आंखें गयीं लेकिन नहीं गया तो उनका हौसला, पढिये अंधेरे को चुनौती देकर इतिहास रचने वाले भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश के शौर्य की असली कहानी। 

भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश की कहानी साहस और दृढ़ता का एक जीवंत उदाहरण है। 2014 में ड्यूटी के दौरान एक भयानक हादसे

By INA News Desk
Dec 12, 2025 - 13:25
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आंखें गयीं लेकिन नहीं गया तो उनका हौसला, पढिये अंधेरे को चुनौती देकर इतिहास रचने वाले भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश के शौर्य की असली कहानी। 
आंखें गयीं लेकिन नहीं गया तो उनका हौसला, पढिये अंधेरे को चुनौती देकर इतिहास रचने वाले भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश के शौर्य की असली कहानी। 
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भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश की कहानी साहस और दृढ़ता का एक जीवंत उदाहरण है। 2014 में ड्यूटी के दौरान एक भयानक हादसे में दोनों आंखों की रोशनी खोने के बाद उन्होंने न केवल अपनी सैन्य सेवा जारी रखी, बल्कि खेलों और शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल कीं। वे भारतीय सशस्त्र बलों के पहले और एकमात्र पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित अधिकारी हैं जो सक्रिय ड्यूटी पर बने हुए हैं। हाल ही में उन्हें 2025 के राष्ट्रीय दिव्यांगजन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया गया, जिसमें उनके सैन्य योगदान, खेल उपलब्धियों और समावेशी पहलों को मान्यता दी गई। द्वारकेश का सफर 2014 के हादसे से शुरू होता है, जब एक सैन्य स्टेशन पर बास्केटबॉल मैच के दौरान दुर्घटना में उनकी आंखें पूरी तरह प्रभावित हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी अंधापन हो गया।

हादसे के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश को लगभग आठ महीनों तक सैन्य अस्पताल में उपचार के लिए रखा गया। इस दौरान उन्होंने न केवल शारीरिक रूप से ठीक होने का प्रयास किया, बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत बने रहे। अस्पताल में रहते हुए उन्होंने अपनी सेवा को जारी रखने की इच्छा व्यक्त की, और सेना ने उनकी दृढ़ता को देखते हुए उन्हें सक्रिय ड्यूटी पर बनाए रखने का निर्णय लिया। यह निर्णय भारतीय सेना की नीतियों का एक उदाहरण था, जहां दिव्यांग सैनिकों को उनकी क्षमताओं के आधार पर अवसर प्रदान किए जाते हैं। द्वारकेश, जो मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले हैं, ने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) में भाग लिया और 2004 में तमिलनाडु एनसीसी निदेशालय द्वारा सर्वश्रेष्ठ कैडेट के रूप में चुने गए। 2009 में कैडेट ट्रेनिंग विंग के माध्यम से सेना में शामिल होने के बाद उन्होंने मिलिट्री इंटेलिजेंस कोर का चयन किया। हादसे से पहले वे सामान्य ड्यूटी पर थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने एआई टूल्स और सहायक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके अपनी जिम्मेदारियों को निभाना शुरू किया। द्वारकेश की सैन्य सेवा में निरंतरता बनाए रखना अपने आप में एक उपलब्धि है। वे खड़की सैन्य स्टेशन में तैनात रहे और बाद में आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट, म्होव में स्थानांतरित हुए। यहां उन्होंने अपनी ड्यूटी को सटीकता के साथ निभाया, जिसमें खुफिया कार्य और प्रशिक्षण शामिल हैं। सहायक तकनीकों के माध्यम से वे दस्तावेजों को पढ़ते हैं, नेविगेशन करते हैं और टीम के साथ समन्वय बनाए रखते हैं। सेना ने उनके लिए विशेष व्यवस्थाएं कीं, जैसे स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर और ब्रेल डिवाइसेज, जो उनकी उत्पादकता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुईं। 2021 में उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर पर चढ़ाई की, जो दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में से एक है। यह चढ़ाई अंधेपन के बावजूद पूरी की गई, जिसमें ऊंचाई 20,000 फीट से अधिक थी। इस अभियान में उन्होंने मौसम की कठोरता और भौगोलिक चुनौतियों का सामना किया, जो सैन्य प्रशिक्षण का हिस्सा था। सियाचिन चढ़ाई ने उनकी शारीरिक और मानसिक मजबूती को प्रमाणित किया, और यह भारतीय सेना के इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना बनी।

खेलों के क्षेत्र में लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश ने पराक्रमी प्रदर्शन किया है। 2018 में पुणे में तैनाती के दौरान उन्होंने तैराकी से शुरुआत की, जो उनकी खेल यात्रा का प्रारंभिक बिंदु था। 2024 में 23वें राष्ट्रीय पैरा तैराकी चैंपियनशिप में उन्होंने 50 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में स्वर्ण पदक और 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में रजत पदक जीता। इस चैंपियनशिप का आयोजन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था, जहां उन्होंने दैनिक पांच घंटे की कठोर अभ्यास के बाद ये सफलताएं हासिल कीं। तैराकी में उनकी तकनीक को सुधारने के लिए उन्होंने कोच की निर्देशों को बारीकी से सुनने और लागू करने पर जोर दिया। इसके अलावा, शूटिंग में उन्होंने असाधारण प्रदर्शन किया। 2023 में राष्ट्रीय पैरा शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने राष्ट्रीय पदक जीता, जहां दृष्टिबाधित एथलीटों के लिए डिजाइन किए गए इन्फ्रारेड सेंसर-आधारित उपकरणों का उपयोग किया। नवंबर 2024 में पांचवीं राष्ट्रीय पैरा शूटिंग प्रतियोगिता में 10 मीटर एयर राइफल विजन इम्पेयर्ड श्रेणी में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और 610 का रिकॉर्ड तोड़ स्कोर बनाया, जो नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना। अक्टूबर 2025 में यूनाइटेड अरब अमीरात में आयोजित शूटिंग विश्व कप में द्वारकेश ने 624.6 का विश्व रिकॉर्ड स्कोर हासिल किया, जिससे वे एयर राइफल में विश्व रैंकिंग तीन पर पहुंच गए। वे भारतीय पैरा शूटिंग टीम का हिस्सा हैं और आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में प्रशिक्षण लेते हैं। इन उपलब्धियों ने न केवल भारतीय सेना को गौरवान्वित किया, बल्कि पैरा स्पोर्ट्स के क्षेत्र में भी नई ऊंचाइयों को छुआ। द्वारकेश ने कहा कि खेलों ने उन्हें जीवन के लिए एक नई दृष्टि प्रदान की है, और वे अब पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित शूटिंग पर केंद्रित हैं। उनकी खेल यात्रा में तैराकी से शूटिंग तक का संक्रमण सहायक उपकरणों और नियमित अभ्यास पर आधारित रहा। राष्ट्रीय पैरा तैराकी चैंपियनशिप में उनके प्रदर्शन ने अन्य पैरा एथलीटों के लिए एक बेंचमार्क स्थापित किया, जहां उन्होंने तकनीकी सुधारों पर विशेष ध्यान दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश ने उल्लेखनीय प्रगति की। हादसे के बाद उन्होंने यूजीसी नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) की योग्यता प्राप्त की, जो उन्हें प्रबंधन, मानव संसाधन, श्रम कानून और खेल अनुसंधान के क्षेत्रों में दृष्टिबाधित विद्वानों की दुर्लभ श्रेणी में रखता है। उन्होंने शैक्षणिक प्रकाशनों के माध्यम से दृष्टिबाधित व्यक्तियों के समावेश और सशक्तिकरण पर महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये प्रकाशन प्रबंधन और खेल नीतियों पर केंद्रित हैं, जो दिव्यांगजनों की भागीदारी को बढ़ावा देते हैं। द्वारकेश ने कहा कि अंधेपन ने उनकी दृष्टि को नहीं लिया, बल्कि उन्हें नई दिशा दी। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां सैन्य ड्यूटी के साथ संतुलित रही हैं, जहां वे सहायक तकनीकों का उपयोग करके अध्ययन जारी रखते हैं। यूजीसी नेट योग्यता ने उन्हें अनुसंधान और नीति निर्माण में योगदान देने का अवसर प्रदान किया। राष्ट्रीय दिव्यांगजन पुरस्कार 2025 को द्वारकेश एक पूर्ण चक्र क्षण मानते हैं। यह पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ दिव्यांगजन श्रेणी में प्रदान किया गया, जो उनकी बहुआयामी उपलब्धियों को मान्यता देता है। पुरस्कार वितरण समारोह नई दिल्ली में आयोजित हुआ, जहां राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से इसे प्रदान किया। इस सम्मान ने भारतीय सेना के खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के संकल्प को पुनः पुष्ट किया। द्वारकेश को गणतंत्र दिवस परेड में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था, जो उनकी उपलब्धियों का एक और प्रमाण है। पुरस्कार के माध्यम से सेना ने प्रतिभा को पोषित करने और विभिन्न अनुशासनों में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। द्वारकेश की यात्रा ने सैन्य और पैरा स्पोर्ट्स के बीच एक पुल का कार्य किया है। द्वारकेश की उपलब्धियां भारतीय सशस्त्र बलों की समावेशी नीतियों को दर्शाती हैं। हादसे के बाद सेना ने उन्हें सक्रिय रखने का निर्णय लिया, जो दिव्यांग सैनिकों के लिए एक मॉडल है। वे खुफिया कोर में अपनी भूमिका निभाते हुए, खेल और शिक्षा में योगदान देते हैं। सियाचिन चढ़ाई 2021 में अक्टूबर में पूरी की गई, जहां उन्होंने चरम मौसम का सामना किया। शूटिंग में इन्फ्रारेड उपकरणों का उपयोग ने उन्हें रिकॉर्ड तोड़ने में सक्षम बनाया। तैराकी में दैनिक अभ्यास ने उनकी सहनशक्ति बढ़ाई। यूजीसी नेट योग्यता ने उन्हें शैक्षणिक क्षेत्र में स्थापित किया। राष्ट्रीय पुरस्कार ने इन सभी प्रयासों को एक मंच प्रदान किया।

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