Special : SC ने यूजीसी के नए समानता बढ़ाने वाले नियमों पर लगाई अंतरिम रोक, दुरुपयोग की आशंका जताई
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सामाजिक न्याय के कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान राज्य को एससी और एसटी के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता
- उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने हेतु बने यूजीसी विनियम 2026 को SC ने किया स्थगित, पुराने नियम लागू रहेंगे
- चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने यूजीसी के नियमों को अस्पष्ट बताते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया, अगली सुनवाई मार्च में होगी
29 जनवरी 2026 को SC में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए यूजीसी के नए नियमों पर विचार किया गया। इस सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच ने यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026 पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने इन नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला माना। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिए गए कि ये नियम अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं क्योंकि इनमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों तक सीमित रखा गया है जबकि सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा और कहा कि नियमों की भाषा में स्पष्टता की कमी है जो समाज में विभेद पैदा कर सकती है। अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है और तब तक 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। सुनवाई में कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आजादी के 75 साल बाद भी समाज जाति से मुक्त नहीं हो सका है और ऐसे नियमों से क्या स्थिति और पीछे की ओर जा रही है। याचिकाकर्ताओं ने रैगिंग से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि सामान्य वर्ग का छात्र रैगिंग का शिकार होता है और आरोपी आरक्षित वर्ग से है तो शिकायत पर कार्रवाई में भेदभाव हो सकता है। कोर्ट ने इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार किया और नियमों को फिर से तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं के वकील ने सेक्शन 3C का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रावधान जाति आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करता है जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षा नहीं मिलती। उन्होंने तर्क दिया कि यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है और समाज में वैमनस्य बढ़ाने वाला है। कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि नियमों में संतुलन और सुरक्षा उपायों की जरूरत है। चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या इन नियमों से समाज और पीछे की ओर जा रहा है और क्या इसमें रैगिंग की परिभाषा को हटाना उचित है। याचिकाकर्ताओं ने जवाब में कहा कि रैगिंग की शिकायतों पर विचार नहीं किया जाएगा जो जमीनी हकीकत से दूर है। कोर्ट ने अमेरिका के स्कूलों में अलगाव वाले कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे नियमों से बचना चाहिए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने संकेत दिया कि कुछ कानूनविदों की कमेटी इस मुद्दे पर विचार करे ताकि नियमों को बेहतर बनाया जा सके। केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कोर्ट ने कहा कि नियमों को फिर से ड्राफ्ट किया जाए। इस फैसले से उच्च शिक्षा संस्थानों में फिलहाल 2012 के नियम लागू रहेंगे जो सभी वर्गों को समान सुरक्षा प्रदान करते हैं। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए यह आदेश दिया ताकि कोई भी पक्ष निवारण से वंचित न रहे।
यूजीसी के नए नियम 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए थे जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना था। इनमें इक्विटी कमेटियों का गठन अनिवार्य किया गया था जो शिकायतों की जांच करतीं। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ये नियम भेदभावपूर्ण हैं क्योंकि भेदभाव की परिभाषा में सामान्य वर्ग को शामिल नहीं किया गया। सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि नियमों की भाषा इतनी अस्पष्ट है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है और इससे समाज में विभेद बढ़ सकता है। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार संविधान देता है लेकिन इसमें सभी के लिए संतुलन होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने रैगिंग के उदाहरण दिए कि यदि सीनियर आरक्षित वर्ग से है और जूनियर सामान्य वर्ग से तो शिकायत पर कार्रवाई में असमानता हो सकती है। कोर्ट ने इस पर सहमति जताई और कहा कि रैगिंग की परिभाषा को नियमों से हटाना गलत है क्योंकि यह सीनियर-जूनियर संबंधों को संबोधित नहीं करता। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की मदद से नियमों को फिर से तैयार किया जाए ताकि कोई दुरुपयोग न हो। अगली सुनवाई तक नए नियम स्थगित रहेंगे और पुराने नियमों के तहत संस्थान काम करेंगे।
SC ने सुनवाई के दौरान सामाजिक न्याय के कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान राज्य को एससी और एसटी के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है लेकिन इसमें सुरक्षा उपाय होने चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं जो सभी को समान सुरक्षा प्रदान करता है। कोर्ट ने इस पर विचार करते हुए कहा कि नियमों का प्रभाव समाज पर गंभीर हो सकता है और यदि हस्तक्षेप न किया जाए तो यह विभाजनकारी साबित हो सकता है। सुनवाई में कोर्ट ने पूछा कि क्या रैगिंग की शिकायत पर विचार किया जाएगा और जवाब में कहा गया कि नहीं जिससे छात्रों का करियर प्रभावित हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत कोई समाधान नहीं है। केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए कोर्ट ने जवाब मांगा और कहा कि नियमों को विशेषज्ञ कमेटी द्वारा देखा जाए। इस फैसले से उच्च शिक्षा में समानता के प्रयासों पर प्रभाव पड़ेगा लेकिन पुराने नियमों से निरंतरता बनी रहेगी। अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी जिसमें सभी पक्षों के जवाबों पर विचार किया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं ने सुनवाई में जोर दिया कि यूजीसी के नियमों का सेक्शन 3C सामान्य वर्ग को बाहर रखकर भेदभाव करता है। उन्होंने कहा कि यह पुराने कोर्ट आदेशों के विपरीत है और बेहतर नियम बनाए जा सकते हैं। कोर्ट ने इस पर सहमति जताई और कहा कि नियमों को रद्द करने या रोकने की आवश्यकता है। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि क्या ये नियम हमें रिग्रेसिव सोसाइटी की ओर ले जा रहे हैं। सुनवाई के दौरान रैगिंग से जुड़े दुरुपयोग का मुद्दा प्रमुख रहा। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सामान्य श्रेणी के छात्र को रैगिंग का खतरा अधिक है और नियम इससे सुरक्षा नहीं देते। कोर्ट ने कहा कि नियमों में अस्पष्टता से गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। केंद्र को नोटिस जारी करते हुए कोर्ट ने कहा कि नियमों को फिर से मॉड्यूलेट किया जाए। इस आदेश से संस्थानों में 2012 के नियम लागू रहेंगे जो सभी को समान निवारण प्रदान करते हैं। अगली सुनवाई में इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होगी।
SC ने फैसले में अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए कहा कि हाशिए पर पड़े वर्गों को निवारण से वंचित नहीं किया जा सकता। इसलिए 2012 के नियम जारी रहेंगे। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नए नियम समाज में वैमनस्य बढ़ाएंगे। कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ कमेटी नियमों की भाषा पर विचार करे। सुनवाई में कोर्ट ने अमेरिका के अलगाव वाले कानूनों का उदाहरण दिया। केंद्र और यूजीसी को जवाब देने के लिए समय दिया गया है। इस फैसले से उच्च शिक्षा में भेदभाव रोकने के प्रयासों पर असर पड़ेगा लेकिन संतुलन बनाए रखने पर जोर है। अगली सुनवाई 19 मार्च को निर्धारित है।
अंतिम पैराग्राफ में कोर्ट ने जोर दिया कि नियमों का दुरुपयोग रोकने के लिए विशेषज्ञों की आवश्यकता है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नियम संविधान की भावना के विपरीत हैं। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि कमेटी बनाकर नियमों को फिर से तैयार किया जाए। इस बीच नए नियम स्थगित रहेंगे और पुराने नियम लागू होंगे। सुनवाई में सभी बिंदुओं पर विस्तार से विचार किया गया। यह फैसला उच्च शिक्षा में समानता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण है।
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