Balrampur : बलरामपुर महोत्सव- दो दशकों से इंतजार, प्रशासनिक उपेक्षा से सांस्कृतिक पहचान पर संकट
वर्ष 2025 में बलरामपुर फर्स्ट संस्था के संस्थापक सर्वेश सिंह ने इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप दिया। युवाओं और प्रबुद्ध लोगों का समर्थन मिला। जनता की मांग पर तत्कालीन
उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिले बलरामपुर में सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बलरामपुर महोत्सव फिर से शुरू होने की उम्मीद धूमिल पड़ गई है। लगभग 20 साल पहले यानी 2005-06 के आसपास यह महोत्सव आखिरी बार भव्य रूप से हुआ था। यह आयोजन स्थानीय कलाकारों के लिए बड़ा मंच था। साथ ही थारू जनजाति की लुप्त होती कलाओं, परंपराओं और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने का मुख्य माध्यम था। समय के साथ महोत्सव बंद हो गया, जिससे जिले की सांस्कृतिक विरासत को गहरा नुकसान पहुंचा।
वर्ष 2025 में बलरामपुर फर्स्ट संस्था के संस्थापक सर्वेश सिंह ने इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप दिया। युवाओं और प्रबुद्ध लोगों का समर्थन मिला। जनता की मांग पर तत्कालीन जिलाधिकारी पवन अग्रवाल ने इसे प्राथमिकता दी। उन्होंने आश्वासन दिया था कि 2026 की बोर्ड परीक्षाओं से पहले भव्य बलरामपुर महोत्सव आयोजित किया जाएगा। इसमें थारू संस्कृति और स्थानीय कलाकारों को प्रमुखता दी जाएगी।
जिलाधिकारी पवन अग्रवाल के स्थानांतरण के बाद तैयारियां रुक गईं। प्रशासनिक स्तर पर कोई नई पहल नहीं हुई। इससे जनपदवासी निराश हैं और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। पड़ोसी जिलों में ऐसे महोत्सवों से पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन बलरामपुर में यह ऐतिहासिक आयोजन अनिश्चितता में है। थारू जनजाति की अनोखी संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए यह महोत्सव जरूरी है। जिले के गायक, नर्तक और शिल्पकार 20 साल से बड़े मंच की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे आयोजन से स्थानीय व्यापार और पर्यटन को भी फायदा होता है। बलरामपुर की जनता अब वर्तमान प्रशासन से उम्मीद लगा रही है कि क्या यह 20 साल पुराना सांस्कृतिक गौरव 2026 में लौटेगा या फिर आश्वासनों में ही दम तोड़ देगा।
Also Click : Ayodhya : राम मंदिर अभेद्य किले की तरह बनेगा, 4 किलोमीटर बाउंड्री वॉल और वॉच टावर से होगी मजबूत सुरक्षा
What's Your Reaction?









