निहत्थे अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसाकर मारा,  अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ, मंचन देख भावुक हुए लोग

सभी योद्धाओं ने अभिमन्यु पर वार पर वार किए जिससे अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ। जब अभिमन्यु मारा गया तब वह महाभारत काल का एक महान योद्धा था जिसकी उम्र मात्र 16 साल थी।

By INA News Desk
Oct 2, 2024 - 21:39
40 Views
निहत्थे अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसाकर मारा,  अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ, मंचन देख भावुक हुए लोग

Shahabad- Hardoi News INA.

वीर अभिमन्यु नाटक देखकर पांडव पक्ष के कलाकारों सहित दर्शकगणों में खासकर महिलाओं और भावुक व्यक्तियों की आँखें भर आईं। श्री रामलीला मेला समिति मोहल्ला पठकाना के रंग मंच पर कुशल कलाकारों ने वीर अभिमन्यु नाटक का सफल मंचन किया। जिसे देख दर्शकों की आंखें नम हो गई। सजल नेत्रों से महाभारत काल की कलाकारी दिखा रहे कलाकारों में पांडव पक्ष के सभी पात्रगण सजल नेत्रों से नाटक का सफल मंचन कर रहे थे। युद्ध के नियम के तहत निहत्‍थे पर वार करना गलत था लेकिन निहत्थे अभिमन्यु पर जोरदार प्रहार किया गया।

इसके बाद एक के बाद एक सभी योद्धाओं ने अभिमन्यु पर वार पर वार किए जिससे अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ। जब अभिमन्यु मारा गया तब वह महाभारत काल का एक महान योद्धा था जिसकी उम्र मात्र 16 साल थी। इस उम्र में अपने पराक्रम से कौरवों की सेना के उसने छक्के छुड़ा दिए थे। उसके जन्म से पहले तय था कि वो 16 साल की उम्र में मर जाएगा। खास यह कि कृष्ण ने अभिमन्यु की रक्षा नहीं की और अभिमन्यु की हत्या में कृष्ण की कहीं न कहीं शिथिलता रही। आखिर एक साजिश के तहत ऐसे महज 16 साल के योद्धा अभिमन्यु का बध सारे नियम तोड़कर कर दिया गया।

जिसने अपने जन्म लेने से पहले ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने का ज्ञान तो प्राप्त कर लिया था लेकिन बाहर निकलने का मार्ग जानने से पहले अभिमन्यु को अपनी माँ के गर्भ में नींद इसलिए आ गई क्योंकि उसकी माँ सुभद्रा को नींद आ गई थी। हालांकि अभिमन्यु नींद आने से पहले चक्रव्यूह का भेदन सीख चुका था इसलिए उसने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए, लेकिन सातवें चरण में उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया और उस पर टूट पड़े। जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर जोरदार प्रहार किया। वह वार इतना तीव्र था कि अभिमन्यु उसे सहन नहीं कर सका और वीरगति को प्राप्त हो गया। अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठे। अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा। जयद्रथ भयभीत होकर दुर्योधन के पास पहुँचा और अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में बताया। दुर्य़ोधन उसका भय दूर करते हुए बोला कि चिंता मत करो, मित्र, मैं और सारी कौरव सेना तुम्हारी रक्षा करेगी । अर्जुन कल तुम तक नहीं पहुँच पाएगा। उसे आत्मदाह करना पड़ेगा। अगले दिन युद्ध शुरू हुआ। अर्जुन की आँखें जयद्रथ को ढूँढ रही थीं, किंतु वह कहीं नहीं मिला। दिन बीतने लगा। धीरे-धीरे अर्जुन की निराशा बढ़ती गई। यह देख श्रीकृष्ण बोले, पार्थ, समय बीत रहा है और कौरव सेना ने जयद्रथ को रक्षा कवच में घेर रखा है। अतः तुम शीघ्रता से कौरव सेना का संहार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो।

यह सुनकर अर्जुन का उत्साह बढ़ा और वह जोश से लड़ने लगे। लेकिन जयद्रथ तक पहुँचना मुश्किल था। संध्या होने वाली थी। तब श्रीकृष्ण ने अपनी माया फैला दी। इसके फलस्वरूप सूर्य बादलों में छिप गया और संध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया। संध्या हो गई है और अब अर्जुन को प्रतिज्ञावश आत्मदाह करना होगा।’-यह सोचकर जयद्रथ और दुर्योधन खुशी से उछल पड़े। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा। जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले- पार्थ तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है।” यह कहकर उन्होंने अपनी माया समेट ली। देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। सबकी दृष्टि आसमान की ओर उठ गई। सूर्य अभी भी चमक रहा था। यह देख जयद्रथ और दुर्योधन के पैरों तले जमीन खिसक गई। जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था। तभी श्रीकृष्ण चेतावनी देते हुए बोले हे अर्जुन जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक जमीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएँगे। हे पार्थ! उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।


अर्जुन ने श्रीकृष्ण की चेतावनी ध्यान से सुनी और अपनी लक्ष्य की ओर ध्यान कर बाण छोड़ दिया। उस बाण ने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे लेकर सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर गिर गया। सिर के जमीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई। स्थानीय एवं शाजहांपुर से पधारे कुशल कलाकारों में अनमोल पांडे ने कृष्ण की भूमिका निभाई और इसी प्रकार महेश चंद्र मिश्रा ने युधिष्ठिर, रामजी गुप्ता ने भीम, प्रखर मिश्रा ने सहदेव, दीपांशु शुक्ला ने नकुल, कलश मिश्रा ने अभिमन्यु, देवांश शुक्ला ने परीक्षित, पंकज मिश्रा मानू ने दुर्योधन, अरुण श्रीवास्तव ने दुशासन, अनूप मिश्रा ने शकुनी, दिनेश शुक्ला ने कर्ण, ध्रुव शुक्ला ने शल्य, विकास मिश्रा ने अश्वत्थामा, ललित मोहन मिश्रा ने द्रोणाचार्य, पारस गुप्ता ने दारूक, अभय खत्री ने राजाबहादुर, , लालूराम ने खटपट सिंह, विवेक शुक्ला ने भोले शंकर, प्रियंका रंजन ने सुभद्रा व योग माया और सृष्टि राठौर ने उत्तरा की भूमिका निभाकर नयनाभिराम कलाकारी का कौशल दिखाया। इस नाटक ने दर्शकगणों को यह सिखाया कि अधूरी विद्या अर्थात अधूरा ज्ञान व्यक्ति के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण स्वाभिमानी परिजनों के लिए घातक हो सकता है, इसलिए जब तक व्यक्ति को जिस कार्य का पूर्ण ज्ञान न हो, वह अति उत्साह में नहीं करना चाहिए आखिर तब तक जब तक कि कुशल मार्गदर्शन न मिल जाए भले बात स्वाभिमान की क्यों न आ जाए लेकिन अभिमन्यु की तरह परिस्थितियों को खूब जाने समझे बिना शत्रु के चक्रव्यूह में कदापि नहीं फंसना चाहिए।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow