देवरिया में ईंधन संकट का खौफ: टेंट हाउस के बर्तनों में भरा जा रहा पेट्रोल और डीजल, सुरक्षा मानकों की सरेआम उड़ी धज्जियां।
देवरिया जनपद के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में पिछले कुछ दिनों से एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया और स्थानीय
- जुगाड़ या जानलेवा लापरवाही? शादियों वाले बर्तनों में ईंधन स्टोरेज की वायरल तस्वीर ने प्रशासन की बढ़ाई चिंता
- परिवहन हड़ताल की आहट से सहमे लोग: देवरिया के ग्रामीण इलाकों में टेंट के बड़े बर्तनों का पेट्रोल-डीजल भंडारण के लिए हो रहा इस्तेमाल
देवरिया जनपद के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में पिछले कुछ दिनों से एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर प्रसारित हो रही खबरों ने लोगों के मन में यह डर बैठा दिया है कि आने वाले समय में पेट्रोल पंपों पर तेल की भारी किल्लत होने वाली है। इस डर का नतीजा यह हुआ कि लोग अपने घरों के पास स्थित टेंट हाउसों से बड़े-बड़े पतीले, भगौने और ड्रम मांगकर पेट्रोल पंपों पर पहुंचने लगे हैं। जो बर्तन कभी शुभ अवसरों पर भोजन परोसने के काम आते थे, उनमें अब ज्वलनशील पदार्थ भरकर ले जाया जा रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासन के दावों को चुनौती दे रही है, बल्कि एक बड़े हादसे को भी निमंत्रण दे रही है क्योंकि ये बर्तन किसी भी प्रकार से पेट्रोलियम पदार्थों को रखने के लिए सुरक्षित नहीं माने जाते।
ईंधन के इस तरह के असुरक्षित भंडारण के पीछे मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए हिट-एंड-रन कानून और उसके विरोध में ट्रक ड्राइवरों द्वारा दी गई चक्का जाम की चेतावनी को माना जा रहा है। देवरिया के लोगों को डर है कि यदि ट्रकों और टैंकरों के पहिए थम गए, तो जिले की पूरी रसद व्यवस्था ठप हो जाएगी। इसी अनिश्चितता के कारण खेती-किसानी से जुड़े लोग और छोटे व्यवसायी सबसे ज्यादा परेशान हैं। किसानों को डर है कि यदि डीजल नहीं मिला तो उनकी फसलों की सिंचाई और कटाई का काम रुक जाएगा, जबकि दोपहिया वाहन चालकों को अपने दैनिक कार्यों के बाधित होने का भय सता रहा है। इसी मानसिक दबाव के चलते लोग अपनी क्षमता से अधिक तेल जमा करने की होड़ में लगे हुए हैं, जिससे पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। पेट्रोल पंप संचालकों के लिए भी यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। सरकारी नियमों के मुताबिक खुले बर्तनों या प्लास्टिक की बोतलों में पेट्रोल देना सख्त मना है, लेकिन भारी भीड़ और लोगों के उग्र व्यवहार के आगे कई बार पंप कर्मचारी बेबस नजर आते हैं। देवरिया के कई पंपों पर तो स्थिति इतनी भयावह हो गई कि पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी। टेंट के बर्तनों में तेल भरने की प्रक्रिया के दौरान थोड़ी सी भी चिंगारी एक भयावह अग्निकांड का रूप ले सकती है। चूंकि ये बर्तन एल्यूमीनियम या स्टील के होते हैं और इनमें ढक्कन की सीलबंद व्यवस्था नहीं होती, इसलिए इनसे पेट्रोल के वाष्प (vapours) का रिसाव होता रहता है, जो हवा के संपर्क में आकर किसी भी समय आग पकड़ सकता है।
स्थानीय प्रशासन और जिला पूर्ति अधिकारी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि जिले में ईंधन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और पैनिक होने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में अफवाहों का बाजार गर्म है। प्रशासन ने पेट्रोल पंप मालिकों को सख्त हिदायत दी है कि वे केवल वाहनों की टंकियों में ही तेल भरें और किसी भी तरह के खुले बर्तन, ड्रम या टेंट के सामान में तेल न दें। पुलिस को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे उन लोगों पर नजर रखें जो भारी मात्रा में तेल का भंडारण कर रहे हैं, क्योंकि घर में बड़ी मात्रा में पेट्रोल या डीजल रखना न केवल अवैध है, बल्कि यह पड़ोस के लिए भी एक बड़ा सुरक्षा जोखिम पैदा करता है। भारत के विस्फोटक अधिनियम के तहत पेट्रोलियम पदार्थों का भंडारण एक विशेष लाइसेंस के बिना करना दंडनीय अपराध है। टेंट के बर्तनों में पेट्रोल ले जाना इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि सड़क पर चलते समय छलकने वाला तेल वाहन के गर्म साइलेंसर के संपर्क में आकर तुरंत धमाका कर सकता है। इसके अलावा, रिहायशी इलाकों में रखे गए ये खुले बर्तन बम की तरह काम कर सकते हैं।
इस पूरी घटना ने जन जागरूकता की कमी को भी साफ तौर पर दर्शाया है। लोगों का तर्क है कि वे अपने भविष्य की जरूरतों को सुरक्षित कर रहे हैं, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि जिस ईंधन को वे 'जुगाड़' के जरिए जमा कर रहे हैं, वह उनकी जान का दुश्मन बन सकता है। देवरिया के कुछ गांवों में तो लोग बड़े-बड़े पीपों को ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादकर तेल लेने पहुंच रहे हैं। यह स्थिति केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी जनपदों में भी इसी तरह की प्रवृत्तियों के संकेत मिल रहे हैं। जानकारों का मानना है कि जब तक सरकार और ट्रांसपोर्ट यूनियनों के बीच स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक लोगों का यह मनोवैज्ञानिक डर खत्म होना मुश्किल है। परिवहन व्यवस्था में किसी भी संभावित व्यवधान की खबर सुनते ही इस तरह की भगदड़ मचना भारतीय समाज के उस हिस्से की हकीकत बयां करती है जो सूचनाओं की सत्यता को परखे बिना प्रतिक्रिया देता है। देवरिया की इन तस्वीरों ने यह भी बताया है कि आपदा की स्थिति में किस तरह 'जुगाड़' तकनीक का गलत इस्तेमाल हो सकता है। टेंट के बर्तनों का इस काम में उपयोग होना एक नया ट्रेंड है, जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया। समाज शास्त्रियों का कहना है कि यह 'सर्वाइवल मोड' की एक पराकाष्ठा है जहां व्यक्ति कानून और सुरक्षा को पीछे छोड़कर केवल अपनी तात्कालिक जरूरत को प्राथमिकता देता है।
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