Sambhal: न्यायिक तबादलों पर सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क का तीखा सवाल—'यह इत्तेफ़ाक़ नहीं, न्यायपालिका की आज़ादी पर ख़तरा'।
सम्भल से लेकर दिल्ली तक हो रहे न्यायिक तबादलों को लेकर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने अपनी फेसबुक
उवैस दानिश, सम्भल
सम्भल से लेकर दिल्ली तक हो रहे न्यायिक तबादलों को लेकर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने अपनी फेसबुक पोस्ट के ज़रिए इन तबादलों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग जगहों पर एक जैसे हालात में हो रहे तबादले महज़ प्रशासनिक इत्तेफ़ाक़ नहीं लगते, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला परेशान करने वाला सिलसिला है।
सपा सांसद ने संविधान के अनुच्छेद 50 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायपालिका की आज़ादी लोकतंत्र की बुनियाद है। सम्भल हिंसा मामले में जिन पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने जैसे संगीन आरोप लगे थे, उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना संबंधित जज का संवैधानिक अधिकार था, न कि कोई सियासी जुर्म। जियाउर्रहमान बर्क ने कहा कि सम्भल के वकीलों का विरोध सिर्फ़ एक जज के तबादले के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि उस डर के ख़िलाफ़ है, जो ईमानदार और बेख़ौफ़ न्यायाधीशों के मन में बैठाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि न्यायपालिका की आज़ादी केवल जजों का अधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक के बुनियादी हक़ूक़ की हिफ़ाज़त की गारंटी है। सपा सांसद ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर न्यायिक अफ़सर डर के माहौल में काम करेंगे, तो संविधान द्वारा दी गई न्यायिक सुरक्षा बेमानी हो जाएगी। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि इंसाफ़, संविधान और लोकतंत्र की रूह को बचाने की है। अगर आज समाज ख़ामोश रहा, तो कल इंसाफ़ सिर्फ़ किताबों तक सिमट कर रह जाएगा।
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