अजब - गजब : कोलमान्स्कोप- हीरे की चमक से रेत में दफ्न हुआ नामीबिया का भूतिया शहर।
GhostTown: कोलमान्स्कोप की कहानी 1908 में शुरू होती है, जब नामीबिया उस समय जर्मन साउथ-वेस्ट अफ्रीका के नाम से जर्मन उपनिवेश था....
इस खोज के बाद हीरों की तलाश में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। 1912 तक, कोलमान्स्कोप एक संपन्न शहर बन चुका था, जो दुनिया के 11.7% हीरों का उत्पादन करता था। उस समय, रेत से हीरे इतने आसानी से मिलते थे कि लोग जमीन पर रेंगकर जाम के डिब्बों में हीरे भर लेते थे। इस धन-दौलत ने कोलमान्स्कोप को अफ्रीका का सबसे अमीर शहर बना दिया।
- जर्मन शैली में बसा आलीशान शहर
हीरों की इस खोज ने कोलमान्स्कोप को एक छोटे से रेलवे स्टेशन से जर्मन शैली के शानदार शहर में बदल दिया। जर्मन बसने वालों ने इसे अपने देश जैसा बनाया। यहां बड़े-बड़े पत्थर के मकान बने, जिनमें बरामदे, बगीचे, और आलीशान फर्नीचर थे। शहर में अस्पताल, स्कूल, थिएटर, कैसीनो, बॉलरूम, स्पोर्ट्स हॉल, और बॉलिंग एली थी। यहाँ तक कि दक्षिणी गोलार्ध की पहली एक्स-रे मशीन और अफ्रीका की पहली ट्राम भी कोलमान्स्कोप में थी।
शहर में बिजली स्टेशन, आइस फैक्ट्री, और ताजा नींबू पानी बनाने की मशीनें थीं। पानी को केप टाउन से रेल के जरिए मंगवाया जाता था, ताकि अमीर जर्मनों के बगीचे हरे-भरे रहें। थिएटर में यूरोप से ओपेरा गायक आते थे, और लोग शैंपेन और कैवियार का लुत्फ उठाते थे। एक समय में, कोलमान्स्कोप में करीब 1,200 लोग रहते थे, जिनमें 300 जर्मन परिवार और 800 से ज्यादा ओशिवाम्बो मजदूर थे।
- जर्मन नियंत्रण और स्पेर्गेबीट
हीरों की इतनी प्रचुरता देखकर जर्मन सरकार ने 1908 में कोलमान्स्कोप के आसपास के विशाल इलाके को "स्पेर्गेबीट" (Sperrgebiet) यानी "प्रतिबंधित क्षेत्र" घोषित कर दिया। इसका मतलब था कि आम लोगों का वहां प्रवेश वर्जित था, और हीरे की खोज का अधिकार सिर्फ बर्लिन की एक कंपनी को दिया गया। इस नीति ने कई स्थानीय आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। उन्हें मजदूरी के लिए हीरे की खानों में काम करना पड़ा, जहां वे तंग बैरकों में महीनों रहते थे।
यह औपनिवेशिक शोषण का एक काला अध्याय था। जर्मन बसने वाले शानदार जिंदगी जीते थे, जबकि स्थानीय ओशिवाम्बो मजदूर कठिन परिस्थितियों में काम करते थे। हीरे निगलने की कोशिश करने वालों की जांच के लिए एक्स-रे मशीन का इस्तेमाल भी होता था।
- कोलमान्स्कोप का पतन
कोलमान्स्कोप की चमक ज्यादा दिन नहीं टिकी। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान खनन कार्य रुक गया, और हीरे की कीमतें गिर गईं। 1919 में वर्साय की संधि के बाद जर्मन साउथ-वेस्ट अफ्रीका ब्रिटिश नियंत्रण वाले दक्षिण अफ्रीका के अधीन चला गया। युद्ध के बाद खनन फिर शुरू हुआ, लेकिन 1920 के दशक तक कोलमान्स्कोप के हीरे कम होने लगे।
1928 में, कोलमान्स्कोप से 270 किलोमीटर दक्षिण में ओरंजमुंड के पास दुनिया के सबसे बड़े हीरे के भंडार मिले। ये हीरे समुद्र तट पर बिखरे पड़े थे, जिन्हें खनन की जरूरत नहीं थी। इस खोज ने कोलमान्स्कोप के भाग्य पर अंतिम मुहर लगा दी। लोग अपने घर, सामान, और सपने छोड़कर ओरंजमुंड की ओर दौड़ पड़े। 1943 तक, खनन कंपनी ने कोलमान्स्कोप छोड़ दिया, और 1956 तक यह शहर पूरी तरह से खाली हो गया।
- रेत का आलम: प्रकृति का कब्जा
1956 के बाद, कोलमान्स्कोप को नमिब रेगिस्तान की रेत ने धीरे-धीरे निगलना शुरू कर दिया। यह दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान है, जो 55 मिलियन साल से मौजूद है। रेत ने घरों के दरवाजे-खिड़कियां तोड़ दीं और कमरों को भर दिया। आज, कई मकानों में रेत कमर तक जमा है। रंग-बिरंगी दीवारें, टूटी छतें, और रेत से भरे बाथटब इस शहर की उदास लेकिन रहस्यमयी तस्वीर पेश करते हैं।
कोलमान्स्कोप की यह हालत मानव लालच और प्रकृति की ताकत का प्रतीक है। जो शहर कभी हीरों की चमक से जगमगाता था, वह आज रेत के नीचे दफ्न हो रहा है। कुछ इमारतें अभी भी खड़ी हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 2010 के बाद से कई ढांचों की हालत और बिगड़ गई है। शायद कुछ दशकों में यह शहर पूरी तरह रेत में समा जाए।
- पर्यटन का केंद्र: भूतिया आकर्षण
1980 में, डी बीयर्स खनन कंपनी और नामीबिया सरकार की साझा कंपनी नमडेब ने कोलमान्स्कोप को एक पर्यटन स्थल में बदल दिया। 2002 में, घोस्ट टाउन टूर्स नाम की कंपनी को इसकी देखरेख का जिम्मा मिला। आज, हर साल 35,000 से ज्यादा पर्यटक इस भूतिया शहर को देखने आते हैं।
कोलमान्स्कोप अब एक खुला संग्रहालय है, जहां गाइडेड टूर आयोजित होते हैं। पर्यटक जर्मन शैली के घरों, स्कूल, और अस्पताल को देख सकते हैं। फोटोग्राफरों के लिए यह स्वर्ग है, क्योंकि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय रेत और खंडहरों का मेल अनोखी तस्वीरें देता है। टूर में कैसीनो की शैंपेन बार में बनी टैवर्न भी शामिल है, जहां पर्यटक कॉफी और स्नैक्स का मजा ले सकते हैं।
टूर की कीमत करीब 200 नामीबियाई डॉलर (लगभग 12 USD) प्रति वयस्क है, जबकि फोटोग्राफी परमिट के लिए 400 नामीबियाई डॉलर देने पड़ते हैं। शहर सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक खुला रहता है, और सूर्योदय-सूर्यास्त के लिए विशेष परमिट चाहिए।
- रहस्य और कहानियां
कोलमान्स्कोप की सुनसान गलियों में कई रहस्यमयी कहानियां जुड़ी हैं। कुछ पर्यटकों का कहना है कि उन्हें खाली मकानों में कदमों की आहट, फुसफुसाहट, या किसी के देखने का अहसास हुआ। हालांकि, ये कहानियां ज्यादा डरावनी नहीं, बल्कि शहर की उदासी को और गहरा करती हैं। इसकी खामोशी और रेत से भरे कमरे पर्यटकों को समय की नश्वरता का एहसास कराते हैं।
कोलमान्स्कोप सिर्फ एक भूतिया शहर नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शोषण का एक दस्तावेज भी है। जर्मन बसने वालों ने हीरों की खोज का पूरा फायदा उठाया, जबकि स्थानीय आदिवासियों को सिर्फ मेहनत और मुश्किल जिंदगी मिली। जकारियास लेवाला जैसे मजदूर, जिनकी खोज ने यह शहर बसाया, उन्हें कभी सम्मान नहीं मिला। यह शहर हमें याद दिलाता है कि मानव प्रगति के पीछे कितना शोषण और असमानता हो सकती है।
कोलमान्स्कोप की कहानी मानव महत्वाकांक्षा, धन के लालच, और प्रकृति की ताकत का एक अनोखा मिश्रण है। 1908 में एक चमकते पत्थर ने इसे दुनिया का सबसे अमीर शहर बनाया, लेकिन 1956 तक यह रेत में दफ्न होने लगा। आज, कोलमान्स्कोप एक भूतिया शहर है, जो पर्यटकों को अपनी रहस्यमयी सुंदरता और उदास इतिहास से आकर्षित करता है। यह हमें सिखाता है कि धन और शोहरत कितनी जल्दी मिट सकती है, और प्रकृति अंत में हमेशा जीतती है। अगर आप कभी नामीबिया जाएं, तो कोलमान्स्कोप जरूर देखें यह न सिर्फ एक पर्यटन स्थल है, बल्कि समय और इतिहास का एक जीवंत सबक भी है।
Also Read- अजब-गजब: 12 साल तक बिना ड्यूटी सिपाही ने कमाए 28 लाख रुपये, मध्य प्रदेश पुलिस में सनसनीखेज घोटाला।
What's Your Reaction?











