पत्नी ने दिव्यांग पति को पीठ पर बिठाकर पूरी की 170 किलोमीटर की यात्रा, कावड़ यात्रा में प्रेम और आस्था की मिसाल।
Kanwar Yatra 2025: सावन माह में उत्तराखंड के हरिद्वार से शुरू होने वाली कावड़ यात्रा हर साल लाखों शिवभक्तों की आस्था का प्रतीक बनती है। इस साल 2025 ...
Kanwar Yatra 2025: सावन माह में उत्तराखंड के हरिद्वार से शुरू होने वाली कावड़ यात्रा हर साल लाखों शिवभक्तों की आस्था का प्रतीक बनती है। इस साल 2025 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक ऐसी कहानी सामने आई, जिसने न केवल श्रद्धा, बल्कि प्रेम, समर्पण और बलिदान की एक अनोखी मिसाल पेश की। मोदीनगर की 28 वर्षीय आशा ने अपने दिव्यांग पति सचिन को अपनी पीठ पर बिठाकर हरिद्वार से 170 किलोमीटर की कठिन कावड़ यात्रा पूरी की। इस यात्रा में उनके दो छोटे बच्चे भी साथ थे। आशा की यह यात्रा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पति के प्रति उनके अटूट प्रेम और भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था का प्रतीक है। उनकी कामना है कि भगवान भोलेनाथ उनके पति को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने की शक्ति दें।
आशा और सचिन उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मोदीनगर के रहने वाले हैं। सचिन पिछले 16 साल से हर सावन में कावड़ यात्रा करते थे, लेकिन 1 अगस्त 2024 को रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के बाद उनकी नस दबने से वे पैरालाइज्ड हो गए। इस बीमारी ने उन्हें चलने-फिरने में असमर्थ कर दिया। पिछले साल वे अपनी पसंदीदा कावड़ यात्रा में शामिल नहीं हो सके, जिसका मलाल उन्हें सालभर रहा। इस बार जब सावन 2025 का समय आया, तो सचिन की इच्छा थी कि वे हरिद्वार जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें। लेकिन उनकी शारीरिक स्थिति ने यह असंभव बना दिया।
यह देखकर आशा ने एक असाधारण फैसला लिया। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने पति को अपनी पीठ पर बिठाकर हरिद्वार से गंगाजल लाएंगी और कनखल के दक्षेश्वर महादेव मंदिर में जलाभिषेक करेंगी। आशा ने हर की पौड़ी से गंगाजल भरा और अपने पति को कंधों पर उठाकर 170 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू की। उनके साथ उनके दो छोटे बच्चे भी इस यात्रा में शामिल हुए। इस दृश्य ने हरिद्वार की गलियों में मौजूद श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं और उनकी कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
कावड़ यात्रा सावन माह में शिवभक्तों की एक पवित्र तीर्थयात्रा है, जिसमें लाखों लोग हरिद्वार, गौमुख, या गंगोत्री से गंगाजल लेकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा नंगे पांव की जाती है, और कावड़, जो बांस या लकड़ी का डंडा होता है, को रंग-बिरंगे झंडों, फूलों और धागों से सजाया जाता है। इसके दोनों सिरों पर गंगाजल से भरे कलश लटकाए जाते हैं। इस दौरान भक्त सात्विक भोजन करते हैं और कावड़ को जमीन पर नहीं रखते, बल्कि ऊंचे स्थान या पेड़ पर लटकाते हैं।
कावड़ यात्रा का धार्मिक महत्व यह है कि इसे करने से भक्तों के पाप नष्ट होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हरिद्वार में सावन के दौरान लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं, और इस बार प्रशासन ने भी विशेष व्यवस्थाएं की थीं ताकि यात्रा सुचारू रूप से हो सके। मुजफ्फरनगर इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, क्योंकि यहां से होकर कावड़िए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जाते हैं।
आशा की यह यात्रा आसान नहीं थी। 170 किलोमीटर की पैदल यात्रा, वह भी अपने पति को पीठ पर बिठाकर, एक असाधारण शारीरिक और मानसिक संकल्प की मांग करती है। सचिन ने बताया कि उन्होंने कभी आशा से यह मांग नहीं की थी, लेकिन आशा ने खुद ही यह जिम्मेदारी ली। उन्होंने कहा, “मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे हरिद्वार ले चलो, लेकिन आशा ने खुद ठान लिया कि वह मुझे कंधों पर बिठाकर मंदिर तक ले जाएगी।” आशा की यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि उनके परिवार के प्रति समर्पण और पति के प्रति प्रेम का प्रतीक है।
आशा ने अपनी मन्नत में भगवान शिव से सचिन के स्वास्थ्य की प्रार्थना की। उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूं कि मेरे पति फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें।” इस यात्रा में उनके दो बच्चे भी साथ थे, जो परिवार की आर्थिक और भावनात्मक चुनौतियों के बीच आशा का हौसला बढ़ा रहे थे। सचिन ने बताया कि उनका बेटा भी बीमार है, और परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। फिर भी, आशा ने हिम्मत नहीं हारी और इस कठिन यात्रा को पूरा किया।
आशा और सचिन की कहानी ने न केवल हरिद्वार, बल्कि पूरे देश में लोगों का दिल जीत लिया। सावन के पहले सोमवार को, जब आशा ने दक्षेश्वर महादेव मंदिर में जलाभिषेक किया, तो वहां मौजूद श्रद्धालु उनकी भक्ति और समर्पण को देखकर भावुक हो गए। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें और वीडियो वायरल हो गए। X पर एक यूजर ने लिखा, “यह कहानी सिर्फ कावड़ यात्रा की नहीं, बल्कि प्रेम और बलिदान की है।” एक अन्य यूजर ने कहा, “आशा जैसी पत्नी हर किसी को नहीं मिलती। यह समाज की सोच बदलने वाली तस्वीर है।”
न्यूज चैनल्स और अखबारों ने भी इस कहानी को प्रमुखता दी। नवभारत टाइम्स ने लिखा, “बीवी हो तो ऐसी,” जबकि ईटीवी भारत ने इसे “आस्था और प्रेम की अनोखी मिसाल” बताया। आशा की इस यात्रा ने समाज को यह संदेश दिया कि सच्ची श्रद्धा और प्रेम किसी भी बाधा को पार कर सकता है।
आशा और सचिन की कहानी इस साल की कावड़ यात्रा की एकमात्र प्रेरणादायक कहानी नहीं थी। मुजफ्फरनगर के खतौली निवासी अनुज प्रजापति ने 151 लीटर गंगाजल लेकर यात्रा की, जिस पर “नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो” का संदेश लिखा था। इसी तरह, दिल्ली के आकाश और सुमित ठाकुर ने अपनी मां किरण देवी को कावड़ में बिठाकर यात्रा पूरी की। बिहार के मिथिलेश कुमार ने अपनी भतीजी की तस्वीर के साथ 105 किलोमीटर की यात्रा की। ये कहानियां दिखाती हैं कि कावड़ यात्रा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम भी है।
आशा और सचिन की कहानी कावड़ यात्रा 2025 की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में से एक है। आशा ने अपने दिव्यांग पति को कंधों पर बिठाकर 170 किलोमीटर की यात्रा पूरी की, जो न केवल उनकी आस्था, बल्कि उनके प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यह कहानी समाज को यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम और श्रद्धा किसी भी मुश्किल को आसान बना सकती है। सावन के इस पवित्र माह में, आशा की यह यात्रा नारी शक्ति, पारिवारिक प्रेम, और धार्मिक आस्था की एक अनोखी मिसाल बन गई है। उनकी इस कहानी ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है और यह साबित किया है कि सच्चा संकल्प और प्रेम हर बाधा को पार कर सकता है। इस साल कावड़ यात्रा के लिए मुजफ्फरनगर में विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं। पुलिस ने 240 किलोमीटर के कावड़ मार्ग पर सुरक्षा और यातायात व्यवस्था सुनिश्चित की। हालांकि, कुछ विवाद भी सामने आए। पिछले साल की तरह, इस बार भी दुकानदारों को अपने नाम और दुकान की जानकारी प्रदर्शित करने के निर्देश दिए गए, जिसे कुछ संगठनों ने धार्मिक आधार पर भेदभाव बताया। AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर सवाल उठाए। लेकिन प्रशासन ने इसे पारदर्शिता और कावड़ियों की सुविधा के लिए बताया।
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