साल 2018 से अब तक गुमला में तैनात रहे सभी एसपी और जांच अधिकारी तलब, कोर्ट में देनी होगी निजी हाजिरी, जानें पूरा मामला
पुलिस ने अदालत को सूचित किया था कि उन्होंने रेलवे के यात्रा डेटा और विभिन्न राज्यों के पोर्टल्स पर बच्ची की जानकारी साझा की है। साथ ही, जांच के दौरान पुलिस ने यह दावा भी किया कि इस बच्ची की तलाश करते समय उन्होंने अन्य 9 लापता बच्चों को बरामद किया है। हालांकि, अदालत इस दलील से
- गुमशुदा बच्चों पर झारखंड हाई कोर्ट का कड़ा रुख, पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल
- 'सात साल और शून्य नतीजा': अदालत ने दी चेतावनी, कहा- पुलिस विफल रही तो मामला सीबीआई को सौंपेंगे
झारखंड में बच्चों की तस्करी और उनके लापता होने की बढ़ती घटनाओं पर झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने गुमला जिले से साल 2018 में लापता हुई एक छह वर्षीय मासूम बच्ची के मामले में सुनवाई करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने पुलिस की जांच क्षमता पर गहरा संदेह व्यक्त करते हुए कहा कि करीब सात साल का समय बीत जाने के बाद भी एक छोटी बच्ची का सुराग न मिल पाना पुलिस मशीनरी की विफलता का जीवंत प्रमाण है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की है और साल 2018 से लेकर अब तक गुमला जिले में तैनात रहे सभी पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और संबंधित जांच अधिकारियों (आईओ) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।
यह पूरा मामला गुमला की रहने वाली चंद्रमुनि उरांव की याचिका से जुड़ा है, जिनकी छह साल की बेटी सितंबर 2018 में अचानक गायब हो गई थी। मां की ममता और न्याय की गुहार जब स्थानीय स्तर पर अनसुनी कर दी गई, तो उन्होंने थक-हारकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। तब से यह मामला उच्च न्यायालय की सीधी निगरानी में है, लेकिन इसके बावजूद पुलिस के हाथ खाली हैं। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भारी नाराजगी जताई कि मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया गया, जो दिल्ली और अन्य राज्यों तक गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुलिस का यह रवैया 'असंतोषजनक' और 'अक्षम' है, जो न्याय प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करता है। अदालत ने सुनवाई के दौरान पुलिस के उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें बार-बार जांच के लिए और समय की मांग की जा रही थी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि राज्य की पुलिस मशीनरी एक बच्ची को सात सालों में ढूंढने में विफल रहती है, तो इस मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपना पूरी तरह से न्यायोचित होगा। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि जब राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और गुमला एसपी खुद पहले व्यक्तिगत रूप से पेश होकर आश्वासन दे चुके थे, तो उसके बाद भी जांच में कोई ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई? यह स्थिति दर्शाती है कि कहीं न कहीं जांच की दिशा और इच्छाशक्ति में बड़ी कमी है।
मानव तस्करी का गढ़ बनता झारखंड
हाई कोर्ट ने अपनी मौखिक टिप्पणियों के दौरान इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि झारखंड, विशेष रूप से इसके आदिवासी बहुल इलाके, मानव तस्करी का आसान लक्ष्य बनते जा रहे हैं। गरीबी, निरक्षरता और जागरूकता की कमी के कारण मासूम बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाकर बेच दिया जाता है या उनसे जबरन मजदूरी कराई जाती है। अदालत ने आधार कार्ड के विवरणों के उपयोग और लापता बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है।
पुलिस ने अदालत को सूचित किया था कि उन्होंने रेलवे के यात्रा डेटा और विभिन्न राज्यों के पोर्टल्स पर बच्ची की जानकारी साझा की है। साथ ही, जांच के दौरान पुलिस ने यह दावा भी किया कि इस बच्ची की तलाश करते समय उन्होंने अन्य 9 लापता बच्चों को बरामद किया है। हालांकि, अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। खंडपीठ ने कहा कि अन्य बच्चों का मिलना अच्छी बात है, लेकिन मुख्य याचिकाकर्ता की बेटी, जो 2018 से लापता है, उसका पता न चलना पुलिस की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। अदालत ने पुलिस से पूछा कि क्या उन्होंने उन सभी वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं का उपयोग किया है जो आज के समय में उपलब्ध हैं, या केवल कागजी खानापूर्ति की जा रही है। झारखंड हाई कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 9 जून 2026 की तारीख मुकर्रर की है। इस दिन साल 2018 के बाद से गुमला में पदस्थापित रहे हर एक एसपी को कोर्ट के सामने यह बताना होगा कि उनके कार्यकाल के दौरान इस विशिष्ट मामले में क्या प्रगति हुई और उन्होंने इसे सुलझाने के लिए क्या विशेष प्रयास किए। यह आदेश राज्य के पुलिस महकमे में हड़कंप मचाने वाला है, क्योंकि यह सीधे तौर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह अब किसी भी प्रकार के टालमटोल वाले जवाब को स्वीकार नहीं करेगी और उसे बच्ची की बरामदगी या ठोस सुराग के रूप में परिणाम चाहिए।
Also Click : Lucknow : असम सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, हिमंता बिस्वा सरमा को दी बधाई
What's Your Reaction?


