Trending: इटावा कथावाचक मामला- शंकराचार्य बोले, सार्वजनिक रूप से कथा कहने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को...
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के दांदरपुर गांव में एक शर्मनाक और अमानवीय घटना ने सामाजिक और धार्मिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल खड़े ....
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के दांदरपुर गांव में एक शर्मनाक और अमानवीय घटना ने सामाजिक और धार्मिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। श्रीमद्भागवत कथा के लिए आमंत्रित यादव जाति के कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके सहायक संत कुमार यादव के साथ कथित तौर पर मारपीट, अपमान और ‘शुद्धिकरण’ के नाम पर बर्बरता की गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीड़ितों को सम्मानित किया, वहीं ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयान ने विवाद को और हवा दी। शंकराचार्य ने कहा कि “सार्वजनिक रूप से कथा कहने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को है,” जिसने सामाजिक समानता और धार्मिक कर्मकांडों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
- दांदरपुर में जातिगत हिंसा
21 जून 2025 को इटावा के बकेवर थाना क्षेत्र के दांदरपुर गांव में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया था। इस आयोजन के लिए औरैया के अछल्दा से कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके सहायक संत कुमार यादव को बुलाया गया था। मुकुट मणि ने बताया कि कथा के पहले दिन कलश यात्रा के बाद कुछ ग्रामीणों ने उनकी जाति पूछी। जब उन्होंने बताया कि वे यादव हैं, तो कुछ लोगों ने आपत्ति जताई और उनके साथ अभद्रता शुरू कर दी।
पीड़ितों के अनुसार, रात होने पर गांव के कुछ दबंगों ने उन्हें बंधक बनाकर मारपीट की। मुकुट मणि ने बताया, “उन्होंने हमें लात-घूंसे, जूतों और चप्पलों से पीटा। हमारी चोटी और बाल काटे गए, और एक महिला के पैरों पर नाक रगड़वाने को मजबूर किया गया।” सबसे चौंकाने वाला आरोप यह था कि उन पर पेशाब छिड़ककर ‘शुद्धिकरण’ करने का नाटक किया गया। उनकी सोने की चेन, 25,000 रुपये नकद, और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्र तोड़ दिए गए। इस पूरी घटना का वीडियो बनाया गया, जो 23 जून को सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
- दूसरे पक्ष का दावा: धोखाधड़ी या जातिगत विवाद?
आयोजकों और कुछ ग्रामीणों ने दावा किया कि कथावाचकों ने अपनी जाति छिपाकर खुद को अग्निहोत्री ब्राह्मण बताया था। जब उनकी असल जाति (यादव) का पता चला, तो ग्रामीणों में गुस्सा भड़क गया। आयोजक परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि कथावाचकों ने यजमान की पत्नी के साथ छेड़छाड़ की, जिसके बाद यह घटना हुई। हालांकि, पुलिस ने अभी तक छेड़छाड़ के आरोपों की पुष्टि नहीं की है। ग्रामीणों का कहना है कि कथावाचकों को अपनी जाति छिपाने की वजह से ‘सजा’ दी गई।
वायरल वीडियो के बाद इटावा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) बृजेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि 23 जून को साइबर सेल को वीडियो मिला, जिसके आधार पर धारा 115(2), 309(2), 351(2), और 352 बीएनएसएस के तहत मामला दर्ज किया गया। चार आरोपियों—आशीष तिवारी (21), उत्तम अवस्थी (19), प्रथम दुबे (24), और निक्की अवस्थी (30)—को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। निक्की अवस्थी को वीडियो में बाल काटते देखा गया। अपर पुलिस अधीक्षक (एएसपी) सिटी अभयनाथ त्रिपाठी को जांच सौंपी गई है।
पुलिस ने कहा कि मामले की गहन जांच की जा रही है, और अन्य अज्ञात आरोपियों की तलाश जारी है। एसएसपी ने यह भी बताया कि पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।
- शंकराचार्य का विवादित बयान
इस घटना के बाद ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का बयान ने मामले को और तूल दे दिया। उन्होंने 24 जून को कहा, “सार्वजनिक रूप से कथा कहने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को है। शास्त्रों के अनुसार, सभी जातियों को कथा सुनाने के लिए ब्राह्मण ही उपयुक्त हैं।” उन्होंने कथावाचकों पर अपनी जाति छिपाने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह धोखाधड़ी है और इसके लिए धारा 419-420 के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। शंकराचार्य ने अखिलेश यादव पर भी निशाना साधा, यह कहते हुए कि “वे धोखाधड़ी करने वालों को सम्मानित कर रहे हैं।”
इस बयान ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं बटोरीं। कुछ लोगों ने इसे जातिवादी सोच का प्रतीक बताया, जबकि अन्य ने शंकराचार्य के शास्त्रीय तर्क का समर्थन किया। एक X यूजर ने लिखा, “यह बयान संविधान और सामाजिक समानता का अपमान है।” वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा, “शंकराचार्य ने शास्त्रों की बात की है, इसमें गलत क्या है?”
- अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया और सम्मान
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस घटना को “संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन” करार देते हुए 23 जून को X पर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, “इटावा के दांदरपुर गांव में भागवत कथा के दौरान कथावाचकों की जाति पूछकर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज के लोगों के साथ अभद्रता की गई। यह सामाजिक न्याय पर हमला है।” उन्होंने तीन दिनों में कार्रवाई न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी।
24 जून को लखनऊ में सपा मुख्यालय पर अखिलेश ने पीड़ित कथावाचकों को सम्मानित किया। उन्होंने मुकुट मणि और संत कुमार को 21-21 हजार रुपये की नकद सहायता दी और सपा की ओर से 51-51 हजार रुपये देने की घोषणा की। अखिलेश ने कहा, “जब भागवत कथा सब सुन सकते हैं, तो इसे कोई भी सुना सकता है। धार्मिक कर्मकांडों पर किसी एक जाति का एकाधिकार नहीं हो सकता।” उन्होंने बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह घटना पीडीए समाज को दबाने की साजिश का हिस्सा है।
- सामाजिक और धार्मिक बहस
शंकराचार्य के बयान ने एक गहरी सामाजिक और धार्मिक बहस को जन्म दिया है। कई लोगों का मानना है कि यह बयान संविधान के अनुच्छेद 14 और 15, जो समानता और भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा की गारंटी देते हैं, का उल्लंघन करता है। सामाजिक कार्यकर्ता रीना मेहता कहती हैं, “यह 21वीं सदी है, और हमें धार्मिक कर्मकांडों को जाति के दायरे से बाहर लाना होगा।”
वहीं, पुराणों में कई गैर-ब्राह्मण कथावाचकों का उल्लेख है, जैसे सूत जी, जिन्होंने स्कंद पुराण की कथाएं सुनाई थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि सनातन धर्म में कथा वाचन का अधिकार सभी को रहा है, और शंकराचार्य का बयान शास्त्रों की एक संकीर्ण व्याख्या को दर्शाता है।
इस मामले ने उत्तर प्रदेश की सियासत को गरमा दिया है। सपा सांसद जितेंद्र दोहरे और विधायक राघवेंद्र गौतम ने पीड़ितों के साथ एसएसपी से मुलाकात कर कार्रवाई की मांग की। इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील डॉ. गजेंद्र सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज की, जिसमें इस घटना को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया गया।
उधर, बीजेपी ने इस मामले को सामाजिक विद्वेष का मुद्दा बताते हुए कहा कि यह पीडीए बनाम गैर-पीडीए का मामला नहीं है। मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने कहा, “पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की है, और दोषियों को सजा मिलेगी।”
इटावा का यह मामला न केवल जातिगत भेदभाव की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, बल्कि धार्मिक कर्मकांडों में समानता के अधिकार पर भी सवाल उठाता है। शंकराचार्य का बयान जहां पारंपरिक शास्त्रीय दृष्टिकोण को दर्शाता है, वहीं अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया और पीड़ितों का समर्थन सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम है।
यह घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या धार्मिक मंचों पर जातिगत वर्चस्व को बनाए रखने की मानसिकता को स्वीकार किया जा सकता है? सरकार, समाज और धार्मिक नेताओं को मिलकर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। शिक्षा, जागरूकता और सख्त कानूनी कार्रवाई के जरिए ही हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं, जहां कथा सुनाने का हक सभी को हो, न कि किसी एक जाति विशेष को।
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