Rajasthan News: ‘राजस्थान का साहित्यिक आंदोलन‘‘ पुस्तक के बाद आने वाली नई पुस्तक के अंश।

‘राजस्थान की कला और संस्कृति: गौरवमयी विरासत‘- अनिल सक्सेना ‘ललकार‘

By INA News Desk
Feb 25, 2025 - 20:01
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Rajasthan News: ‘राजस्थान का साहित्यिक आंदोलन‘‘ पुस्तक के बाद आने वाली नई पुस्तक के अंश।
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रिपोर्ट- अम्बरीष कुमार सक्सेना

जयपुर। राजस्थान के साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में सन 2010 से प्रदेश के प्रत्येक जिले में मेरा जाना हुआ। हर शहर और गांव की विशेषताओं की जानकारी प्राप्त की। कलमकार और कलाकारों के साथ ही पिछले 14 सालों में राजस्थान की लुप्त होती कलाओं को संजोने के उद्देश्य को लेकर भी कार्य किये।

मैं राजस्थान के साहित्यिक आंदोलन को लेकर पाकिस्तान बाॅर्डर से जुड़े जिले जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और गंगानगर के साथ ही आदिवासी जिले बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, धरियावद और गुजरात बार्डर पर स्थित माउंट आबू, मध्यप्रदेश बार्डर पर स्थित निम्बाहेड़ा, उत्तरप्रदेश बार्डर पर स्थित भरतपुर, धौलपुर, पंजाब बार्डर पर स्थित श्रीगंगानगर, हरियाणा बार्डर के नजदीक शहर चूरू और झुंझुनू के साथ ही प्रदेश के लगभग सभी जिलों में पहुंचा। मतलब यह है कि साहित्य, संस्कृति, कला और पत्रकारिता को लेकर राजस्थान के एक कोने से लेकर दूसरे सभी कोनांे तक में मेरा जाना हुआ है। वहां की संस्कृति और कला को जाना। कलमकारों और कलाकारों को एक मंच पर लाकर चर्चा-परिचर्चा की। युवाओं को साहित्य से जोड़ने की मुहिम चलाई। व्याख्यान, लेखक की बात, सेमिनार, कार्यशालाएं जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किये।    

मैंने ‘राजस्थान का साहित्यिक आंदोलन‘ पुस्तक में कई पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित कर महान कलमकारों के साथ ही दिंवगत पत्रकारों को याद करते हुए साहित्य और पत्रकारिता पर फोकस किया है। अब 14 सालों से चल रहे ‘राजस्थान का साहित्यिक आंदोलन‘ में प्रदेश की कलाएं और संस्कृति को लेकर मेरे अनुभव और जानकारी को पुस्तक का रूप दिया है, जिसका नाम है ‘राजस्थान की कला और संस्कृति: गौरवमयी विरासत‘।
 
राजस्थान की संस्कृति समृद्ध और विविधतापूर्ण है। यहां की संस्कृति में परंपराओं, रीति-रिवाजों, और मान्यताओं का एक समृद्ध ताना-बाना है। इसी तरह राजस्थान के इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्य, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्त्र-आभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है।

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राजस्थान की संस्कृति में रंगीन त्योहार, स्वादिष्ट भोजन, लोक संगीत और नृत्य, पारंपरिक कलाकृतियां, मेहमाननवाजी, घूमर और कालबेलिया दो नृत्य शैलियां, लोक संगीत, पारंपरिक रंगीन कलाकृतियों के साथ ही ब्लॉक प्रिंट और फर्नीचर पर जटिल नक्काशी, वस्त्र, अर्ध-कीमती पत्थर, हस्तशिल्प, फर्नीचर उद्योग भी खासा लोकप्रिय है।

राजस्थान की संस्कृति की सबसे अच्छी बात यह है कि यहां हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध और अन्य जाति धर्म के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं। इन अवसरों पर उत्साह व उल्लास का बोलबाला रहता है। यहां ‘‘अतिथि देवो भव‘‘ की परम्परा का बहुत महत्व है। इसी कारण यहां ‘‘पधारो म्हारे देश‘‘ एक लोकप्रिय लोकगीत है।  राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। राजस्थान में लगभग हर माह धार्मिक उत्सव मनाये जाते हैं। यहाँ ‘सात वार नौ त्योहार‘ कहावत प्रसिद्ध हैं।

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