जीवित रहते हुए अपनी ही तेरहवीं और बरसी मनाने की अनोखी तैयारी, गांव में चर्चा का विषय बना रामलोटन का यह कदम

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे रामलोटन का तर्क काफी व्यक्तिगत और भावुक है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद कोई नहीं जानता कि उसके पीछे परिजन रीति-रिवाजों को सही ढंग से निभाएंगे या नहीं, या फिर मृत्यु भोज का आयोजन होगा भी या नहीं। रामलोटन का कहना है कि वे अपनी आंखों से अपने

May 11, 2026 - 10:53
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जीवित रहते हुए अपनी ही तेरहवीं और बरसी मनाने की अनोखी तैयारी, गांव में चर्चा का विषय बना रामलोटन का यह कदम
जीवित रहते हुए अपनी ही तेरहवीं और बरसी मनाने की अनोखी तैयारी, गांव में चर्चा का विषय बना रामलोटन का यह कदम

मध्य प्रदेश के सतना जिले के उचेहरा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम अत्रबेदिया में इन दिनों एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि पूरे जिले के लोगों को हैरत में डाल दिया है। आमतौर पर हिंदू धर्म और भारतीय समाज में तेरहवीं और बरसी जैसे संस्कार किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके परिजनों द्वारा अत्यंत शोकपूर्ण वातावरण में संपन्न किए जाते हैं। लेकिन अत्रबेदिया गांव के निवासी रामलोटन कुशवाहा ने इस परंपरा को एक बिल्कुल नया और अजीबोगरीब मोड़ दे दिया है। रामलोटन ने निर्णय लिया है कि वे जीवित रहते हुए ही अपनी तेरहवीं और बरसी का आयोजन करेंगे। इस फैसले के पीछे की मंशा और इसे अमली जामा पहनाने की उनकी तैयारी ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में ही ऐसे संस्कारों की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। रामलोटन कुशवाहा ने इस आयोजन को पूरी तरह से औपचारिक रूप देने के लिए बकायदा निमंत्रण कार्ड छपवाए हैं। ये कार्ड दिखने में बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे किसी की मृत्यु के बाद शोक संदेश और उठावनी के लिए वितरित किए जाते हैं। इन कार्डों पर शोक संदेश की भाषा का उपयोग किया गया है, लेकिन इसमें नाम खुद रामलोटन का ही दर्ज है। उन्होंने 13 मई की तारीख को इस विशेष कार्यक्रम के लिए चुना है। कार्ड के माध्यम से उन्होंने अपने सभी सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों और ग्रामीणों को सादर आमंत्रित किया है। कार्ड पर कार्यक्रम की रूपरेखा विस्तार से दी गई है, जिसमें तेरहवीं के भोज और अन्य धार्मिक विधियों का जिक्र है। जैसे ही ये कार्ड लोगों के घरों तक पहुंचना शुरू हुए, गांव में हलचल मच गई और हर कोई इस अनोखे निमंत्रण को देखकर स्तब्ध रह गया।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे रामलोटन का तर्क काफी व्यक्तिगत और भावुक है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद कोई नहीं जानता कि उसके पीछे परिजन रीति-रिवाजों को सही ढंग से निभाएंगे या नहीं, या फिर मृत्यु भोज का आयोजन होगा भी या नहीं। रामलोटन का कहना है कि वे अपनी आंखों से अपने जीवन के अंतिम संस्कारों का उत्सव देखना चाहते हैं और यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके जाने से पहले वे उन सभी लोगों को भोजन करा सकें जिनसे उनका लगाव रहा है। उन्होंने अपनी जमा पूंजी का एक बड़ा हिस्सा इस आयोजन के लिए सुरक्षित रखा है। उनका मानना है कि खुद के द्वारा किए गए दान-पुण्य और भोज का संतोष उन्हें जीते जी मिल जाएगा, जिससे उन्हें अपनी मृत्यु के बाद की चिंताओं से मुक्ति मिल जाएगी। भारतीय समाज में मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों को लेकर कई मान्यताएं हैं, लेकिन रामलोटन का यह कदम 'मोक्ष' और 'संतुष्टि' की एक नई परिभाषा पेश कर रहा है। वे इसे शोक की जगह एक जिम्मेदारी की पूर्ति के रूप में देख रहे हैं। गांव में इस आयोजन को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां कुछ लोग इसे रामलोटन की सनक बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे उनके अकेलेपन या भविष्य की अनिश्चितता से जोड़कर देख रहे हैं। रामलोटन ने अपने घर पर हलवाई और टेंट की व्यवस्था पहले ही सुनिश्चित कर ली है। वे खुद बाजार जाकर राशन और अन्य जरूरी सामानों की खरीदारी कर रहे हैं। उनके चेहरे पर किसी प्रकार का दुख या भय नहीं है, बल्कि वे एक मेजबान की तरह अपने ही 'मृत्यु भोज' की तैयारियों में व्यस्त हैं। गांव की गलियों में आजकल केवल इसी बात की चर्चा है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी ही मौत के बाद किए जाने वाले कर्मकांडों का आनंद जीवित रहते हुए लेने जा रहा है।

रामलोटन के परिवार की स्थिति और उनके इस फैसले के बीच के तालमेल को समझना भी जरूरी है। बताया जा रहा है कि वे काफी समय से इस विचार पर मंथन कर रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि आज के समय में संतानों और रिश्तेदारों पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है कि वे पुरानी परंपराओं का निर्वहन उसी श्रद्धा से करेंगे जैसा वे चाहते हैं। इसलिए, किसी भी प्रकार की कमी या उपेक्षा से बचने के लिए उन्होंने स्वयं ही कमान संभालने का निर्णय लिया। उनके इस कदम ने सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक ढांचे पर भी अनकहे सवाल खड़े कर दिए हैं। 13 मई को होने वाले इस कार्यक्रम के लिए गांव के अलावा दूर-दराज के गांवों में रहने वाले उनके परिचितों को भी बुलावा भेजा गया है। तैयारियों के क्रम में रामलोटन ने ब्राह्मणों और पुरोहितों से भी संपर्क किया है ताकि विधिवत तरीके से पूजा-पाठ और संस्कारों को पूरा किया जा सके। धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह चर्चा का विषय है कि क्या जीवित रहते हुए ऐसे संस्कार शास्त्र सम्मत हैं। हालांकि, रामलोटन इन सब दलीलों से परे अपनी इच्छाशक्ति पर अडिग हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन है और वे इसे किसी भी हाल में यादगार बनाना चाहते हैं। उनके इस निमंत्रण कार्ड में बरसी का भी उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि वे भविष्य के उन सभी अनुष्ठानों को एक ही बार में संपन्न कर लेना चाहते हैं जो सामान्यतः वर्षों तक चलते हैं।

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