सौंपा।
लखीमपुर खीरी की अनोखी कहानी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि सामाजिक...
लखीमपुर खीरी की अनोखी कहानी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से भी कई सवाल खड़े करती है। यह कहानी है एक पति की, जिसने अपनी पत्नी के प्रेम प्रसंग को स्वीकार करते हुए, शादी के 18 साल बाद उसे पंचायत के सामने उसके प्रेमी के साथ ब्याहने का फैसला किया। इस अनोखी घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को चौंकाया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह खबर तेजी से वायरल हो रही है।
यह मामला लखीमपुर खीरी के एक छोटे से गांव का है, जहां एक दंपति 18 साल से वैवाहिक जीवन बिता रहा था। इस दंपति के बीच लंबे समय से रिश्तों में तनाव चल रहा था। सूत्रों के अनुसार, पत्नी का अपने पति के चचेरे भाई के साथ प्रेम प्रसंग था, जो कई सालों से चला आ रहा था। इस बात की जानकारी जब पति को हुई, तो उसने इसे छिपाने या विरोध करने के बजाय एक अनोखा रास्ता चुना। उसने गांव की पंचायत बुलाई और सभी के सामने अपनी पत्नी का हाथ उसके प्रेमी के हाथ में सौंप दिया। इतना ही नहीं, पंचायत में ही दोनों की शादी का ऐलान भी कर दिया गया। इस घटना की खबर 28 मई 2025 को विभिन्न सोशल मीडिया मंचों और समाचार माध्यमों में तेजी से फैली।
पति-पत्नी की शादी को 18 साल हो चुके थे, और उनके बीच कई वर्षों से अनबन चल रही थी। पति को पत्नी के प्रेम प्रसंग की जानकारी थी, लेकिन उसने इसे पहले नजरअंदाज करने की कोशिश की। हालांकि, जब यह रिश्ता खुलकर सामने आया, तो उसने इसे सामाजिक रूप से हल करने का फैसला किया। पंचायत में पति ने न केवल अपनी पत्नी को प्रेमी के साथ जाने की अनुमति दी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि यह फैसला सभी की सहमति से हो।प्रेमी, जो पति का चचेरा भाई है, और पत्नी के बीच का रिश्ता कई साल पुराना बताया जा रहा है। यह रिश्ता परिवार के लिए कोई नई बात नहीं थी, लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना और पंचायत में शादी का फैसला करना एक अभूतपूर्व कदम था। पंचायत ने भी इस फैसले का समर्थन किया और इसे सामाजिक रूप से मान्यता दी। इस घटना में बच्चों का कोई जिक्र नहीं है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दंपति के बच्चे नहीं थे या इस मामले में उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
यह घटना कई मायनों में भारतीय समाज की पारंपरिक संरचना को चुनौती देती है। भारतीय संस्कृति में शादी को सात जन्मों का बंधन माना जाता है, और तलाक या दूसरी शादी जैसे फैसले अक्सर सामाजिक तिरस्कार का कारण बनते हैं। इस मामले में, पति ने न केवल अपनी पत्नी के प्रेम प्रसंग को स्वीकार किया, बल्कि उसे सामाजिक रूप से सम्मानजनक तरीके से हल करने की कोशिश की। यह कदम न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।पति का यह फैसला दर्शाता है कि वह अपनी पत्नी की खुशी को प्राथमिकता देना चाहता था, भले ही इसके लिए उसे अपने वैवाहिक बंधन को तोड़ना पड़ा। यह एक ओर उदारता और त्याग का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि क्या यह फैसला सामाजिक दबाव या भावनात्मक थकान का परिणाम था। पत्नी की ओर से भी इस मामले में कोई विरोध या असहमति की खबर नहीं आई, जिससे यह माना जा सकता है कि वह भी इस नए रिश्ते को स्वीकार करने के लिए तैयार थी।
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कानूनी दृष्टिकोण से, इस मामले में तलाक की प्रक्रिया का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। भारत में तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, और पंचायत का फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जाता। यह संभव है कि दंपति ने आपसी सहमति से तलाक लिया हो या फिर इसकी प्रक्रिया चल रही हो। नैतिक रूप से, यह घटना समाज में प्रेम, विवाह, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर बहस छेड़ती है। क्या पति का यह फैसला सामाजिक दबाव के कारण था, या उसने वास्तव में अपनी पत्नी की खुशी को प्राथमिकता दी? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है।
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