Nepal Voilence - नेपाल में आखिर क्यों भड़क उठी इतनी बड़ी हिंसा, अब क्या हैं वहां के हालात, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

नेपाल सरकार ने दावा किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स फर्जी खबरें फैलाकर सामाजिक अशांति पैदा कर रहे थे, और पंजीकरण नियमों का पालन करना अनिवार्य था। हा

Sep 10, 2025 - 09:53
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Nepal Voilence - नेपाल में आखिर क्यों भड़क उठी इतनी बड़ी हिंसा, अब क्या हैं वहां के हालात, पढ़ें पूरी रिपोर्ट
नेपाल में आखिर क्यों भड़क उठी इतनी बड़ी हिंसा, अब क्या हैं वहां के हालात, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

नेपाल, जो अपनी शांतिपूर्ण संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, सितंबर 2025 में अभूतपूर्व हिंसा और अराजकता की चपेट में आ गया। राजधानी काठमांडू सहित कई शहरों में सोशल मीडिया प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, और आर्थिक संकट के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए, और देश की राजनीतिक स्थिरता पर गंभीर सवाल उठे।

सितंबर 2025 में नेपाल में हिंसा की शुरुआत 4 सितंबर को सरकार द्वारा 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, और एक्स, पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से हुई। सरकार ने इस प्रतिबंध का कारण इन कंपनियों द्वारा पंजीकरण की शर्तें पूरी न करना बताया, लेकिन युवाओं और नागरिकों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना। 8 सितंबर को काठमांडू के मैतीघर मंडला में ‘हामी नेपाल’ संगठन के बैनर तले हजारों जेन-जेड युवा सड़कों पर उतरे, जिन्होंने “भ्रष्टाचार बंद करो, सोशल मीडिया नहीं” और “सोशल मीडिया बैन हटाओ” जैसे नारे लगाए।

सोशल मीडिया बैन और जनता का गुस्सा

नेपाल सरकार ने दावा किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स फर्जी खबरें फैलाकर सामाजिक अशांति पैदा कर रहे थे, और पंजीकरण नियमों का पालन करना अनिवार्य था। हालांकि, युवाओं ने इसे सरकार की तानाशाही और जनता की आवाज दबाने की कोशिश के रूप में देखा। खासकर जेन-जेड, जिनके लिए सोशल मीडिया संचार, अभिव्यक्ति, और आजीविका का प्रमुख साधन है, ने इस प्रतिबंध को अपनी आजादी पर हमला माना। प्रदर्शनकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के नेता सुदन गुरुंग ने आंदोलन को हवा दी, जिसके बाद लाखों युवा सड़कों पर उतर आए।

हिंसा का हिंसक रूप: काठमांडू से अन्य शहरों तक

8 सितंबर को शुरू हुआ प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन जल्द ही यह हिंसक हो गया। काठमांडू के न्यू बानेश्वर में संसद भवन के पास प्रदर्शनकारियों ने गेट नंबर-2 तोड़ दिया, एक एंबुलेंस में आग लगा दी, और पुलिस गार्ड हाउस पर हमला किया। जवाब में, पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन, रबर बुलेट्स, और लाइव फायरिंग का सहारा लिया, जिसके परिणामस्वरूप 19 लोगों की मौत और 300 से अधिक घायल हो गए। हिंसा काठमांडू तक सीमित नहीं रही; पोखरा, इटहरी, बुटवल, भैरहवा, बिराटनगर, चितवन, और झापा (दमक) जैसे शहरों में भी प्रदर्शन हिंसक हो गए।

संसद और नेताओं के घरों पर हमले

9 सितंबर को स्थिति और बिगड़ गई, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, राष्ट्रपति भवन (शीतल निवास), उपराष्ट्रपति निवास (लैंचौर), और प्रधानमंत्री निवास (बालुवाटार) पर हमले किए। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के भक्तपुर स्थित निजी आवास को आग के हवाले कर दिया गया। पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक, नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा, और माओवादी नेता पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के घरों पर भी पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, सेना को मंत्रियों को हेलीकॉप्टरों के जरिए सुरक्षित निकालना पड़ा।

सरकारी प्रतिक्रिया: कर्फ्यू, सेना तैनाती, और इस्तीफे

हिंसा को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने काठमांडू, ललितपुर, पोखरा, बुटवल, और इटहरी में कर्फ्यू लागू किया। काठमांडू में दोपहर 12:30 बजे से रात 10:00 बजे तक और इटहरी में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया। नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल को तैनात किया गया, और संसद भवन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में शूट-एट-साइट का आदेश जारी किया गया।

गृह मंत्री और प्रधानमंत्री का इस्तीफा

8 सितंबर की रात को गृह मंत्री रमेश लेखक ने हिंसा की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी असाधारण स्थिति का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया। ओली ने अपने त्यागपत्र में कहा, “संवैधानिक राजनीतिक समाधान और समस्याओं के निपटारे के लिए मैं तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं।” हालांकि, इस्तीफों के बावजूद प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ, और उन्होंने नेताओं के घरों और सरकारी इमारतों पर हमले जारी रखे।

हिंसा के अन्य आयाम: सामाजिक और आर्थिक असंतोष

सोशल मीडिया प्रतिबंध के अलावा, प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और आर्थिक मंदी जैसे मुद्दों को भी उठाया। युवाओं ने सोशल मीडिया पर “Nepo Kid” ट्रेंड चलाकर नेताओं के बच्चों पर विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया, जबकि आम जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है। नेपाल में आईएमएफ की ऋण सुविधा 2025 में समाप्त होने और अमेरिकी सहायता में कटौती ने आर्थिक संकट को और गहरा दिया है, जिसने युवाओं के असंतोष को भड़काया।

जनकपुरधाम में धार्मिक तनाव

31 अगस्त 2025 को जनकपुरधाम में गणेश मूर्ति विसर्जन यात्रा के दौरान कथित तौर पर इस्लामी समूहों द्वारा हिंदू श्रद्धालुओं पर पथराव की घटना ने धार्मिक तनाव को बढ़ाया। इस घटना में दो लोग घायल हुए, और स्थानीय प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा। सोशल मीडिया पर इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम तनाव को हवा दी, जिसने काठमांडू में चल रहे प्रदर्शनों को और जटिल बना दिया।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय प्रभाव

नेपाल में हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने हिंसा पर चिंता जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की और सुरक्षा बलों से संयम बरतने का अनुरोध किया। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान, और दक्षिण कोरिया ने भी हिंसा की निंदा की।

भारत-नेपाल सीमा पर हाई अलर्ट

नेपाल में हिंसा के बाद भारत ने अपनी सीमा पर सुरक्षा बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश के सात जिलों में हाई अलर्ट जारी किया गया, और भारतीय खुफिया एजेंसियां नेपाल से संभावित अशांति के भारत में प्रसार को रोकने के लिए निगरानी कर रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंसा को “दिल को दुखाने वाला” बताया और जेन-जेड युवाओं से संयम और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की।

10 सितंबर 2025 तक, नेपाल में हिंसा के कारण 22 लोगों की मौत हो चुकी है, और 300 से अधिक लोग घायल हैं। प्रदर्शनकारियों ने एक जेल पर हमला कर 1600 से अधिक कैदियों को मुक्त कर दिया, जिसने अराजकता को और बढ़ा दिया। काठमांडू का त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बंद है, और स्पाइसजेट ने 10 सितंबर की उड़ानें रद्द कर दीं। सरकार ने सोशल मीडिया प्रतिबंध हटा लिया है, लेकिन प्रदर्शनकारी अब नेताओं की जवाबदेही और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

सितंबर 2025 की हिंसा ने नेपाल की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में गहरी दरारें उजागर की हैं। सोशल मीडिया प्रतिबंध ने जेन-जेड युवाओं के गुस्से को भड़काया, लेकिन इसके पीछे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और आर्थिक संकट जैसे गहरे मुद्दे भी हैं। ओली सरकार का पतन और हिंसा का बढ़ता दायरा नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा को खतरे में डाल रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बातचीत और विश्वास-निर्माण की पेशकश की है, लेकिन नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है शांति और स्थिरता की बहाली।

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