Hardoi: बरम्हौला की सर्द हवाओं में टूटती उम्मीदें: बेदू की बेआसरी और सरकारी कागजों की बेरहमी,अपात्र का ठप्पा। 

बरम्हौला की सर्द हवाओं में इस वक्त अगर कोई सबसे ज़्यादा बेआसरा है, तो वह हैं वेदप्रकाश, जिन्हें गांव में सब 'बेदू' कहकर बुलाते हैं। उनकी

By INA News Desk
Dec 13, 2025 - 14:58
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Hardoi: बरम्हौला की सर्द हवाओं में टूटती उम्मीदें: बेदू की बेआसरी और सरकारी कागजों की बेरहमी,अपात्र का ठप्पा। 
बरम्हौला की सर्द हवाओं में टूटती उम्मीदें: बेदू की बेआसरी और सरकारी कागजों की बेरहमी,अपात्र का ठप्पा। 

​बरम्हौला, हरदोई: बरम्हौला की सर्द हवाओं में इस वक्त अगर कोई सबसे ज़्यादा बेआसरा है, तो वह हैं वेदप्रकाश, जिन्हें गांव में सब 'बेदू' कहकर बुलाते हैं। उनकी कहानी सिर्फ गरीबी की नहीं, बल्कि उस टूटी हुई उम्मीद की दास्तान है, जिसे सरकारी कागज़ों ने बेरहमी से कुचल दिया।

​बेदू का परिवार – खुद बेदू, उनकी धर्मपत्नी और एक मासूम बेटी – गरीबी की ऐसी दलदल में धँसे हैं जहाँ रोटी और सम्मान दोनों दुर्लभ हैं। 

बच्ची का शरीर कमजोर है, पढ़ने की उम्र है पर किताबों की जगह, वह हर दिन अपने पिता को दिहाड़ी के लिए भटकते देखती है। बेदू के पास अक्सर हरदोई जाने के लिए किराए के पैसे भी नहीं होते। वह बस अपनी लाचार आँखें लेकर किसी के सामने खड़े हो जाते हैं, और किसी दयावान का दिल पिघल जाए तो वह उन्हें लिफ्ट दे देता है। "बाबूजी, आज नहीं कमाया तो कल मेरी बिटिया भूखी सोएगी," बेदू की यह दबी हुई आवाज़ पत्थर को भी पिघला दे।

 अंधेरे में कटती ज़िंदगी, छत भी टूटी
​इस साल की भीषण बारिश बेदू के लिए 'आपदा' नहीं, बल्कि 'अंतिम प्रहार' बनकर आई। जिस कच्चे घर में परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिर छुपाता आया था, वह चंद घंटों की बरसात में मलबे का ढेर बन गया। अब सिर्फ एक दीवार बची है, जो हर पल मौत का साया बनकर डोलती है। इस परिवार के हिस्से में न केवल रोटी का संघर्ष है, बल्कि रातें भी घोर कष्ट में कटती हैं— इनके पास बिजली की भी कोई व्यवस्था नहीं है, ये अपना जीवन घने अंधेरे में व्यतीत करते हैं।

​बेदू ने पत्नी की तरफ देखा, बेटी को कलेजे से लगाया, और आवाज़ काँपते हुए कहा, "डरो मत, योगी सरकार सबका घर बना रही है। इस बार मेरी बिटिया पक्की छत के नीचे सोएगी।"
​आस जगी थी। उन्होंने दैवीय आपदा के तहत आवास के लिए आवेदन किया। अधिकारी आए। टूटे घर, भीगी दीवारों और गरीबी से सिकुड़ी बेदू की बेटी को देखा। सब कुछ साफ़ था—बेदू पात्र थे। अधिकारी ने कहा, "फिकर न करो बेदू, तुम्हारा घर ज़रूर बनेगा।" यह शब्द बेदू के लिए किसी अमृत से कम नहीं थे।
​बेदू, जिसकी ज़िंदगी सिर्फ दिहाड़ी पर टिकी थी, अब रोज सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने लगा। दिसंबर आ गया। ठंड चरम पर थी, और हवा में 'पैसा आने' की खबर तैरने लगी।

​ जनप्रतिनिधि के इशारे पर, रिपोर्ट ने ज़िन्दगी उजाड़ दी

​हाथ में मज़दूरी के पैसे नहीं थे, पर दिल में एक अटूट विश्वास था। बेदू बड़े बाबूजी के पास गए, गिड़गिड़ाए, "बाबूजी, मेरी बेटी बाहर सो रही है, बस बता दीजिए पैसा कब आएगा? वह छत कब बनेगी?"
​बाबूजी ने फाइल खोली। बेदू की उम्मीदों का रंग उड़ गया।
​फाइल में किसी अधिकारी ने रिपोर्ट लगाई थी कि "इनकी कॉलोनी बनी हुई है, ये पात्र नहीं हैं।"

​बेदू के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। "बाबूजी, कौन सी कॉलोनी? मेरा तो एक फूटा हुआ कमरा भी नहीं है!"
​जांच करने पर पता चला कि एक जनप्रतिनिधि के इशारे पर, अधिकारी ने बेदू के मृतक बड़े भाई के पक्के मकान की तस्वीर लगा दी थी। जिस मकान में उनकी विधवा भाभी रह रही थीं, उसे बेदू का घर बताकर, उनके आवेदन को 'अपात्र' घोषित कर दिया गया था।

​बेदू के हाथ में वो अपात्रता वाली फाइल थी। आँखें सूज चुकी थीं। वह घर की तरफ भागे। भीगी हुई आँखों से जब बेदू ने घर में बैठी पत्नी और बेटी को 'अपात्र' लिखे कागज़ दिखाए... तो सन्नाटा छा गया।
​पत्नी ने कागज़ को देखा। उसकी आँखें निर्जीव हो गईं। बेटी, जो अपने पिता को इतने दिनों से भागते-दौड़ते देख रही थी, बिना कुछ समझे अपनी माँ के आँचल में मुँह छुपाकर रोने लगी।

​बेदू की पत्नी की ज़ुबान से सिर्फ़ एक फुसफुसाहट निकली, "हमारी किस्मत में सिर्फ यह टूटा हुआ घर ही लिखा था क्या?"

​इस पल, बेदू का वह कच्चा मकान नहीं, बल्कि उस मासूम बेटी और माँ के सिर पर आने वाली पक्की छत का सपना हमेशा के लिए मलबे में तब्दील हो गया। अब बेदू को सिर्फ अपने आंसू पोंछने के लिए एक दीवार चाहिए, जो उनके टूटे हुए घर में भी बची नहीं है।

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