Special- श्रद्धांजलि : आचार्य निशांतकेतु - एक युगप्रवर्तक साहित्यकार, विद्वान और आध्यात्मिक चिंतक को नमन
चन्द्रकिशोर पांडेय नाम से जन्मे आचार्य निशांतकेतु केवल एक नाम नहीं थे, वे एक परंपरा थे—ज्ञान, साहित्य और साधना की परंपरा। उनकी जीवन यात्रा बिहार की धर
By डॉ. बीरबल झा (लेखक, भाषाविद एवं सांस्कृतिक समाजसेवी, अध्यक्ष, मिथिलालोक फ़ाउंडेशन, प्रबंध निदेशक, ब्रिटिश लिंग्वा)
हृदय भारी है और मन शोकाकुल, क्योंकि आचार्य निशांतकेतु जैसे विलक्षण साहित्यकार और मनीषी अब हमारे बीच नहीं रहे। दिनांक 17 अगस्त 2025, रविवार को गुरुग्राम में उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली। वे 90 वर्ष के थे। उनके निधन से भारतीय साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के एक पूरे युग का पटाक्षेप हो गया है।
चन्द्रकिशोर पांडेय नाम से जन्मे आचार्य निशांतकेतु केवल एक नाम नहीं थे, वे एक परंपरा थे—ज्ञान, साहित्य और साधना की परंपरा। उनकी जीवन यात्रा बिहार की धरती से प्रारंभ होकर राष्ट्रीय और वैश्विक बौद्धिक क्षितिज तक पहुँची।
- हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष
आचार्य निशांतकेतु ने छह दशकों से अधिक के अपने रचनात्मक जीवन में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना और संपादन किया। उनकी लेखनी में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, व्याकरण, आलोचना, धर्म, पर्यावरण, ज्योतिष और तंत्र जैसी विविध विधाओं का समावेश मिलता है।
उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ—“दर्द का दायरा”, “आख़िरी हँसी”, “माटी टीला”, और “तीसरे आदमी की शिनाख़्त”—आज भी पाठकों के हृदय को स्पर्श करती हैं। उनकी रचनाएँ न केवल पठनीय हैं, बल्कि शिक्षाप्रद भी हैं, जिसे बिहार के विद्यालयी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है।
- शिक्षा और ज्ञान के सच्चे साधक
आचार्य निशांतकेतु ने 1960 से 1997 तक पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापन किया और विभागाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। वे अपने छात्रों के लिए केवल शिक्षक नहीं, बल्कि एक प्रेरणास्रोत थे। वे हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, बंगाली, तमिल और तेलुगु भाषाओं में दक्ष थे—जो उनकी बहुभाषिक प्रतिभा का प्रमाण है।
- बहुआयामी विद्वान और आध्यात्मिक साधक
वे एक सच्चे बहुविज्ञानी (Polymath) थे। उनके लेखन में व्याकरण, भाषाविज्ञान, दर्शन, तंत्र, योग, समाजशास्त्र, ज्योतिष और आध्यात्मिक विज्ञान की गहन अंतर्दृष्टि मिलती है। वे राहु और केतु के वैदिक ज्योतिषीय प्रभावों पर अपने गहन ज्ञान के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।
उन्होंने अक्षर तत्व, तांत्रिक विनियोग विद्या, लययोग, अंतर सूर्यविज्ञान, रुद्राक्ष धारण, जपयोग, नवायुर्विज्ञान आदि गूढ़ विषयों पर महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी पुस्तकें—"जिस्म के छिलके", "व्यवहारिक हिंदी व्याकरण", "रति-शृंगार और संन्यास-सार", "प्रज्ञन पुरुष", "भारतीय अंक प्रतीक कोश", और "सुगम तंत्रगम"—भारतीय ज्ञान परंपरा की अनमोल धरोहर हैं।
- सामाजिक चेतना से ओतप्रोत व्यक्तित्व
वे केवल विद्वान ही नहीं, एक नैतिक और सामाजिक चेतना से सम्पन्न व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने साहित्यिक वर्तुलों में व्याप्त क्षेत्रीयता और जातिवाद के विरुद्ध मुखर होकर आवाज़ उठाई। उनकी दृष्टि समावेशी और मानवतावादी थी, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक है।
- सम्मान और स्थायी विरासत
उनकी बहुआयामी सेवाओं के लिए उन्हें 2017 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। उनका निजी अध्ययनकक्ष "आचार्य निशांतकेतु अध्ययन कक्ष" के रूप में मगध विश्वविद्यालय, बोधगया में स्थापित किया गया है, जो उनके ज्ञान की अमिट छवि को सहेजता है।
- एक निजी स्मरण
मेरे लिए आचार्य निशांतकेतु केवल एक वंदनीय विद्वान नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक पथप्रदर्शक थे। वे भारतीय भाषा, संस्कृति और विचार परंपरा के प्रति जो समर्पण रखते थे, वह हम सभी के लिए प्रेरणा है। उनका जाना अपूरणीय क्षति है, परंतु उनके विचार, उनके मूल्य और उनका लेखन सदैव जीवित रहेगा।
आइए हम सब मिलकर उनके द्वारा दिखाए गए पथ पर चलें—जहाँ ज्ञान विनम्रता से जुड़ा हो, विचार व्यापक हों और साहित्य जन-मानस से।
उनकी आत्मा को शांति मिले। वे परमात्मा में विलीन हों, यही हमारी प्रार्थना है। ॐ शांति।
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