सोशल मीडिया पर मैथिली ठाकुर को लेकर अभद्र टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया, समाजवादी पार्टी की छवि पर उठे सवाल
राजनीति में असहमति हो सकती है, वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन जब कोई महिला कुछ बड़ा हासिल करती है, देश का नाम रोशन करती है, समाज को प्रेरणा देती है
भारतीय राजनीति में गिरती हुई भाषा कोई नई बात नहीं, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं की आदतें किसी भी मर्यादा, शालीनता और सार्वजनिक जिम्मेदारी की सीमा को पार करती जाती हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा समाजवादी पार्टी के उन नेताओं की होती है, जिन्होंने वर्षों से महिलाओं पर, सामाजिक रूप से सम्मानित व्यक्तियों पर और देश की प्रतिभाशाली हस्तियों पर अभद्र, घटिया और शर्मनाक बयान देकर न केवल पार्टी की छवि खराब की है बल्कि यह भी साबित किया है कि उनकी सोच किस हद तक नीचे गिर चुकी है। लोकगीत और भजन गायकी के क्षेत्र में अपनी सादगी और मधुर आवाज़ के लिए जानी जाने वाली मैथिली ठाकुर को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर लगाई गई कुछ टिप्पणियों ने बहस छेड़ दी है। फेसबुक पर एक पोस्ट के नीचे आए कमेंट्स में कुछ यूज़र इंडिविजुअल्स द्वारा की गई अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियों को देखकर अनेक उपयोगकर्ताओं ने नाराजगी व्यक्त की। स्क्रीनशॉट के अनुसार, ये टिप्पणियाँ राजनीति से जुड़े विवादित मुद्दों के साथ जोड़कर लिखी गईं और इनमें भाषा का स्तर काफी अशोभनीय रहा।
सोशल मीडिया पर व्यक्त की गई ऐसी टिप्पणियों को देखकर कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि किसी सार्वजनिक मुद्दे या राजनीतिक बहस में किसी महिला कलाकार का अनावश्यक रूप से नाम शामिल करना कितना उचित है। मैथिली ठाकुर के समर्थक और सामान्य सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि एक शांत, पारिवारिक और संगीत से जुड़ी युवती को राजनीतिक छींटाकशी का हिस्सा क्यों बनाया जा रहा है।
मैथिली ठाकुर की पहचान एक सरल और पारंपरिक कलाकार के रूप में है। वह अपने दोनों भाइयों के साथ भजन, लोकगीत और पारंपरिक संगीत प्रस्तुत करती हैं। उनका पहनावा, घर-परिवार का माहौल और मंच पर प्रस्तुतियों की शैली हमेशा से बेहद सादगीपूर्ण रही है। उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यही घरेलू छवि और उनमें दिखने वाली पारिवारिक संस्कृति है। उनके चाहने वाले उन्हें एक शांत, मेहनती और परंपरागत मूल्यों से जुड़ी कलाकार के रूप में देखते हैं। दुखद यह है कि यह सब कोई एक-दो बार की गलती नहीं है, बल्कि एक लगातार दोहराई जाने वाली राजनीतिक आदत बन चुकी है। जिस तरह ये नेता, बिना किसी संकोच के, किसी महिला की उपलब्धि को भी उपहास बनाने में देर नहीं लगाते, उससे साफ पता चलता है कि महिलाओं को लेकर उनकी मानसिकता आज भी पिछलग्गू, पुराने और स्त्री-विरोधी ढर्रे पर टिकी है।
इसी कारण जब सोशल मीडिया पर उनकी एक पुरानी, बचपन की तस्वीर लगाकर कुछ यूज़र्स द्वारा विवादित बातें लिखी गईं, तो अनेक लोगों ने इस पर आपत्ति जताई। स्क्रीनशॉट में दिख रहे कमेंट्स के अनुसार कुछ व्यक्तियों ने टिप्पणी करते समय भाषा की मर्यादा नहीं रखी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच एक महिला कलाकार को निशाना बनाया। कई उपयोगकर्ताओं ने यह कहते हुए नाराजगी जाहिर की कि किसी 14–15 वर्ष की बच्ची की तस्वीर को ऐसी टिप्पणियों में जोड़ना किसी भी तरह उचित नहीं है।
अन्य सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने ऐसे कमेंट्स का विरोध करते हुए कहा कि किसी भी दल से जुड़े समर्थकों को यह समझना चाहिए कि महिलाएँ और बेटियाँ राजनीति की लड़ाई का विषय नहीं हो सकतीं। कई लोगों ने यह टिप्पणी भी की कि जिस प्रकार की भाषा का उपयोग कुछ यूज़र्स ने किया, वह किसी भी सामाजिक दायरे में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी बातें न सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर गलत हैं, बल्कि किसी भी राजनीतिक पार्टी की सार्वजनिक छवि को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
- महिलाओं पर टिप्पणियाँ- कितनी बार और कितनी गिरी हुई?
यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो नेता मंचों और कैमरों के सामने खुलकर महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी कर सकते हैं, वे निजी सोच में कितने पिछड़े हुए होंगे।
राजनीति में असहमति हो सकती है, वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन जब कोई महिला कुछ बड़ा हासिल करती है, देश का नाम रोशन करती है, समाज को प्रेरणा देती है तो कम से कम राजनीतिक लोग उससे सीख लें, उसे सम्मान दें, उसकी तारीफ़ करने की समझ रखें।
लेकिन समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के लिए यह संभव ही नहीं दिखता।
उनके लिए महिला महज़ राजनीति की एक वस्तु है, एक लक्ष्य है जिस पर भद्दा मज़ाक किया जा सकता है, जिस पर तंज कसकर तालियाँ बटोरी जा सकती हैं।
ऐसा लगता है जैसे उनकी राजनीतिक भाषा का पहला पाठ ही बदतमीज़ी, व्यंग्य और चरित्र पर प्रहार करना है।
क्या किसी आधुनिक राजनीतिक दल के नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी महिला के करियर, उसकी प्रतिभा, उसके काम या उसके निजी चयन पर इस तरह की टिप्पणियाँ करें, मानो वे किसी सड़कछाप लड़के की तरह गालीबाज़ी करने आए हों?
समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं का यह व्यवहार न सिर्फ शर्मनाक बल्कि चिंताजनक भी है। यह संदेश देता है कि महिलाओं के सम्मान को लेकर उनकी सोच न केवल कमजोर है, बल्कि खतरनाक रूप से विषैली भी है।
स्क्रीनशॉट में नजर आ रहे कई यूज़र्स ने राजनीतिक दलों और नेताओं के नाम लेते हुए तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। कुछ कमेंट्स में यह कहा गया कि यदि किसी दल के समर्थक इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो इसका असर सीधा जनता की धारणा पर पड़ता है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि चुनावी राजनीति में जब भी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, तब आम जनता में यह संदेश जाता है कि राजनीतिक बहस मुद्दों और विकास से भटककर व्यक्तिगत और अभद्र टिप्पणियों की ओर जा रही है।
कई अन्य उपयोगकर्ताओं ने यह भी लिखा कि सोशल मीडिया के खुले माहौल में अभिव्यक्ति का अधिकार होना जरूरी है, लेकिन यह अधिकार तभी सार्थक होता है जब भाषा संयमित हो और किसी की गरिमा को ठेस न पहुंचाए। उन्होंने कहा कि एक महिला कलाकार, वह चाहे किसी भी क्षेत्र से जुड़ी हो, उसके प्रति ऐसे शब्दों का उपयोग समाज के स्तर को दर्शाता है और इससे किसी भी दल या समूह की सकारात्मक छवि नहीं बनती।
- देश की प्रतिभाओं पर अभद्र बातें ईर्ष्या या मानसिक दिवालियापन?
सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, जो भी व्यक्ति मेहनत करके देश का नाम रोशन करता है उनकी सफलता भी इन नेताओं को चुभती है।
जबकि होना तो यह चाहिए कि नेताओं को इन लोगों से प्रेरणा लेकर देश के युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। मगर इसके बजाय कुछ सपाई नेता उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।
क्यों?
क्योंकि प्रतिभा देखकर इनमें अहंकार जाग जाता है।
क्योंकि गुणवत्तापूर्ण उपलब्धि उन्हें अपनी राजनीति की खोखली नींव की याद दिलाती है।
क्योंकि किसी की सफलता इनके उस “राजनीतिक अहंकार” पर चोट करती है जो खुद कभी कुछ बड़ा कर नहीं पाया और दूसरों की उपलब्धियों को भी पचा नहीं पाया।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में प्रतिभा का सम्मान होता है।
लेकिन ये नेता प्रतिभाशाली लोगों को भी तानों और आक्षेपों से भर देते हैं, मानो वे किसी समाज विरोधी तत्व पर टिप्पणी कर रहे हों।
देश की उपलब्धि को भी अपने राजनीतिक एंगल से देखते हैं।
कभी किसी खिलाड़ी को अपमानित किया जाता है, कभी किसी संस्कृतिक कलाकार को ताना मारा जाता है, कभी किसी तकनीकी नवाचार करने वाले युवा का मज़ाक बनाया जाता है।
क्या यह एक राजनीतिक दल के नेताओं की पहचान हो सकती है?
क्या यह आधुनिक लोकतांत्रिक सोच है?
नहीं।
यह राजनीतिक दिवालियापन है वह दिवालियापन जिसमें इंसान खुद कुछ न कर सके, तो दूसरों को नीचा दिखाने में लग जाए।
कुछ यूज़र्स ने यह भी लिखा कि राजनीति में मतभेद होना सामान्य है, पर निजी और पारिवारिक स्तर पर किसी भी महिला पर टिप्पणियाँ करना समाज में गलत उदाहरण स्थापित करता है। कई लोगों ने इसे सोशल मीडिया में बढ़ती कटुता का संकेत बताया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजनीतिक समर्थकों को यह समझने की आवश्यकता है कि किसी भी पार्टी की छवि उसके औपचारिक नेतृत्व के साथ-साथ उसके समर्थकों की ऑनलाइन गतिविधियों से भी बनती है।
इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया पर सभ्यता और संवेदनशीलता बनाए रखना प्रत्येक उपयोगकर्ता की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो या किसी विचारधारा का समर्थक हो, उसे भाषा का संयम रखना चाहिए। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी ऐसे कमेंट्स की मॉनिटरिंग को और मजबूत करना चाहिए ताकि नाबालिगों या महिलाओं से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री तुरंत हटाई जा सके।
कई लोगों ने यह राय भी रखी कि ऐसे विवाद उस समय सामने आते हैं जब चुनावी माहौल हो या किसी राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर बहस बढ़ जाती है। इन परिस्थितियों में कुछ लोग बहस की दिशा बदलने के लिए व्यक्तिगत स्तर की टिप्पणियाँ करते हैं, जिससे माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो जाता है।
स्क्रीनशॉट में दिख रहे कमेंट्स के आधार पर यह स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं ने इस प्रकार की भाषा का विरोध किया और कहा कि इससे किसी भी संगठन की सकारात्मक छवि नहीं बनती। कुछ ने यह भी कहा कि राजनीति को हमेशा मुद्दों और काम के आधार पर होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत हमलों के आधार पर। कई लोगों ने यह भी लिखा कि जब महिलाएँ समाज में हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तब उन्हें इस तरह की टिप्पणियों से जोड़ना उचित नहीं है।
सोशल मीडिया पर महिलाओं का सम्मान बनाए रखने की अपील करते हुए कुछ उपयोगकर्ताओं ने कहा कि हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि किसी कलाकार का जीवन, चाहे वह संगीत, कला, खेल या किसी अन्य क्षेत्र से जुड़ी हो, उसकी कड़ी मेहनत का परिणाम होता है। उन्हें अनावश्यक रूप से राजनीतिक विवादों में घसीटना सही नहीं है।
- देश की राजनीति का स्तर नीचे खींचने वाले बयान
आज जब देश आगे बढ़ रहा है, महिलाएँ हर क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, भारत विश्व मंच पर अपनी प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है तब यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ नेता ऐसी भाषा बोलते हैं जो देश की छवि को नुकसान पहुँचाती है।
महिलाओं पर ये अभद्र टिप्पणी अखिलेश यादव के बेलगाम नेता अभी तक धर्म का मजाक बनाते थे पर अब वह किसी भी लड़की और महिला पर इतनी अभद्र टिप्पणी करते नजर आ रहे है। जो कि आज संविधान के अनुसार एक संवैधानिक पद पर है एक विधायक है।
ये नेता न केवल विपक्ष की गरिमा गिराते हैं, बल्कि यह भी साबित करते हैं कि वे लोकतंत्र में संवाद की जगह केवल कटाक्ष, अपमान और गाली को महत्व देते हैं।
क्या राजनीति अब इतनी सस्ती हो गई है कि किसी प्रतिभा या किसी महिला का सम्मान करना भी मुश्किल हो गया है?
क्या सार्वजनिक जीवन में अब सभ्यता एक दुर्लभ वस्तु बन चुकी है?
समाजवादी पार्टी के इन नेताओं की बयानबाज़ी देखकर लगता है कि वे न तो आधुनिक भारत को समझते हैं, न ही उसकी नयी संवेदनाओं को।
वे उस पुराने राजनीतिक मॉडल में फंसे हुए हैं जहाँ कटाक्ष और अभद्रता को “बहादुरी” माना जाता था।
इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू कर दी है कि सोशल मीडिया के दौर में भाषा पर संयम रखना कितना महत्वपूर्ण है। आम जनता और सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं की राय यह है कि राजनीतिक समर्थकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी पार्टी की साख उसके कार्यकर्ताओं की ऑनलाइन टिप्पणियों से भी प्रभावित होती है। कई लोगों ने लिखा कि यदि राजनीतिक दल अपने समर्थकों से संयमित आचरण की अपील करें तो इस प्रकार की स्थितियाँ कम हो सकती हैं।
सोशल मीडिया पर आई इन प्रतिक्रियाओं के बीच यह बात सामने निकलकर आ रही है कि लोगों की नजर में कलाकारों का स्थान राजनीति की रोजमर्रा की बहसों से अलग होना चाहिए। मैथिली ठाकुर जैसी सादगीपूर्ण कलाकार, जिनकी छवि देश में एक घरेलू, शांत और पारंपरिक गायिका के रूप में स्थापित है, उन्हें किसी भी तरह की अभद्र टिप्पणियों से जोड़ना अनेक लोगों को गलत लगा।
- गिरी हुई सोच की जड़ संस्कृति, राजनीतिक प्रशिक्षण या व्यक्तिगत स्तर की कमी?
समाजवादी पार्टी के इन नेताओं पर यह आरोप वर्षों से लगता रहा है कि उन्हें राजनीति की भाषा, भाव और मर्यादा सिखाई ही नहीं जाती।
मंच पर चढ़ते ही इन्हें लगता है कि जितना नीचे गिरोगे, उतनी ही तालियाँ मिलेंगी।
कभी किसी महिला पत्रकार पर टिप्पणी, कभी किसी महिला नेता का मज़ाक, कभी किसी देशभक्त कलाकार की उपलब्धि पर तंज
यही इनकी राजनीति का आधारस्तंभ बन चुका है।
और दुखद यह है कि पार्टी द्वारा भी कई बार इस प्रकार की भाषा को नजरअंदाज किया जाता है।
जब आप किसी गलत व्यवहार पर कड़ी कार्रवाई नहीं करते, तो वह व्यवहार सिर्फ जारी ही नहीं रहता बल्कि धीरे-धीरे “सामान्य” माना जाने लगता है।
इसीलिए समाजवादी पार्टी के कुछ नेता हर कुछ दिनों में कोई नया विवाद खड़ा कर देते हैं।
देश सम्मान चाहता है अभद्रता नहीं
देश के नागरिक आज समझदार हैं।
वे जानते हैं कि कौन नेता भविष्य की राजनीति बनाना चाहता है और कौन नेता सिर्फ सुर्खियाँ पाने के लिए गंदे बयान देता है।
जो नेता महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकते, वे समाज का नेतृत्व क्या करेंगे?
जो नेता प्रतिभाओं का मज़ाक उड़ाते हैं, वे देश की प्रगति को कैसे समझेंगे?
जो नेता हर मुद्दे पर अभद्रता के सहारे राजनीति करते हैं, वे लोकतंत्र की रक्षा कैसे करेंगे?
यह स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं की सोच गिरे हुए स्तर पर पहुँच चुकी है।
सड़कछाप भाषा, अभद्र टिप्पणियाँ और निचले स्तर की बयानबाज़ी यही उनकी पहचान बनकर रह गई है।
और जब तक राजनीतिक दल ऐसी मानसिकता पर कठोर कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक यह सिलसिला चलता ही रहेगा।
राजनीति को शुद्ध करने का समय आ चुका है
भारतीय राजनीति में सुधार की शुरुआत तभी होगी जब जनता ऐसे नेताओं को आईना दिखाएगी जो महिलाओं और प्रतिभाशाली लोगों पर अभद्र टिप्पणियाँ करके राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैं।
समाजवादी पार्टी के इन नेताओं की सोच न सिर्फ गिरी हुई है बल्कि लोकतांत्रिक शिष्टाचार का अपमान है।
राजनीति में तर्क हो सकता है, विरोध हो सकता है, लेकिन महिला का अपमान, प्रतिभा का मज़ाक और उपलब्धि पर कटाक्ष यह सीधे-सीधे चरित्र का प्रमाण है।
आज देश बदलाव चाहता है
सभ्यता का, सम्मान का, और सकारात्मक राजनीति का।
लेकिन कुछ सपाई नेता अभी भी पुराने गंदे राजनीतिक संस्कारों में फंसे हुए हैं।
और यही बताता है
उनकी सोच कितनी गिर चुकी है।
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