साबरकांठा में किसानों ने दूध सड़कों पर बहाया, 20-25% मूल्य वृद्धि की मांग, चेतावनी- 'न्याय नहीं तो और दूध बहाएंगे'
Gujarat News: गुजरात के साबरकांठा और अरावली जिलों में दूध उत्पादक किसानों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। साबर डेयरी द्वारा दूध खरीद मूल्य में केवल...
गुजरात के साबरकांठा और अरावली जिलों में दूध उत्पादक किसानों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। साबर डेयरी द्वारा दूध खरीद मूल्य में केवल 9.75% की वृद्धि की घोषणा के बाद, किसानों ने इसे अपर्याप्त बताते हुए 20-25% वृद्धि की मांग की। अपनी मांगों को लेकर किसानों ने साबर डेयरी के बाहर प्रदर्शन किया, दूध सड़कों पर बहाया और डेयरी की आपूर्ति श्रृंखला को ठप कर दिया। यह विरोध 14 जुलाई 2025 को शुरू हुआ और तीन दिनों तक चला, जिसमें हिंसा, पुलिस के साथ झड़प और एक किसान की मौत की दुखद घटना भी शामिल है। किसानों ने चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे और दूध सड़कों पर बहाएंगे।
- साबरकांठा: गुजरात का दूध उत्पादन केंद्र
साबरकांठा जिला, जिसमें 1,389 गांव और लगभग 25 लाख की आबादी है, गुजरात का दूसरा सबसे बड़ा दूध उत्पादक क्षेत्र है। 2022-23 में इस जिले ने लगभग 9,58,000 टन दूध का उत्पादन किया। यहां डेयरी उद्योग कृषि के बाद दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि है, जिसमें 70% से अधिक ग्रामीण परिवार पशुपालन में शामिल हैं। ज्यादातर छोटे किसान हैं, जो 2-5 पशुओं को पालते हैं। स्थानीय स्तर पर प्रचलित सुरती भैंसें औसतन 1,600-1,800 लीटर दूध प्रति दुग्धकाल देती हैं, जो जिले के दूध उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। साबर डेयरी, जो 1964 में स्थापित साबरकांठा जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ है, 1,700 से अधिक गांवों से दूध एकत्र करती है और अमूल/गुजरात सहकारी दूध विपणन महासंघ (GCMMF) का एक प्रमुख सदस्य है। 2023-24 में इसका कारोबार 8,939 करोड़ रुपये को पार कर गया, जो इसे गुजरात की तीसरी सबसे बड़ी डेयरी सहकारी संस्था बनाता है।
- विरोध की वजह: दूध खरीद मूल्य में कमी
साबर डेयरी के किसानों का गुस्सा पिछले साल की तुलना में इस साल बोनस और प्रोत्साहन भुगतान में भारी कटौती के कारण भड़का। पिछले साल डेयरी ने 602 करोड़ रुपये का बोनस वितरित किया था, जिसके परिणामस्वरूप दूध की कीमतों में 17% की वृद्धि हुई थी। लेकिन इस साल यह राशि घटकर 350-500 करोड़ रुपये हो गई, और प्रोत्साहन वृद्धि केवल 9.75% रही। किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत, जैसे चारे की कीमतें, पशुओं की देखभाल और अन्य खर्चों को देखते हुए यह वृद्धि नाकाफी है।
वर्तमान में साबर डेयरी भैंस के दूध के लिए 850-810 रुपये प्रति किलो वसा और गाय के दूध के लिए 370-277 रुपये प्रति किलो वसा दे रही है, जो दूध की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। किसान अरविंदभाई पटेल, जो 15 साल से साबर डेयरी से जुड़े हैं, ने कहा, “भैंस का दूध ठीक है क्योंकि उनकी देखभाल में कम खर्च आता है, लेकिन गाय के दूध की कीमत बहुत कम है। गायों की देखभाल और अच्छी गुणवत्ता वाले दूध के लिए होने वाला खर्च इस कीमत से पूरा नहीं होता।” किसानों का कहना है कि दूध की कीमत में 20-25% की वृद्धि उनकी मेहनत और लागत को संतुलित करने के लिए जरूरी है।
- विरोध की शुरुआत और हिंसा
14 जुलाई 2025 को साबरकांठा के हिम्मतनगर में साबर डेयरी के बाहर हजारों पशुपालक और किसान एकत्र हुए। उनकी मांग थी कि डेयरी प्रबंधन दूध खरीद मूल्य में 25% की वृद्धि करे। शुरुआत में यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन जब किसानों को डेयरी के मुख्य द्वार पर रोका गया, तो स्थिति बिगड़ गई। कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके, जिससे तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए और कई पुलिस वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लगभग 50 आंसू गैस के गोले दागने पड़े और लाठीचार्ज करना पड़ा।
प्रदर्शन ने हिम्मतनगर-तलोद राजमार्ग को भी जाम कर दिया, जिससे कई घंटों तक यातायात ठप रहा। प्रदर्शनकारियों ने डेयरी के मुख्य द्वार, बाड़ और सीसीटीवी कैमरों को नुकसान पहुंचाया। इस हिंसा के बाद पुलिस ने 40 लोगों को हिरासत में लिया और 1,000 से अधिक लोगों, जिसमें पूर्व कांग्रेस विधायक जशुभाई पटेल और इदार तालुका के धर्मेंद्रसिंह जेतावत शामिल हैं, के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।
- दुखद घटना: एक किसान की मौत
प्रदर्शन के दौरान एक दुखद घटना ने स्थिति को और गंभीर कर दिया। आम आदमी पार्टी (AAP) ने दावा किया कि प्रदर्शनकारी अशोक चौधरी की विरोध के दौरान मौत हो गई। हालांकि, पुलिस ने कहा कि अशोक चौधरी को घर पहुंचने के बाद सीने में दर्द की शिकायत हुई और अस्पताल ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने किसानों के गुस्से को और भड़का दिया। उन्होंने चार प्रमुख मांगें रखीं: सभी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जाएं, अशोक चौधरी की मौत की जांच हो, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया जाए, और मृतक के परिवार को राज्य सरकार और साबर डेयरी से 1-1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।
- दूध सड़कों पर: विरोध का प्रतीक
प्रदर्शन के तीसरे दिन, 16 जुलाई 2025 को, साबरकांठा और अरावली के किसानों ने अपनी नाराजगी जताने के लिए हजारों लीटर दूध सड़कों पर बहा दिया। मोती इसरोल, मेघराज और अंबलिया जैसे गांवों की 400 से अधिक ग्राम समितियों ने दूध की आपूर्ति रोक दी और स्थानीय डेयरी प्रमुखों की कुर्सियों पर प्रतीकात्मक रूप से कब्जा कर लिया। इस विरोध ने डेयरी की आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ठप कर दिया, जिसके कारण पाश्चुरीकृत दूध के पाउच की आपूर्ति बंद हो गई। शहरी क्षेत्रों में दूध की कमी की आशंका बढ़ गई, जिससे आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
एक महिला किसान ने कहा, “हम केवल इतना चाहते हैं कि दूध की कीमत से हमें 20-25% मुनाफा मिले। हमारे गौशालाओं में आकर देखें कि हम कितनी मेहनत करते हैं। गोबर उठाने से लेकर चारा काटने और दूध निकालने तक, पूरा परिवार दिन-रात काम करता है। हमें हमारी मेहनत का उचित मूल्य चाहिए।”
- साबर डेयरी का जवाब
पांच दिनों के तीव्र विरोध के बाद, 19 जुलाई 2025 को साबर डेयरी ने दूध खरीद मूल्य को संशोधित करने की घोषणा की। डेयरी ने प्रति किलो वसा 990 रुपये से बढ़ाकर 995 रुपये करने का फैसला किया, जो 960 रुपये की अग्रिम राशि और शेष 35 रुपये सामान्य सभा के बाद वितरित किए जाएंगे। हालांकि, किसानों का कहना है कि यह वृद्धि उनकी 20-25% की मांग से बहुत कम है और उनकी लागत को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
डेयरी अधिकारियों ने कहा कि ऑडिट के कारण इस साल मूल्य वृद्धि में देरी हुई, लेकिन एक अंतरिम वृद्धि पहले ही लागू की जा चुकी है। फिर भी, किसानों का गुस्सा शांत नहीं हुआ, और उन्होंने अपनी मांगों को पूरा करने के लिए और सख्त कदम उठाने की चेतावनी दी।
इस प्रदर्शन को स्थानीय नेताओं का भी समर्थन मिला। बायड के स्वतंत्र विधायक धवलसिंह जाला ने किसानों का साथ दिया और डेयरी प्रबंधन पर उनकी मांगों को दबाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “यह डेयरी किसानों की मेहनत पर खड़ी है। उन्हें उचित मूल्य मिलना चाहिए।” कांग्रेस के राज्यसभा सांसद शक्तिसिंह गोहिल और आप के गुजरात इकाई अध्यक्ष इसुदान गढ़वी ने भी सरकार और डेयरी प्रबंधन की आलोचना की। गोहिल ने कहा कि अगर किसानों को डेयरी के अंदर बातचीत के लिए बुलाया जाता, तो शायद एक जान नहीं जाती।
कुछ X पोस्ट में यह भी चिंता जताई गई कि अगर भारत सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में सस्ते अमेरिकी दूध उत्पादों को भारत में आयात करने की अनुमति देती है, तो स्थानीय डेयरी किसानों की स्थिति और खराब हो सकती है।
साबरकांठा और अरावली के किसानों का यह विरोध न केवल दूध की कीमतों की मांग है, बल्कि उनकी मेहनत और जीविका की लड़ाई है। दूध सड़कों पर बहाना उनकी मजबूरी और गुस्से का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि उनकी लागत और मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल रहा। साबर डेयरी द्वारा की गई 995 रुपये प्रति किलो वसा की घोषणा किसानों की मांगों से बहुत कम है, और उनकी चेतावनी कि “न्याय नहीं मिला तो और दूध बहाएंगे” स्थिति की गंभीरता को दर्शाती है। यह विरोध न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींच रहा है, खासकर जब विदेशी दूध उत्पादों के आयात का खतरा मंडरा रहा है।
What's Your Reaction?











