Sambhal : 'संविधान से भी अच्छे कानून बना रहे हैं', किदवई बिरादरी की पंचायत पर सदर सालार मसूद का बड़ा बयान
उन्होंने साफ किया कि पंचायत के फैसले किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि बिरादरी में फैली कुरीतियों को खत्म करने के लिए हैं। पंचायत द्वारा डीजे पूरी तरह बैन करने, “बिया रखने” की
Report : उवैस दानिश, सम्भल
किदवई बिरादरी की पंचायत द्वारा शादी-विवाह से जुड़े सख्त नियमों को लेकर जिले में बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे पर किदवई बिरादरी के सदर सालार मसूद ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उनकी बिरादरी बहुत पुरानी और व्यापक है, जो सम्भल, अमरोहा, दिल्ली, आगरा, मेरठ समेत कई जिलों में फैली हुई है। अकेले जिला सम्भल में किदवई बिरादरी की आबादी 25 से 50 हजार के बीच बताई जाती है।
सदर सालार मसूद ने कहा कि किदवई बिरादरी पहले “कद्दई” और उससे पहले “खुदैया” नाम से जानी जाती थी। फावड़ा चलाने वाले मजदूरों से जुड़ी यह बिरादरी समय के साथ आगे बढ़ी और नाम भी बदला।
उन्होंने साफ किया कि पंचायत के फैसले किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि बिरादरी में फैली कुरीतियों को खत्म करने के लिए हैं। पंचायत द्वारा डीजे पूरी तरह बैन करने, “बिया रखने” की रस्म खत्म करने और बारात लेट लाने पर प्रति घंटा 5,000 रुपये जुर्माना लगाने जैसे फैसलों पर सदर ने कहा कि इसे “तुगलकी फरमान” कहना गलत है। उनका कहना है कि शराब पीकर नाच-गाने और दहेज़ की नुमाइश से गरीब मजदूर वर्ग पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, इसलिए ये नियम बनाए गए हैं।
संविधान से अलग कानून बनाने के आरोप पर सदर सालार मसूद ने कहा, “संविधान सर्वोपरि है, लेकिन ये बिरादरी का आंतरिक मामला है। हम संविधान के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी बिरादरी के लिए संविधान से भी अच्छे नियम बना रहे हैं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हुक्का-पानी बंद करने जैसी सज़ा अभी तय नहीं है, अंतिम फैसला पंचायत ही लेगी।
सदर ने बताया कि पहली पंचायत 2003 में और दूसरी 2013 में हुई थी, जिन पर 80–90 प्रतिशत लोगों ने अमल किया। बावजूद इसके कुछ लोग आज भी दहेज़, डीजे और मंगनी की दिखावे वाली रस्मों को नहीं छोड़ रहे, इसी वजह से दोबारा सख्ती करनी पड़ रही है। कुल मिलाकर, किदवई बिरादरी की पंचायत के ये फैसले अब सामाजिक सुधार हैं या संविधान से टकराव, इस सवाल पर सम्भल में चर्चा लगातार गहराती जा रही है।
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