कोलकाता में I-PAC दफ्तर पर ED की छापेमारी के बाद बिहार में गरमाई सियासत, जन सुराज और फंडिंग पर BJP सांसद के गंभीर सवाल​। 

प्रवर्तन निदेशालय ने कोलकाता में चुनावी रणनीति से जुड़ी पेशेवर फर्म I-PAC के दफ्तर और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास सहित कई

Jan 10, 2026 - 14:39
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कोलकाता में I-PAC दफ्तर पर ED की छापेमारी के बाद बिहार में गरमाई सियासत, जन सुराज और फंडिंग पर BJP सांसद के गंभीर सवाल​। 
कोलकाता में I-PAC दफ्तर पर ED की छापेमारी के बाद बिहार में गरमाई सियासत, जन सुराज और फंडिंग पर BJP सांसद के गंभीर सवाल​। 

प्रवर्तन निदेशालय ने कोलकाता में चुनावी रणनीति से जुड़ी पेशेवर फर्म I-PAC के दफ्तर और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास सहित कई परिसरों पर एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई कथित मनी लॉन्ड्रिंग और कोयला तस्करी से जुड़े मामले की जांच के सिलसिले में की गई, जिसके तहत कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित I-PAC के दफ्तर और लाउडन स्ट्रीट पर मौजूद आवास सहित लगभग दस ठिकानों पर तलाशी ली गई। एजेंसी ने आधिकारिक रूप से कहा कि यह छापेमारी अवैध कोयला कारोबार और उससे जुड़े कथित अवैध धन के प्रवाह की जांच का हिस्सा है तथा इसे सबूतों के आधार पर अंजाम दिया गया है।​

छापेमारी के दौरान केंद्रीय एजेंसी की टीम के साथ अर्धसैनिक बलों के जवान भी तैनात रहे और तलाशी कई घंटों तक चली। एजेंसी का कहना है कि जांच के दौरान कुछ दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य सामग्री जब्त की गई है, जिनका इस्तेमाल आगे की जांच में किया जाएगा। I-PAC की ओर से बयान जारी कर कहा गया कि उसने पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ सहयोग किया है और यह पूरा दिन संगठन के लिए बेहद कठिन और “अस्थिर करने वाला” रहा।​

  • I-PAC की प्रतिक्रिया और ED का पक्ष

छापेमारी के अगले दिन I-PAC ने आधिकारिक बयान में कहा कि प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी उनके कोलकाता दफ्तर और निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर तलाशी के लिए पहुंचे थे और संस्था ने कानून के दायरे में रहते हुए एजेंसी को पूरा सहयोग दिया है। I-PAC ने इस कार्रवाई को एक पेशेवर संगठन के लिए “कठिन और दुर्भाग्यपूर्ण दिन” बताते हुए कहा कि इस तरह की छापेमारी भविष्य के लिए “चिंताजनक और अस्थिर करने वाली मिसाल” बन सकती है। संगठन ने यह भी कहा कि वह जांच प्रक्रिया के साथ आगे भी सहयोग जारी रखेगा और सभी कानूनी प्रावधानों के तहत एजेंसी से संवाद में रहेगा।​

दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि I-PAC और उससे जुड़े ठिकानों पर की गई तलाशी मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा है और यह किसी राजनीतिक दल या राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लक्षित कार्रवाई नहीं है। एजेंसी का कहना है कि जांच अवैध कोयला खनन और तस्करी से जुड़ी आय के प्रवाह को ट्रैक करने और उससे संबंधित सबूत जुटाने के लिए की जा रही है, और I-PAC उन संस्थाओं में से एक है जिनके संदर्भ में हवाला पैसे के इस्तेमाल की बात सामने आई है। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि तलाशी के दौरान उसके कामकाज में बाधा डालने की कोशिश की गई और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज तथा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मौके से हटाए गए, जिनके बारे में उसने अपने आधिकारिक बयान में उल्लेख किया।​

  • बिहार की सियासत में तेज हलचल

कोलकाता में I-PAC पर हुई इस कार्रवाई के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है, जहां चुनावी राजनीति में I-PAC और प्रशांत किशोर की सक्रिय भूमिका पहले से चर्चा में रही है। बिहार से भारतीय जनता पार्टी के सांसद संजय जायसवाल ने I-PAC पर हुई छापेमारी के संदर्भ में इसे “सही जगह” पर की गई कार्रवाई बताते हुए कहा कि इससे I-PAC और उससे जुड़े आर्थिक लेन-देन की परतें खुलनी चाहिए। उनके ताज़ा बयान ने विशेष तौर पर बिहार में प्रशांत किशोर द्वारा शुरू की गई जन सुराज पार्टी और I-PAC के बीच फंडिंग संबंधों को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।​

संजय जायसवाल ने आरोप लगाए कि बिहार की राजनीति में प्रवेश से पहले और विधानसभा चुनावों के दौरान I-PAC की ओर से जन सुराज से जुड़े वित्तीय संबंध रहे हैं, जिनकी प्रकृति को लेकर कई संदेह हैं। उनका कहना है कि जब I-PAC खुद को एक कंसल्टेंसी फर्म के रूप में प्रस्तुत करता है तो स्वाभाविक रूप से अपेक्षा यह होती है कि वह राजनीतिक दलों से सेवा शुल्क के रूप में पैसा ले, लेकिन यहां पर उल्टा फंडिंग संबंध दिख रहा है, जिस पर गंभीरता से सवाल उठाए जाने चाहिए।​

  • जन सुराज और I-PAC फंडिंग पर BJP सांसद के आरोप

बीजेपी सांसद संजय जायसवाल के अनुसार, बिहार विधानसभा चुनाव से पहले और उसके दौरान I-PAC ने जन सुराज और प्रशांत किशोर को फंडिंग की, जबकि आमतौर पर किसी राजनीतिक परामर्श कंपनी को राजनीतिक दल से भुगतान मिलता है, न कि कंपनी द्वारा दल या उससे जुड़े व्यक्तियों को धन उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने दावा किया कि बिहार चुनाव के दौरान I-PAC की ओर से प्रशांत किशोर को 60 करोड़ रुपये से अधिक की रकम दी गई, जिसका उद्देश्य बीजेपी को चुनाव में हराना बताया गया।​

संजय जायसवाल ने यह भी आरोप लगाया कि कई ऐसी कंपनियां, जो खुद घाटे में चल रही थीं या जिनकी पूंजी सीमित थी, उन्होंने भी बड़े पैमाने पर चंदा प्रशांत किशोर और I-PAC को दिया। उनके अनुसार, चुनावों के दौरान जिन कंपनियों का आकार लगभग 10 करोड़ रुपये था, वे भी 10 करोड़ रुपये तक के दान I-PAC और प्रशांत किशोर को दे रही थीं, जिसे उन्होंने संदिग्ध बताया। उन्होंने यह आरोप भी जोड़ा कि इस पूरी व्यवस्था के माध्यम से कथित रूप से काले धन को सफेद करने का काम किया गया और चुनावी राजनीति में पैसों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हुए।​

  • शेल कंपनियों और राउंड-ट्रिपिंग के संदर्भ

बयान में संजय जायसवाल ने यह सवाल उठाया कि अगर कुछ कंपनियां लगातार वित्तीय घाटे में चल रही हैं, तो वे बड़े पैमाने पर चंदा सिर्फ एक ही व्यक्ति या संगठन को क्यों दे रही हैं। उनके अनुसार, इस तरह के लेन-देन से “राउंड-ट्रिपिंग” जैसे वित्तीय तरीकों को लेकर शक पैदा होता है, जिसमें धन को शेल कंपनियों के माध्यम से घुमाकर वैध दिखाने की आशंका जताई जाती है। उन्होंने मांग की कि I-PAC, जन सुराज और प्रशांत किशोर से जुड़े सभी आर्थिक लेन-देन की जांच एजेंसियों द्वारा विस्तार से की जानी चाहिए, ताकि यदि कोई अनियमितता हो तो वह सामने आ सके।​

इन आरोपों के बीच उन्होंने यह भी कहा कि I-PAC विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए काम करने वाली संस्था है, जो अलग–अलग राज्यों में चुनाव प्रचार और रणनीति का काम करती रही है, लेकिन बिहार के संदर्भ में उन्होंने जो बातें रखीं, वे उनके मुताबिक फंडिंग पैटर्न में असामान्यताओं की ओर इशारा करती हैं। उन्होंने जन सुराज की स्थापना, उसके चुनावी अभियान और उससे जुड़े आर्थिक ढांचे पर भी सवाल उठाए और कहा कि यदि किसी परामर्श कंपनी ने किसी राजनीतिक समूह को धन उपलब्ध कराया है, तो उसकी प्रकृति, स्रोत और उद्देश्य की विस्तृत जांच होना आवश्यक है।​

  • प्रशांत किशोर और जन सुराज की सफाई

बीजेपी सांसद के आरोपों के संदर्भ में प्रशांत किशोर पहले भी सार्वजनिक रूप से अपने फंडिंग मॉडल को लेकर स्पष्टीकरण दे चुके हैं। उन्होंने कहा था कि उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए कंसल्टेंसी का काम करते हुए कुछ वर्षों में बड़ी राशि पेशेवर फीस के रूप में अर्जित की, जिस पर उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के कर कानूनों के तहत वस्तु एवं सेवा कर (GST) और आयकर का भुगतान किया है। प्रशांत किशोर के अनुसार, उन्होंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बैंकिंग चैनल के माध्यम से चेक द्वारा जन सुराज को दान के रूप में दिया है और यह पूरा लेन-देन औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था में दर्ज है।​

उन्होंने अपने बयान में कहा कि जन सुराज के फंडिंग स्रोत पारदर्शी हैं और पार्टी के खातों में होने वाले लेन-देन आधिकारिक तौर पर दर्ज किए जाते हैं। प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि वे जिन राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए परामर्श कार्य करते रहे हैं, वहां से उन्हें वैध पारिश्रमिक मिला और उसी धन का एक हिस्सा वे जन सुराज के लिए उपयोग करते हैं, ताकि किसी अवैध स्रोत या संदिग्ध पूंजी पर निर्भरता से बचा जा सके। इस प्रकार, संजय जायसवाल के आरोपों पर जन सुराज की ओर से यह पक्ष रखा गया कि संगठन और उससे जुड़े वित्तीय लेन-देन बैंकिंग और कर कानूनों के दायरे में ही होते हैं।​

  • आगे की जांच और राजनीतिक असर

I-PAC के कोलकाता दफ्तर और निदेशक के आवास पर हुई ED की छापेमारी के बाद अब एजेंसी द्वारा जब्त किए गए दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कानूनी और जांच संबंधी कार्रवाई तय होगी। जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध धन के प्रवाह की पड़ताल के लिए की जा रही इन तलाशी कार्रवाइयों के निष्कर्ष सामने आने में समय लगेगा। बिहार से जुड़े आरोपों पर फिलहाल किसी अतिरिक्त औपचारिक जांच की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी के बीच यह मुद्दा राज्य की राजनीति में प्रमुख विषय के तौर पर उभर आया है।​

बिहार में आगामी चुनावी समीकरणों के संदर्भ में जन सुराज, प्रशांत किशोर और I-PAC की भूमिका पहले से चर्चा में रही है, ऐसे में फंडिंग और वित्तीय लेन-देन से जुड़े सवालों ने बहस को और तेज कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ED की मौजूदा जांच से क्या संकेत निकलते हैं, और क्या भविष्य में I-PAC, उससे जुड़े व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ कोई अतिरिक्त कानूनी कदम उठाए जाते हैं। साथ ही, बिहार के राजनीतिक दलों की रणनीति और जन सुराज के चुनावी अभियान पर भी इस पूरे घटनाक्रम के संभावित प्रभावों पर नजर रखी जा रही है​

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