HC: पत्नी के साथ सहमति से Oral और Anal सेक्स अपराध नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने मुकदमा रद्द किया

हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि पत्नी स्पष्ट रूप से गैर-सहमति का आरोप लगाती है और इसके समर्थन में ठोस सबूत प्रस्तुत करती है, तो मामले की जांच हो सके....

May 24, 2025 - 22:08
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HC: पत्नी के साथ सहमति से Oral और Anal सेक्स अपराध नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने मुकदमा रद्द किया

मुख्य बिंदु

  • आरोप: पत्नी ने पति पर Oral सेक्स का आरोप लगाया, लेकिन गैर-सहमति का स्पष्ट उल्लेख नहीं।
  • निचली अदालत: धारा 377 के तहत मुकदमा आदेशित।
  • HC का फैसला: बयानों में विरोधाभास और सबूतों की कमी के कारण मुकदमा रद्द।
  • धारा 375 की अपवाद 2: वैवाहिक यौन कृत्य बलात्कार नहीं, यदि पत्नी 15 वर्ष से अधिक आयु की हो।
  • धारा 377: केवल गैर-सहमति वाले कृत्यों तक सीमित।
  • नवतेज सिंह जौहर फैसला: सहमति से निजी यौन कृत्य अपराध नहीं।
  • वैवाहिक बलात्कार: अपराध घोषित करने की मांग तेज।
  • सहमति का सवाल: महिलाओं की स्वायत्तता पर चर्चा।
  • धारा 377 का दुरुपयोग: वैवाहिक विवादों में बदले की भावना से उपयोग।

दिल्ली HC ने 13 मई 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत पति को अपनी पत्नी के साथ सहमति से किए गए Oral या Anal सेक्स के लिए अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने इस मामले में कहा कि वैवाहिक संबंधों में "निहित सहमति" (implied consent) मानी जाती है, जिसमें यौन संबंधों के साथ-साथ Oral और Anal सेक्स जैसे कृत्य भी शामिल हैं, बशर्ते सहमति की कमी का स्पष्ट आरोप न हो। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैवाहिक संबंधों, सहमति, और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सामाजिक और नैतिक सवालों को भी उजागर करता है। इस निर्णय ने देशभर में व्यापक चर्चा छेड़ दी है और वैवाहिक बलात्कार (marital rape) को अपराध घोषित करने की मांग को फिर से बल दिया है।

यह था मामला

यह मामला एक दंपति के बीच वैवाहिक विवाद से शुरू हुआ, जिसमें पत्नी ने अपने पति पर धारा 377 के तहत Oral सेक्स का आरोप लगाया था। पत्नी ने दावा किया कि उनकी शादी पूरी नहीं हुई थी, लेकिन हनीमून के दौरान पति ने उनके साथ Oral सेक्स किया। इसके अलावा, पत्नी ने अपने ससुर पर बलात्कार और ससुराल वालों पर शारीरिक उत्पीड़न के आरोप भी लगाए। निचली अदालत ने पति के खिलाफ धारा 377 के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया, जबकि अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। पति ने इस आदेश को दिल्ली HC में चुनौती दी, जिसके बाद HC ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया।

HC ने पाया कि पत्नी के बयानों में सहमति की कमी का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसके अतिरिक्त, पत्नी के बयानों में विरोधाभास था उन्होंने एक ओर पति की यौन अक्षमता का दावा किया और दूसरी ओर Oral सेक्स का आरोप लगाया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत में धारा 377 के तहत अपराध साबित करने के लिए प्रथम दृष्टया सबूतों की कमी थी। इस आधार पर, कोर्ट ने पति के खिलाफ धारा 377 के तहत मुकदमा रद्द कर दिया।

दिल्ली HC की टिप्पणी

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने फैसले में कहा, "वैवाहिक संबंधों में, धारा 375 की अपवाद 2 के तहत यह माना जाता है कि पति को यौन संबंधों और यौन कृत्यों, जिसमें Oral और Anal सेक्स शामिल हैं, के लिए पत्नी की निहित सहमति प्राप्त है।" कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि धारा 377, जो "प्रकृति के विरुद्ध यौन अपराधों" को दंडित करती है, का उपयोग वैवाहिक संबंधों में गैर-पेनाइल-वजाइनल यौन कृत्यों को अपराध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि गैर-सहमति का स्पष्ट आरोप न हो।

कोर्ट ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार फैसले का हवाला दिया, जिसमें वयस्कों के बीच सहमति से किए गए निजी यौन कृत्यों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया था। इस फैसले ने धारा 377 को केवल गैर-सहमति वाले कृत्यों, नाबालिगों के साथ यौन कृत्यों, या पशुओं के साथ यौन कृत्यों तक सीमित कर दिया। HC ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में धारा 375 की अपवाद 2 के तहत पति को बलात्कार के आरोप से छूट प्राप्त है, और यही सिद्धांत धारा 377 पर भी लागू होता है।

कानूनी ढांचा और वैवाहिक बलात्कार

भारत में वैवाहिक बलात्कार को अभी तक अपराध के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। IPC की धारा 375 की अपवाद 2 स्पष्ट रूप से कहती है कि 15 वर्ष से अधिक आयु की पत्नी के साथ पति द्वारा किए गए यौन कृत्य, भले ही वे बिना सहमति के हों, बलात्कार नहीं माने जाएंगे। 2013 में धारा 375 में संशोधन के बाद, बलात्कार की परिभाषा में गैर-पेनाइल-वजाइनल कृत्यों जैसे Oral और Anal सेक्स को शामिल किया गया, लेकिन वैवाहिक अपवाद को बरकरार रखा गया। दिल्ली HC ने इसी आधार पर कहा कि धारा 375 के तहत दी गई छूट धारा 377 पर भी लागू होती है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि पत्नी स्पष्ट रूप से गैर-सहमति का आरोप लगाती है और इसके समर्थन में ठोस सबूत प्रस्तुत करती है, तो मामले की जांच हो सकती है। इस मामले में, पत्नी के बयानों में गैर-सहमति का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं होने के कारण कोर्ट ने पति को राहत दी।

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इस फैसले ने वैवाहिक संबंधों में सहमति और महिलाओं के अधिकारों पर एक गहन बहस छेड़ दी है। कई सामाजिक कार्यकर्ता और महिला अधिकार संगठन वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि "निहित सहमति" का सिद्धांत महिलाओं की शारीरिक और मानसिक स्वायत्तता का उल्लंघन करता है। सोशल मीडिया पर भी इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक यूजर ने लिखा, “वैवाहिक बलात्कार को अपराध क्यों नहीं माना जाता? यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को कमजोर करता है।” वहीं, कुछ लोगों ने इसे मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत सही ठहराया, क्योंकि धारा 375 में वैवाहिक अपवाद स्पष्ट है।

इसके अलावा, यह फैसला धारा 377 के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है। अतीत में, वैवाहिक विवादों में धारा 377 का उपयोग बदले की भावना से किया गया है। HC ने इस बात पर जोर दिया कि बिना ठोस सबूतों और गैर-सहमति के स्पष्ट आरोप के, इस धारा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

अन्य राज्यों में समान फैसले

दिल्ली HC का यह फैसला अकेला नहीं है। मध्य प्रदेश HC ने मई 2024 में एक समान मामले में कहा था कि पत्नी के साथ गैर-सहमति से किए गए Oral या Anal सेक्स को बलात्कार नहीं माना जा सकता। इसी तरह, छत्तीसगढ़ HC ने फरवरी 2025 में एक मामले में पति को धारा 377 के तहत दोषमुक्त किया था। ये फैसले वैवाहिक बलात्कार और धारा 377 के बीच कानूनी असंगति को उजागर करते हैं।

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