Sambhal : रमज़ान की बरकतों का महीना, तीन अशरों में छुपा है रहमत-मग़फिरत-नजात का पैग़ाम- क़ारी गुलज़ार अशरफ
उन्होंने बताया कि रमज़ान के 30 रोज़ों को अल्लाह ने तीन हिस्सों यानी तीन अशरों में तक़सीम किया है। पहला अशरा रहमत का होता है, जो पहली से दसवीं रमज़ान तक रहता है। इस दौरान
Report : उवैस दानिश, सम्भल
रमज़ानुल मुबारक की फ़ज़ीलत और अहमियत पर रौशनी डालते हुए मशहूर आलिम कारी गुलजार अशरफ ने कहा कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने रमज़ान के महीने को बेपनाह रहमतों और बरकतों से नवाज़ा है। यह महीना सिर्फ़ इबादत का ही नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को संवारने का ज़रिया भी है।
उन्होंने बताया कि रमज़ान के 30 रोज़ों को अल्लाह ने तीन हिस्सों यानी तीन अशरों में तक़सीम किया है। पहला अशरा रहमत का होता है, जो पहली से दसवीं रमज़ान तक रहता है। इस दौरान अल्लाह अपने बंदों पर खास रहमतें नाज़िल करता है। दूसरा अशरा मग़फिरत का है, जो 11वीं से 20वीं रमज़ान तक होता है। इस अशरे में गुनाहों की माफी का बेहतरीन मौक़ा मिलता है, चाहे ग़लती जानबूझकर हुई हो या अनजाने में। तीसरा अशरा नजात का कहलाता है, जो 21वीं से 30वीं रमज़ान तक रहता है, यानी जहन्नुम से आज़ादी का अशरा।
क़ारी गुलज़ार अशरफ ने कहा कि इसी तीसरे अशरे में लैलतुल क़द्र की मुबारक रात आती है, जिसे हज़ार महीनों से बेहतर बताया गया है। यह रात इबादत, दुआ और तौबा के लिए सबसे अज़ीम मानी गई है। उन्होंने क़ुरआन की आयत का हवाला देते हुए कहा कि जिस किसी को भी यह बा-बरकत महीना नसीब हो, उसे पूरे एहतेराम के साथ रोज़े रखने चाहिए। रोज़ा न सिर्फ़ रूहानी पाकीज़गी देता है, बल्कि जिस्मानी सेहत और घरों में रहमत व बरकत का सबब भी बनता है। साथ ही उन्होंने सदक़ा-ख़ैरात की अहमियत बताते हुए कहा कि रमज़ान में अल्लाह की राह में दिया गया छोटा सा खर्च भी 70 गुना सवाब का ज़रिया बन जाता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस मुबारक महीने को ग़नीमत समझें और इबादत, रोज़ा, तिलावत और नेकियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।
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