मुंबई में ओला-उबर ड्राइवरों की हड़ताल- बेहतर वेतन और कामकाजी हालात के लिए चौथे दिन भी प्रदर्शन, यात्रियों की मुश्किलें बढ़ीं।
Mumbai News: मुंबई में 15 जुलाई 2025 से शुरू हुई ओला, उबर और रैपिडो जैसे ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं के ड्राइवरों की हड़ताल 18 जुलाई को चौथे ...
मुंबई में 15 जुलाई 2025 से शुरू हुई ओला, उबर और रैपिडो जैसे ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं के ड्राइवरों की हड़ताल 18 जुलाई को चौथे दिन भी जारी रही। ड्राइवरों ने बेहतर वेतन, उचित कमीशन, और कार्यस्थल पर बेहतर नियमों की मांग को लेकर यह हड़ताल शुरू की है। इस आंदोलन की वजह से मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में टैक्सी सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, और लगभग 70-90% ऐप-आधारित टैक्सियां सड़कों से गायब हैं। इससे यात्रियों को लंबा इंतजार, बुकिंग रद्द होने, और किराए में उछाल का सामना करना पड़ रहा है। खासकर हवाई अड्डे, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC), अंधेरी, और दक्षिण मुंबई जैसे इलाकों में यात्रियों को भारी परेशानी हो रही है।
- हड़ताल की शुरुआत और कारण
हड़ताल की शुरुआत 15 जुलाई 2025 को हुई, जब महाराष्ट्र गिग वर्क्स मंच और भारतीय गिग वर्कर्स फ्रंट जैसे संगठनों ने ड्राइवरों को एकजुट कर आंदोलन शुरू किया। इस हड़ताल को मुंबई टैक्सीमेन यूनियन और महाराष्ट्र राज्य राष्ट्रीय कामगार संघ जैसे संगठनों का भी समर्थन मिला। ड्राइवरों का कहना है कि ओला, उबर, और रैपिडो जैसी कंपनियां उनकी मेहनत का उचित भुगतान नहीं करतीं और मनमानी नीतियों से उनकी कमाई को नुकसान पहुंचाती हैं।
16 जुलाई को एक 46 वर्षीय ओला ड्राइवर की नालासोपारा में आत्महत्या की खबर ने इस हड़ताल को और तेज कर दिया। ड्राइवरों का दावा है कि यह ड्राइवर अपनी गाड़ी की किश्तें (EMI) नहीं चुका पा रहा था, क्योंकि ऐप कंपनियों की ऊंची कमीशन दरों और कम किराए की वजह से उसकी कमाई बहुत कम हो गई थी। ड्राइवरों ने इसे गिग इकॉनमी में उनकी बदहाल स्थिति का प्रतीक बताया और कहा कि ऐसी घटनाएं उनकी मांगों की गंभीरता को दर्शाती हैं।
- ड्राइवरों की प्रमुख मांगें
ड्राइवरों ने ऐप-आधारित कंपनियों और महाराष्ट्र सरकार से कई मांगें रखी हैं, जो उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को बेहतर करने पर केंद्रित हैं। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
किराए में समानता: ड्राइवर चाहते हैं कि ऐप-आधारित टैक्सियों का किराया मुंबई की पारंपरिक काली-पीली टैक्सियों के बराबर हो, जो वर्तमान में एयर-कंडीशन्ड टैक्सियों के लिए 32 रुपये प्रति किलोमीटर है। अभी ड्राइवरों को 8-12 रुपये प्रति किलोमीटर ही मिलता है, जो ईंधन और रखरखाव की बढ़ती लागत को कवर नहीं करता।
कमीशन में कमी: ड्राइवरों का आरोप है कि ओला और उबर 40-50% तक कमीशन लेते हैं। उदाहरण के लिए, अगर एक यात्री 500 रुपये का किराया देता है, तो ड्राइवर को केवल 250-300 रुपये मिलते हैं। ड्राइवर चाहते हैं कि कंपनियां छूट का खर्च खुद वहन करें, न कि उनकी कमाई से काटें।
बाइक टैक्सी पर प्रतिबंध: ड्राइवरों ने ऐप-आधारित बाइक टैक्सी सेवाओं पर प्रतिबंध की मांग की है, क्योंकि ये उनकी कमाई को प्रभावित करती हैं और सुरक्षा के लिए खतरा हैं। उनका कहना है कि बाइक टैक्सी ड्राइवर अक्सर निजी वाहनों का इस्तेमाल करते हैं, जो नियमों का उल्लंघन है।
नए परमिट पर रोक: ड्राइवरों ने काली-पीली टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के नए परमिट पर रोक लगाने की मांग की है, ताकि बाजार में टैक्सियों की अधिकता कम हो। इससे उनकी कमाई पर असर पड़ता है।
वेलफेयर बोर्ड और गिग वर्कर्स एक्ट: ड्राइवरों ने ऐप-आधारित ड्राइवरों के लिए एक कल्याण बोर्ड बनाने और 'महाराष्ट्र गिग वर्कर्स एक्ट' लागू करने की मांग की है। इससे उन्हें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, और कानूनी सहायता मिल सकेगी।
आईडी ब्लॉक करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता: ड्राइवरों का कहना है कि कंपनियां छोटी-मोटी शिकायतों पर उनकी आईडी ब्लॉक कर देती हैं, जिससे उनकी आजीविका छिन जाती है। वे एक पारदर्शी समीक्षा प्रक्रिया और निलंबित आईडी की बहाली चाहते हैं।
इस हड़ताल ने मुंबई के यात्रियों को भारी परेशानी में डाला है। मुंबई हवाई अड्डे ने 16 जुलाई को एक एडवाइजरी जारी की, जिसमें यात्रियों से वैकल्पिक परिवहन साधनों की व्यवस्था करने को कहा गया। बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, अंधेरी, और ठाणे जैसे व्यस्त इलाकों में यात्रियों को एक घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। कई यात्रियों ने बुकिंग रद्द होने और ड्राइवरों के सवारी लेने से मना करने की शिकायत की।
कुछ यात्रियों ने बताया कि हड़ताली ड्राइवरों ने चलती गाड़ियों को रोककर यात्रियों को उतरने के लिए मजबूर किया। विक्रोली में एक यात्री सिकंदर शेख ने बताया कि चार-पांच लोग उनकी टैक्सी को रोककर ड्राइवर को धमकाने लगे और गाड़ी को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी। ऐसे कई मामले ठाणे, उरण, और नवी मुंबई में भी सामने आए।
इसके चलते यात्रियों ने BEST बसों, लोकल ट्रेनों, और ऑटो-रिक्शा का सहारा लिया, जिससे इन सेवाओं पर भी दबाव बढ़ गया। बारिश के मौसम में कई यात्रियों को पैदल चलना पड़ा। एक कॉर्पोरेट वकील अदिति बुद्धकर ने बताया कि उनकी रोजाना की यात्रा, जो सामान्यतः 10 मिनट में बुक हो जाती थी, अब 30 मिनट से ज्यादा समय ले रही है।
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने 15 जुलाई को ड्राइवर यूनियनों से मुलाकात की और उनकी मांगों को "उचित" बताया। उन्होंने 15 दिनों के भीतर समाधान का वादा किया और यात्रियों से शिकायतों के लिए टोल-फ्री नंबर 1800220110 पर संपर्क करने को कहा। हालांकि, ड्राइवरों का कहना है कि सरकार ने अभी तक कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है, और हड़ताल तब तक जारी रहेगी जब तक लिखित प्रतिबद्धता नहीं मिलती।
महाराष्ट्र सरकार ने एक साल पहले ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं के लिए एक नीति की घोषणा की थी, जिसमें किराया संरचना, लाइसेंसिंग, और प्रवर्तन के नियम शामिल थे। लेकिन यह नीति अभी तक लागू नहीं हुई है, जिसे ड्राइवर अपनी समस्याओं का एक बड़ा कारण मानते हैं। परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह हड़ताल ड्राइवरों और कंपनियों के बीच का मामला है, लेकिन नियामक अंतर के कारण विवाद बढ़ रहे हैं।
ओला और उबर ने ड्राइवरों से काम पर लौटने की अपील की है, लेकिन अभी तक उनकी मांगों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। रैपिडो के ड्राइवरों ने बताया कि उनकी कंपनी कमीशन में कटौती कम करती है, जिसके कारण रैपिडो की कुछ सेवाएं हड़ताल के दौरान भी चालू रहीं।
सोशल मीडिया पर इस हड़ताल ने व्यापक चर्चा छेड़ दी। X पर कई यूजर्स ने ड्राइवरों की मांगों का समर्थन किया, तो कुछ ने उनकी आक्रामक रणनीति की आलोचना की। एक यूजर ने लिखा, "ओला-उबर ड्राइवरों की मांगें जायज हैं, लेकिन यात्रियों को परेशान करना गलत है।" एक अन्य यूजर ने कहा, "मुंबई में हड़ताल की वजह से कोई टैक्सी नहीं मिल रही। सरकार को जल्दी समाधान करना चाहिए।"
महाराष्ट्र कामगार सभा के अध्यक्ष केशव क्षीरसागर ने कहा कि कंपनियां गिग वर्कर्स का शोषण कर रही हैं, और सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने ड्राइवरों से अपील की कि वे शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करें और यात्रियों की सुरक्षा को खतरे में न डालें।
मुंबई में ओला, उबर, और रैपिडो ड्राइवरों की हड़ताल ने गिग इकॉनमी में काम करने वालों की बदहाल स्थिति को उजागर किया है। कम वेतन, ऊंचा कमीशन, और नियमों की कमी ने ड्राइवरों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। उनकी मांगें न केवल उनकी आजीविका को बेहतर करने की हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि भारत में गिग इकॉनमी को नियंत्रित करने वाली नीतियों की सख्त जरूरत है।
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