'सबका साथ, सबका विकास' वाली सरकार ने चटाया 'असमानता' का चूरन, UGC भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन? 

ये नियम पुराने 2012 के फ्रेमवर्क की जगह लेते हैं और उच्च शिक्षा संस्थानों में शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्व

Jan 29, 2026 - 00:19
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'सबका साथ, सबका विकास' वाली सरकार ने चटाया 'असमानता' का चूरन, UGC भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन? 
'सबका साथ, सबका विकास' वाली सरकार ने चटाया 'असमानता' का चूरन, UGC भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन? 
  • UGC के 2026 नियमों ने सामान्य वर्ग के छात्रों में भय और असमानता की स्थिति पैदा की, अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन का आरोप
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जारी UGC इक्विटी रेगुलेशन्स 2026 अब सवर्ण विरोधी नियम बनकर उभरे, छात्रों का भविष्य खतरे में
  • UGC के नए भेदभाव विरोधी नियमों के खिलाफ इस्तीफों की बाढ़, सामान्य वर्ग में 'एकतरफा सजा' का दावा

UGC का ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन है, ये ऐसा नियम है जो कानून की तरह लागू होता है लेकिन यह नियम पूर्ण रूप से सवर्ण विरोधी नियम है, यह नियम सवर्णों को 'डिफ़ॉल्ट अपराधी' की तरह दिखाता है और निष्पक्षता के विरोध में है। सामान्य वर्ग के छात्र छात्राओ में डर की स्थिति बनी हुई है। समानता का नारा थोप रही सरकार द्वारा ये कैसा कानून लाया गया है जो देश के भविष्य बनने वाले छात्रों में ही आपसी असमानता वाली स्थिति को बुनियादी तरह से मजबूती देता है। झूठी शिकायत से सवर्ण छात्रों सहित कालेजों का भविष्य अधर में धकेल दिया है। 'सबका साथ, सबका विकास' का स्लोगन देने वाली सरकार ने UGC कानून लाकर 'सवर्णों का सर्वविनाश' वाली स्थिति पैदा कर दी है।

हम अपने बच्चों में शुरुआत से ही असमानता और जातिवादी सोंच से दूर हटकर संस्कार भरते हैं ताकि आगे चलकर वे 'सर्वधर्म समान' को अपने चरित्र और व्यवहार से परिभाषित करें। सरकार तरह तरह की योजनाओं से अभी तक 'जातिवादी' और 'भेदभाव' जैसी अराजकता फैलाने वाले कुनबे पर कानूनी हंटर चलाती थी लेकिन आखिर अब ऐसा क्या हो गया कि सरकार UGC कानून लेकर खुद ही इंसान को इंसान से बच्चों को बच्चों से और समाज को समाज से तोड़ने का काम करने पर आमादा है। अभी तक हर चीज में राजनीति चलती थी लेकिन क्या अब देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्रों के शिक्षा के मंदिरों में भी यह गंदी राजनीति का जगह घोला जाएगा।

बड़ी विडंबना है कि एक तरफ सरकार विभिन्न माध्यमों से 'समानता का चूरन' सभी को खिलाती है और अब इस कानून के हवाले से खुद ही समाज को तोड़ रही है। यह कानून सवर्ण छात्रों को निर्दोष होते हुए भी सजा देने का अधिकार देता है। ऐसे में यदि किसी सवर्ण छात्र ने दूसरी जाति के छात्र से मजाक ही किया और यह मजाक दूसरी जाति के छात्र को खराब लगा तो इस UGC कानून के दायरे में शिकायत होने से सवर्ण छात्र का पूरा जीवन नरक हो जाएगा। UGC के माध्यम से एक ही छत के नीचे पढ़ रहे छात्रों के बीच ऐसी स्थिति उत्पन्न करने का दुस्साहस किया जा रहा है। जिससे उनकी प्रतिभा और मेहनत को पल भर में जलकर राख कर दिया जाएगा।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने जनवरी 2026 में "प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन्स, 2026" नामक नए नियम अधिसूचित किए। ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाए गए हैं। नियमों का मुख्य फोकस जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करना है, जो विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के खिलाफ होता है। इन नियमों को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया।

ये नियम पुराने 2012 के फ्रेमवर्क की जगह लेते हैं और उच्च शिक्षा संस्थानों में शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC) और इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है। इक्विटी कमेटी में कम से कम पांच सदस्य आरक्षित वर्गों से होने चाहिए, जिसमें OBC, दिव्यांगजन, SC, ST और महिलाएं शामिल हैं। शिकायतों की जांच 30 दिनों के भीतर पूरी करने और उल्लंघन पर सख्त दंड देने का प्रावधान है।

नियमों में जाति आधारित भेदभाव को "केवल जाति या जनजाति के आधार पर SC/ST/OBC सदस्यों के खिलाफ भेदभाव" के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें धार्मिक, लिंग, जन्म स्थान आदि आधारों पर भेदभाव भी शामिल हैं, लेकिन जाति संबंधी परिभाषा मुख्य रूप से आरक्षित वर्गों पर केंद्रित है। नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा में समावेशिता और समानता को सुनिश्चित करना बताया गया है।

नियमों की प्रमुख विशेषताएं और प्रावधान

नियमों के अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों को जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाने, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने होंगे। इक्विटी कमेटी और EOC की भूमिका शिकायतों की जांच, सिफारिशें और संस्थान स्तर पर समानता नीतियों को लागू करना है। शिकायत मिलने पर जांच अनिवार्य है और दोषी पाए जाने पर निलंबन, जुर्माना या अन्य दंड हो सकते हैं।

नियम सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होते हैं। इनमें आरक्षित वर्गों के छात्रों और कर्मचारियों के खिलाफ होने वाले भेदभाव पर विशेष ध्यान है। नियमों में झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान नहीं बताया गया है, जिससे सामान्य वर्ग में चिंता बढ़ी है।

संवैधानिक उल्लंघन के आरोप और कानूनी चुनौतियां

नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये नियम अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15(1) (जाति आदि आधार पर भेदभाव निषेध) का उल्लंघन करते हैं। दावा किया गया है कि परिभाषा "एक्सक्लूसिव" है और सामान्य वर्ग के सदस्यों को भेदभाव से सुरक्षा नहीं मिलती। याचिकाओं में कहा गया है कि नियम सामान्य वर्ग को डिफॉल्ट रूप से दोषी मानते हैं और एकतरफा तंत्र बनाते हैं।

कुछ याचिकाओं में अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का भी उल्लंघन बताया गया है। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि भेदभाव की परिभाषा "जाति-न्यूट्रल" हो, यानी सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा हो। सुप्रीम कोर्ट ने पहले सितंबर 2025 में UGC को रैगिंग और जाति भेदभाव पर सख्त नियम बनाने का निर्देश दिया था, जिसके आधार पर ये नियम आए।

सामान्य वर्ग में फैला भय और विरोध

नियमों के लागू होने के बाद सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों में भय की स्थिति बनी है। दावा किया जा रहा है कि नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को निर्दोष होने पर भी सजा का सामना करने के लिए मजबूर करते हैं। उदाहरण के रूप में कहा गया है कि यदि कोई सामान्य वर्ग का छात्र मजाक करता है और दूसरी जाति का छात्र इसे अपमानजनक मान लेता है, तो शिकायत पर पूरा करियर प्रभावित हो सकता है।

विरोधियों का कहना है कि नियम झूठी शिकायतों से सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य को खतरे में डालते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच असमानता बढ़ने का आरोप है। "सबका साथ, सबका विकास" जैसे नारे देने वाली सरकार पर आरोप है कि ये नियम विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं।

UGC नियमों के विरोध में इस्तीफे और बयान

नियमों के खिलाफ उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और दिल्ली सहित कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए। उत्तर प्रदेश में कई भाजपा नेता और पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। इनमें स्थानीय स्तर के भाजपा कार्यकर्ता, पदाधिकारी और एक शहर मजिस्ट्रेट शामिल थे। इस्तीफा देने वालों ने नियमों को एकतरफा और सामान्य वर्ग के खिलाफ बताया।

उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन के दौरान कई भाजपा नेता इस्तीफे की घोषणा की। इस्तीफा देने वालों ने कहा कि नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और झूठी शिकायतों से छात्रों का जीवन बर्बाद कर सकते हैं। कुछ नेताओं ने मांग की कि नियमों में संशोधन कर सामान्य वर्ग को भी सुरक्षा दी जाए।

विरोध में छात्र संगठनों ने कहा कि नियम उच्च शिक्षा को राजनीतिकरण कर रहे हैं। छात्रों ने दावा किया कि एक ही छत के नीचे पढ़ने वाले छात्रों के बीच जातिवादी सोच को मजबूती मिल रही है। विरोध प्रदर्शन में नियमों को वापस लेने की मांग की गई।

नियमों का उद्देश्य और सरकारी पक्ष

UGC ने नियमों को उच्च शिक्षा में समावेशिता बढ़ाने का माध्यम बताया है। नियम SC/ST/OBC छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकने पर केंद्रित हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि नियमों में किसी भेदभाव का इरादा नहीं है और ये समानता सुनिश्चित करते हैं।

नियमों में जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण और निगरानी तंत्र शामिल हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों को वार्षिक रिपोर्ट देने और अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश है। नियमों का उद्देश्य जाति आधारित भेदभाव को शून्य सहिष्णुता स्तर पर लाना है।

विरोध के प्रमुख बिंदु

विरोधियों का मुख्य आरोप है कि नियम सामान्य वर्ग को अपराधी मानते हैं। झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई प्रावधान न होने से दुरुपयोग का खतरा बताया गया है। छात्रों के बीच डर की स्थिति बनी है, जिससे शिक्षा का माहौल प्रभावित हो रहा है।

नियमों को असमानता बढ़ाने वाला बताया गया है। विरोध में कहा गया कि सरकार समानता का नारा देती है लेकिन नियम विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं। उच्च शिक्षा को राजनीति से दूर रखने की मांग उठी है।

नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। याचिकाओं पर फैसला नियमों के भविष्य तय करेगा। विरोध प्रदर्शन और इस्तीफे जारी हैं। उच्च शिक्षा में समानता और निष्पक्षता पर बहस तेज है।

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