मणिपुर में मिला 37,000 वर्ष पुराना कांटेदार बांस का जीवाश्म: एशिया का सबसे पुराना प्रमाण, हिमयुग के रहस्यों को खोलता खोज। 

मणिपुर के इम्फाल घाटी में एक ऐसी खोज हुई है, जो एशिया की वनस्पति इतिहास को नई दिशा दे सकती है। वैज्ञानिकों ने चिरांग नदी के सिल्ट से

Nov 29, 2025 - 13:44
 0  82
मणिपुर में मिला 37,000 वर्ष पुराना कांटेदार बांस का जीवाश्म: एशिया का सबसे पुराना प्रमाण, हिमयुग के रहस्यों को खोलता खोज। 
मणिपुर में मिला 37,000 वर्ष पुराना कांटेदार बांस का जीवाश्म: एशिया का सबसे पुराना प्रमाण, हिमयुग के रहस्यों को खोलता खोज। 

मणिपुर के इम्फाल घाटी में एक ऐसी खोज हुई है, जो एशिया की वनस्पति इतिहास को नई दिशा दे सकती है। वैज्ञानिकों ने चिरांग नदी के सिल्ट से भरे तलछटों में 37,000 वर्ष पुराना कांटेदार बांस का जीवाश्म पाया है। यह जीवाश्म न केवल एशिया का सबसे पुराना कांटेदार बांस का प्रमाण है, बल्कि यह हिमयुग के दौरान जैव विविधता के रहस्यों को भी उजागर करता है। बीरबल साहनी पैलियोसाइंसेज इंस्टीट्यूट (बीएसआईपी) के शोधकर्ताओं ने इस खोज को जर्नल 'रिव्यू ऑफ पैलियोबॉटनी एंड पालिनोलॉजी' में प्रकाशित किया है। जीवाश्म में कांटों के निशान, कलिकाएं और नोड्स स्पष्ट दिखाई देते हैं, जो आमतौर पर जीवाश्मीकरण प्रक्रिया में नष्ट हो जाते हैं। यह खोज बताती है कि हिमयुग की ठंडी और शुष्क जलवायु में यूरोप जैसे क्षेत्रों से बांस विलुप्त हो गए, लेकिन उत्तर-पूर्व भारत के गर्म-नम इलाकों ने इन्हें शरण दी।

खोज की शुरुआत बीएसआईपी के शोधकर्ताओं के एक सामान्य क्षेत्र सर्वेक्षण से हुई। इम्फाल वेस्ट जिले में चिरांग नदी के किनारों पर खुदाई के दौरान उन्हें एक बांस का तना मिला, जिस पर असामान्य निशान थे। सामान्यतः बांस के जीवाश्म दुर्लभ होते हैं, क्योंकि इनके खोखले तने और रेशेदार ऊतक तेजी से सड़ जाते हैं। वैज्ञानिक आमतौर पर जीवित प्रजातियों से तुलना करके बांस की रक्षा प्रणालियों का अध्ययन करते हैं। लेकिन इस बार मामला अलग था। लैब में विस्तृत विश्लेषण से पता चला कि ये निशान कांटों के अवशेष हैं। शोधकर्ता एच. भाटिया, पी. कुमारी, एन.एच. सिंह और जी. श्रीवास्तव ने माइक्रोस्कोपिक जांच की। नोड्स, कलिकाओं और कांटों के निशानों की तुलना जीवित कांटेदार बांस प्रजातियों जैसे बांसूसा बैंबोस और चिमोनोबैंबूसा कैलोसा से की गई। जीवाश्म को चिमोनोबैंबूसा जीनस में वर्गीकृत किया गया और इसे चिमोनोबैंबूसा मणिपुरेंसिस नाम दिया गया। यह पहला प्रमाण है कि हिमयुग के दौरान एशिया में बांस में कांटेदारता विकसित हो चुकी थी, जो जंगली जानवरों से रक्षा के लिए एक प्रारंभिक तंत्र था।

हिमयुग, जो लगभग 2.6 मिलियन से 11,700 वर्ष पहले चला, वैश्विक जलवायु को ठंडा और शुष्क बना देता था। इस दौरान कई पौधों की प्रजातियां विलुप्त हो गईं। यूरोप और अन्य महाद्वीपों में बांस पूरी तरह गायब हो गए, क्योंकि वहां की कठोर परिस्थितियां इन्हें सहन नहीं कर पाईं। लेकिन उत्तर-पूर्व भारत, खासकर मणिपुर जैसे क्षेत्रों में गर्म और नम जलवायु ने बांस को जीवित रखा। इम्फाल घाटी की सिल्टी मिट्टी ने जीवाश्म को संरक्षित किया, जो सामान्यतः नष्ट हो जाता। यह खोज बताती है कि इंडो-बर्मा क्षेत्र हिमयुग के दौरान जैव विविधता का सुरक्षित आश्रय स्थल था। यहां की विविध पारिस्थितिकी ने न केवल बांस, बल्कि अन्य पौधों को भी बचाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज प्राचीन पारिस्थितिक तंत्रों को समझने में मदद करेगी। बांस की कांटेदारता जंगली जानवरों से बचाव का साधन थी, जो बताती है कि पौधे लाखों वर्ष पहले ही पर्यावरणीय चुनौतियों से लड़ना सीख चुके थे।

बीएसआईपी के निदेशक डॉ. एस.के. बरुआ ने कहा कि यह खोज एशिया की वनस्पति इतिहास को फिर से लिख सकती है। जीवाश्म में कांटों के निशान इतने स्पष्ट हैं कि यह जीवाश्मीकरण की दुर्लभ प्रक्रिया को दर्शाता है। सामान्य जीवाश्म केवल मजबूत संरचनाओं को बचाते हैं, लेकिन यहां नाजुक कलिकाएं और निशान बचे हैं। यह चिरांग नदी की सिल्टी जमा होने की प्रक्रिया का कमाल है, जो ऑक्सीजन की कमी से सड़न को रोकती है। शोध पत्र में लिखा है कि यह जीवाश्म हिमयुग के अंतिम चरण (लास्ट ग्लेशियल मैक्सिमम) से जुड़ा है, जब वैश्विक तापमान 4-7 डिग्री सेल्सियस कम था। मणिपुर की नम जलवायु ने बांस को हरे-भरे जंगलों में बसने दिया, जबकि अन्य जगहों पर सूखा पड़ा। यह खोज जलवायु परिवर्तन के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज के ग्लोबल वार्मिंग से जैव विविधता को खतरा है। उत्तर-पूर्व भारत जैसे क्षेत्र भविष्य के आश्रय स्थल हो सकते हैं।

मणिपुर, जो भारत का पूर्वोत्तर द्वार है, जैव विविधता का खजाना है। यहां 500 से अधिक बांस प्रजातियां पाई जाती हैं, जो कुल मिलाकर विश्व की 10 प्रतिशत हैं। इम्फाल घाटी में चिरांग नदी गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन का हिस्सा है, जहां प्राचीन नदियां जीवाश्म जमा करती हैं। बीएसआईपी की टीम ने 2024 में शुरू हुए सर्वेक्षण में यह पाया। संस्थान, जो 1946 में स्थापित हुआ, पौधों के जीवाश्मों पर विशेषज्ञता रखता है। इस खोज से पहले, एशिया में बांस के जीवाश्म सीमित थे, लेकिन कांटेदार का यह पहला प्रमाण है। वैज्ञानिकों ने जीवित प्रजातियों से तुलना करके पाया कि चिमोनोबैंबूसा मणिपुरेंसिस आधुनिक चिमोनोबैंबूसा कैलोसा से मिलती-जुलती है। कांटे जानवरों जैसे हिरण और हाथियों से बचाव के लिए थे। हिमयुग में घने जंगल इनकी रक्षा करते थे।

यह खोज पर्यावरण संरक्षण के लिए संदेश देती है। आज बांस को कागज, निर्माण और ईंधन के लिए काटा जा रहा है। मणिपुर में वनों की कटाई से जैव विविधता खतरे में है। सरकार ने बांस मिशन शुरू किया है, जो 2025 तक 10 लाख हेक्टेयर में बांस लगाने का लक्ष्य रखता है। लेकिन हिमयुग की तरह, आज के जलवायु संकट में उत्तर-पूर्व को बचाना जरूरी है। वैज्ञानिकों ने कहा कि ऐसी खोजें हमें अतीत से सीखने को प्रेरित करती हैं। बीएसआईपी अब और सर्वेक्षण करेगा। यह जीवाश्म लखनऊ के संग्रहालय में रखा गया है, जहां शोधकर्ता इसे अध्ययन के लिए इस्तेमाल करेंगे।

Also Read- सुन लो अखिलेश यादव जी, राहुल गांधी जी - ये चंद्रशेखर आज़ाद अब UP चुनाव में... रोहिणी घावरी ने चंद्रशेखर आजाद पर किया बड़ा दावा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।