Politics: महाराष्ट्र में भाषा विवाद, संजय गायकवाड़ ने ठाकरे भाइयों पर साधा निशाना, बोले- 'छत्रपति संभाजी महाराज ने 16 भाषाएं सीखीं'।
महाराष्ट्र में हाल ही में हिंदी और मराठी भाषा को लेकर एक बड़ा विवाद छिड़ा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस ....
Maharashtra: महाराष्ट्र में हाल ही में हिंदी और मराठी भाषा को लेकर एक बड़ा विवाद छिड़ा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस विवाद में एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के विधायक संजय गायकवाड़ ने शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे पर तीखा हमला बोला है। गायकवाड़ ने छत्रपति संभाजी महाराज का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने 16 भाषाएं सीखी थीं, और भाषा के नाम पर राजनीति करना गलत है। वहीं, बीजेपी के मंत्री आशीष शेलार ने हिंदी भाषियों पर हो रहे हमलों की तुलना जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले से की, जिसने इस विवाद को और गंभीर बना दिया।
महाराष्ट्र में यह विवाद तब शुरू हुआ, जब राज्य सरकार ने स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक मराठी और अंग्रेजी के साथ हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा। इस त्रिभाषा नीति का उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने पुरजोर विरोध किया। दोनों नेताओं ने इसे मराठी अस्मिता के खिलाफ बताते हुए सरकार पर हिंदी को "थोपने" का आरोप लगाया। 5 जुलाई 2025 को मुंबई के वर्ली में उद्धव और राज ठाकरे दो दशकों बाद एक मंच पर आए और एक रैली में हिस्सा लिया। इस रैली को सरकार के त्रिभाषा नीति को वापस लेने की जीत के रूप में पेश किया गया, क्योंकि सरकार ने भारी विरोध के बाद इस फैसले को रद्द कर दिया। रैली में उद्धव ठाकरे ने कहा, "महाराष्ट्र में मराठी और अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिंदी को थोपना गलत है।" राज ठाकरे ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "यह त्रिभाषा नीति कहां से आई? यह केंद्र सरकार का फैसला है, जो महाराष्ट्र पर थोपा जा रहा है।" दोनों नेताओं ने मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए एकजुट होने की बात कही।
- संजय गायकवाड़ का तीखा हमला
इस रैली के बाद, एकनाथ शिंदे गुट के बुलढाणा से विधायक संजय गायकवाड़ ने ठाकरे भाइयों की आलोचना की। उन्होंने छत्रपति संभाजी महाराज का उदाहरण देते हुए कहा, "छत्रपति संभाजी महाराज ने 16 भाषाएं सीखी थीं। क्या वे मूर्ख थे? ताराबाई और जीजाबाई भी हिंदी सहित कई भाषाएं जानती थीं। क्या वे गलत थीं? हमें जितनी हो सके उतनी भाषाएं सीखनी चाहिए।" गायकवाड़ ने यह भी कहा कि भाषा के नाम पर राजनीति करना गलत है और अगर आतंकवाद को रोकना है, तो उर्दू जैसी भाषाएं भी सीखनी चाहिए। गायकवाड़ के इस बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया। कुछ लोगों ने उनके इस बयान को छत्रपति संभाजी महाराज के प्रति अपमानजनक माना, क्योंकि उनके शब्दों को गलत संदर्भ में लिया गया। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने लिखा कि गायकवाड़ ने संभाजी महाराज का उदाहरण देकर ठाकरे भाइयों को जवाब देने की कोशिश की, लेकिन उनका लहजा ठीक नहीं था। एक X यूजर ने लिखा, "संजय गायकवाड़ का यह बयान संभाजी महाराज के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला है। उन्हें अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए।"
छत्रपति संभाजी महाराज, मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र, एक विद्वान और बहुभाषी शासक थे। इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने संस्कृत, मराठी, हिंदी, और कई अन्य भाषाओं सहित 16 भाषाएं सीखी थीं। 14 साल की उम्र में उन्होंने संस्कृत में 'बुद्धभूषणम' जैसी रचनाएं लिखीं, जो उनकी विद्वता को दर्शाती हैं। संभाजी महाराज ने 121 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। उनकी वीरता और हिंदवी स्वराज की रक्षा के लिए बलिदान ने उन्हें 'धर्मवीर' की उपाधि दिलाई। गायकवाड़ ने अपने बयान में संभाजी महाराज के बहुभाषी होने का हवाला देकर यह जताने की कोशिश की कि भाषाएं सीखना ज्ञान और समझ का प्रतीक है। उन्होंने कहा, "भाषा सीखना हमें दुनिया में टिकने और समझने में मदद करता है। अगर हम आतंकवाद को समझना चाहते हैं, तो उर्दू भी सीखनी चाहिए।" हालांकि, उनके इस बयान को कुछ लोग ठाकरे भाइयों के खिलाफ तंज के रूप में देख रहे हैं, जिसने विवाद को और हवा दी।
- आशीष शेलार का विवादित बयान
इस बीच, बीजेपी के मंत्री और मुंबई से विधायक आशीष शेलार ने हिंदी भाषियों पर हो रहे हमलों को लेकर एक और विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र में हिंदी भाषियों पर हमले पहलगाम आतंकी हमले जैसे हैं। यह मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी बोलने वालों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।" शेलार का यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, और कई लोगों ने इसे अतिशयोक्ति भरा बताया। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने लिखा कि हिंदी भाषियों पर हमले गलत हैं, लेकिन इसे आतंकी हमले से जोड़ना अनुचित है। एक X यूजर ने लिखा, "आशीष शेलार का बयान अतिशयोक्ति है। हिंदी और मराठी के बीच तनाव को और बढ़ाने की जरूरत नहीं है।" दूसरी ओर, कुछ यूजर्स ने शेलार के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि हिंदी भाषियों के खिलाफ हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
- ठाकरे भाइयों का रुख
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने इस विवाद को मराठी अस्मिता से जोड़ा है। उद्धव ने कहा, "हम हिंदी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन प्राथमिक कक्षाओं में इसे थोपना गलत है। महाराष्ट्र में मराठी और अंग्रेजी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।" राज ठाकरे ने भी कहा कि केंद्र सरकार की नीतियां मराठी भाषा को कमजोर कर रही हैं।
शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "हम हिंदी बोलते हैं, हमारे पास हिंदी फिल्में, नाटक, और संगीत हैं। हमारा विरोध केवल प्राथमिक स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने के खिलाफ है।" उन्होंने यह भी कहा कि यह मराठी अस्मिता की जीत है और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने उन्हें इस जीत के लिए बधाई दी है। यह विवाद महाराष्ट्र की सियासत में एक नया मोड़ ला सकता है। 2025 के अंत में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मराठी अस्मिता का मुद्दा फिर से गरमा गया है। ठाकरे भाइयों का एक मंच पर आना और हिंदी के खिलाफ उनका रुख हिंदी भाषी वोटरों को प्रभावित कर सकता है, जो मुंबई, ठाणे, पुणे, और नागपुर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे कांग्रेस और शिवसेना (UBT) को नुकसान हो सकता है, क्योंकि हिंदी भाषी मतदाता महायुति गठबंधन (बीजेपी, शिंदे गुट, और अजित पवार की NCP) की ओर झुक सकते हैं।
महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी भाषा विवाद ने एक बार फिर सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। संजय गायकवाड़ का छत्रपति संभाजी महाराज का उदाहरण देकर ठाकरे भाइयों पर हमला और आशीष शेलार का हिंदी भाषियों पर हमलों को आतंकी हमले से जोड़ना इस विवाद को और जटिल बना रहा है। यह विवाद न केवल भाषा की लड़ाई है, बल्कि मराठी अस्मिता और राजनीतिक वोटबैंक की जंग भी है। आगामी निकाय चुनावों में यह मुद्दा महायुति और विपक्ष के बीच एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। जहां एक ओर ठाकरे भाई मराठी अस्मिता को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं महायुति गठबंधन इसे हिंदी भाषियों के खिलाफ भेदभाव के रूप में पेश कर रहा है। इस विवाद का अंत कैसे होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन यह साफ है कि भाषा और संस्कृति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति से बचना चाहिए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस विवाद पर सफाई देते हुए कहा, "मराठी अनिवार्य है, हिंदी वैकल्पिक थी। यह नीति उद्धव ठाकरे की सरकार में बनी माशेलकर समिति की सिफारिश पर आधारित थी।" उन्होंने उद्धव पर "पलटूराम" होने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार ने जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए फैसला वापस लिया।
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