देवबंद न्यूज़: मौलाना दीन के ठेकेदार नहीं हैं:- क़ारी गोरा
देवबंद: प्रसिद्ध आलिम-दीन मौलाना क़ारी इसहाक गोरा बताते हैं कि “एक दौर था जब इस्लाम की तालीमात को आम इंसान तक पहुँचाने के लिए अल्लाह ने नबियों को भेजा।यह सिलसिला नबियों के आख़री पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ख़त्म हुआ। उनके बाद ये ज़िम्मेदारी उलेमा और मौलाना के कंधों पर आ गई कि वे दीन की हिफ़ाज़त करें और इसे आम अवाम तक सही तरीक़े से पहुँचाएँ।
मगर अफ़सोस, वक़्त के साथ मौलाना को महज़ “दीन के ठेकेदार” की निगाह से देखा जाने लगा। यह ग़लतफ़हमी हमारे समाज की एक बड़ी बदनसीबी है।मौलाना क़ारी इसहाक गोरा कहते हैं “एक मौलाना का काम धर्म की बागडोर अपने हाथ में लेकर समाज को सही दिशा दिखाना है।इस भूमिका में वे ठेकेदार नहीं बल्कि चौकीदार के समान होते हैं। ठेकेदार का कार्य किसी वस्तु या सेवा को अपने हिसाब से संचालित करना है,जबकि चौकीदार का कार्य उसकी रक्षा और देखरेख करना होता है।
इसी प्रकार, मौलाना का उद्देश्य धर्म को अपने लाभ के लिए संचालित करना नहीं,बल्कि उसकी रक्षा और सही मार्गदर्शन देना है।क़ुरआन और हदीस के माध्यम से मौलाना समाज को सिखाते हैं कि कैसे सही रास्ते पर चला जाए, लेकिन वे इस पर अपने स्वार्थ को थोपते नहीं। वे एक मार्गदर्शक की भूमिका में होते हैं जो धर्म के असल मानी को समझते और समाज को समझाते हैं।उनका कर्तव्य समाज की धर्मिक भलाई है, ना कि धर्म को एक व्यवसायिक ठेके की तरह संभालना।
चौकीदार का कार्य होता है जागरूक रहकर सुरक्षित रखना,ठीक उसी तरह मौलाना धर्म की रक्षा और उसके सिद्धांतों की हिफाजत करते हैं। वे समाज को यह भी बताते हैं कि धार्मिक आस्थाओं को किस तरह अपनाया जाए ताकि वे समाज के लाभ के लिए हों,न कि हानि के।वे धर्म को अपने फायदे के लिए मोड़ने की बजाय,उसके वास्तविक मानी को बचाकर रखते हैं।इसलिए,मौलाना से नफ़रत करने वाले वे लोग होते हैं जो धर्म के सही मायने को नहीं समझते, या जिनकी मंशा धर्म का गलत उपयोग करना होता है।
जैसे डाकू चौकीदार से नफ़रत करते हैं क्योंकि वह उनकी चोरी के रास्ते में आता है, वैसे ही वे लोग जो धर्म का दुरुपयोग करना चाहते हैं, मौलाना के प्रति विरोध रखते हैं क्योंकि मौलाना धर्म की सही दिशा में मार्गदर्शन करते हैं।मौलाना का मक़सद लोगों को उनके धार्मिक कर्तव्यों का सही ज्ञान देना और उन्हें नेक राह पर चलने के लिए प्रेरित करना होता है। वे अपने धर्म का ‘ठेका’ नहीं लेते,बल्कि उसकी ‘चौकीदारी’ करते हैं, जिससे समाज धर्म की सच्चाई से भटकने ना पाए।
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