जादवपुर विश्वविद्यालय के वैचारिक गढ़ में बड़ा बदलाव- दशकों पुराने वामपंथी वर्चस्व के बीच पहली बार आयोजित हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा
जादवपुर विश्वविद्यालय का इतिहास हमेशा से छात्र संघों पर वाम-झुकाव वाले संगठनों के पूर्ण नियंत्रण का रहा है। यहाँ की दीवारों पर लिखे नारे और यहाँ होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम लंबे समय तक एक विशिष्ट विचारधारा के पोषक रहे हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी की हालिया चुनावी स
- बंगाल की सत्ता परिवर्तन का शैक्षणिक परिसरों पर व्यापक असर: जादवपुर के आर्ट्स-साइंस चौराहे पर भगवा ध्वज के साथ गूंजे राष्ट्रवाद और जय श्री राम के नारे
- वैचारिक ध्रुवीकरण का नया केंद्र बना जेयू: 2012 के मुकाबले राज्य में आरएसएस की शाखाओं में तीन गुना से अधिक की वृद्धि ने बदला कैंपस का माहौल
पश्चिम बंगाल की राजनीति और बौद्धिक जगत का हृदय माने जाने वाले जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रांगण में मंगलवार की सुबह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। दशकों से वामपंथी और उदारवादी विचारधारा का अभेद्य दुर्ग माने जाने वाले इस संस्थान में पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सुबह की ड्रिल यानी शाखा का आयोजन किया गया। यह घटनाक्रम राज्य की राजनीतिक दिशा में आए बड़े बदलाव के ठीक बाद घटित हुआ है, जिसने विश्वविद्यालय की पारंपरिक कार्यसंस्कृति और वैचारिक ढांचे को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। कैंपस के भीतर खाकी शॉर्ट्स और सफेद शर्ट में स्वयंसेवकों की मौजूदगी ने उस परिसर में एक नई इबारत लिख दी है, जहाँ कभी दक्षिणपंथी विचारों का प्रवेश भी वर्जित माना जाता था। इस बदलाव को केवल एक सुबह की गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे राज्य की बदलती सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिबिंब के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
जादवपुर विश्वविद्यालय का इतिहास हमेशा से छात्र संघों पर वाम-झुकाव वाले संगठनों के पूर्ण नियंत्रण का रहा है। यहाँ की दीवारों पर लिखे नारे और यहाँ होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम लंबे समय तक एक विशिष्ट विचारधारा के पोषक रहे हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी की हालिया चुनावी सफलता ने कैंपस के भीतर दबे हुए स्वरों को नई ऊर्जा प्रदान की है। शाखा के आयोजन से पहले, विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और समर्थकों ने परिसर के भीतर एक विशाल विजय मार्च निकाला, जिसमें राष्ट्रवाद के जयकारे लगाए गए। यह मार्च उसी आर्ट्स-साइंस चौराहे से शुरू हुआ, जो ऐतिहासिक रूप से वाम-समर्थित शिक्षकों और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा है। भगवा झंडों की लहर और नारों की गूंज ने स्पष्ट कर दिया कि अब विश्वविद्यालय के भीतर वैचारिक एकाधिकार का दौर समाप्त होने की दिशा में बढ़ रहा है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2012 में जहाँ पूरे राज्य में संघ की शाखाओं की संख्या मात्र 1,350 थी, वहीं 2026 तक यह बढ़कर 4,325 के पार पहुँच गई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि संघ ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ को बहुत मजबूती से विस्तार दिया है, जिसका प्रभाव अब उच्च शिक्षण संस्थानों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
परिसर के भीतर होने वाले इस बदलाव का प्रभाव केवल छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कर्मचारियों और संकाय सदस्यों के एक वर्ग में भी जबरदस्त उत्साह देखा गया। कर्मचारियों ने खुले तौर पर भगवा ध्वज लहराते हुए अपनी वैचारिक निष्ठा का प्रदर्शन किया, जो पूर्व के वर्षों में एक दुर्लभ दृश्य था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रवाद की भावना को सर्वोपरि रखा गया और सुरक्षा व्यवस्था के बीच स्वयंसेवकों ने अपनी शारीरिक और मानसिक दक्षता का अभ्यास किया। विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण रही, क्योंकि उन्हें एक तरफ संस्थान की लोकतांत्रिक परंपराओं को बनाए रखना था और दूसरी तरफ बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच सुरक्षा और शांति सुनिश्चित करनी थी। इस मार्च और ड्रिल ने यह संदेश दिया है कि जादवपुर की पहचान अब केवल एकपक्षीय नहीं रह गई है।
विश्वविद्यालय के भीतर होने वाली इस हलचल ने पुराने छात्र संगठनों और नए उभरते गुटों के बीच एक वैचारिक संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी है। लंबे समय से कैंपस की राजनीति को दिशा देने वाले समूहों के लिए यह स्वीकार करना कठिन हो रहा है कि उनके गढ़ में कोई अन्य विचारधारा न केवल प्रवेश कर चुकी है, बल्कि अपना सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर रही है। मंगलवार की सुबह हुई इस ड्रिल ने उन तमाम वर्जनाओं को तोड़ दिया है जो पिछले कई दशकों से इस संस्थान का हिस्सा थीं। इस घटनाक्रम को राज्य भर में हो रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थान से जोड़कर देखा जा रहा है, जहाँ परंपरागत रूप से वामपंथी माने जाने वाले क्षेत्रों में भी अब दक्षिणपंथी विचारों को व्यापक समर्थन मिल रहा है। यह बदलाव शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक व्यवहार में भी एक बड़े संक्रमण काल का संकेत दे रहा है।
संघ की शाखाओं में हुई सांख्यिकीय वृद्धि ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल में विचारधारा की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है। 2012 से 2026 के बीच शाखाओं की संख्या में हुई तीन गुना से अधिक की बढ़ोत्तरी केवल रैलियों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने बौद्धिक विमर्श के केंद्रों में भी अपनी जगह बनाई है। जादवपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में आरएसएस की सक्रियता का बढ़ना यह बताता है कि आने वाले समय में छात्र राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदलने वाले हैं। यहाँ होने वाले विमर्श, सेमिनार और दीवारों पर होने वाली कलाकृतियों में भी अब विविधता देखने को मिल सकती है। कर्मचारियों द्वारा निकाला गया मार्च और उसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या ने प्रशासन को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कैंपस की आंतरिक व्यवस्था में अब व्यापक बदलाव की लहर को रोकना कठिन होगा। परिसर के माहौल में आए इस परिवर्तन ने उन लोगों को भी अचंभित कर दिया है जो जादवपुर को केवल विरोध और प्रतिरोध की राजनीति के लिए जानते थे। भगवा ध्वज का लहराना और जय श्री राम के नारे लगना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता परिवर्तन का प्रभाव केवल सचिवालय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह राज्य की रग-रग में बसे संस्थानों तक पहुँचता है। इस घटना के बाद से कैंपस के भीतर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और वैचारिक समूहों के बीच संवाद और विवाद की स्थिति बनी हुई है। छात्रों का एक वर्ग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विविधता के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे संस्थान की मूल पहचान के लिए खतरा मान रहा है। इस खींचतान के बीच, जादवपुर विश्वविद्यालय अब एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है जहाँ हर विचारधारा को अपना पक्ष रखने की चुनौती और अवसर दोनों प्राप्त होंगे।
Also Click : Lucknow : असम सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, हिमंता बिस्वा सरमा को दी बधाई
What's Your Reaction?


