देश में युवाओं का कर्ज बोझ तेजी से बढ़ रहा है, डिफॉल्ट के मामले चिंताजनक स्तर पर।

भारत में व्यक्तिगत कर्ज और असुरक्षित ऋणों की मात्रा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, जिसमें युवा पीढ़ी विशेष रूप से Gen Z सबसे

Feb 24, 2026 - 15:19
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देश में युवाओं का कर्ज बोझ तेजी से बढ़ रहा है, डिफॉल्ट के मामले चिंताजनक स्तर पर।
  • Gen Z और 25-35 आयु वर्ग के लोग लाइफस्टाइल और बेसिक जरूरतों के लिए बड़े कर्ज ले रहे हैं
  • 30-40 हजार सैलरी पर 30-40 लाख तक के लोन से EMI दबाव और डिफॉल्ट बढ़ रहे हैं

भारत में व्यक्तिगत कर्ज और असुरक्षित ऋणों की मात्रा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, जिसमें युवा पीढ़ी विशेष रूप से Gen Z सबसे आगे नजर आ रही है। क्रेडिट ब्यूरो रिपोर्ट्स के अनुसार, नए क्रेडिट लेने वालों में से लगभग 41 प्रतिशत Gen Z से संबंधित हैं, जो पहली बार क्रेडिट सिस्टम में प्रवेश कर रहे हैं। यह ट्रेंड मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, फिनटेक ऐप्स और आसान लोन अप्रूवल की वजह से तेज हुआ है। युवा 25 से 35 साल की आयु के बीच अपनी मासिक आय से कई गुना अधिक कर्ज उठा रहे हैं, जैसे कि 30-40 हजार रुपये की सैलरी पर 30-40 लाख रुपये तक के पर्सनल लोन या मल्टीपल छोटे-छोटे लोन। यह स्थिति EMI के बोझ को इतना बढ़ा देती है कि कई मामलों में मासिक आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज और किस्तों में चला जाता है, जिससे बचत, निवेश और जरूरी खर्च प्रभावित होते हैं। घरेलू कर्ज GDP के 41.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो पांच साल के औसत से ऊपर है, और इसमें कंजम्पशन-आधारित लोन का हिस्सा 55 प्रतिशत से अधिक है।

इस बढ़ते कर्ज के पीछे कई कारण हैं, जिनमें लाइफस्टाइल खर्च प्रमुख है। 2025 के पहले छह महीनों में पर्सनल लोन का सबसे बड़ा कारण ट्रैवल रहा, जो कुल लोन का 27 प्रतिशत था, जो पहले मेडिकल या एजुकेशन से आगे था। Gen Z के बीच ट्रैवल, गैजेट्स, फैशन और सोशल मीडिया पर दिखावे के लिए लोन लेना आम हो गया है। साथ ही, 39 प्रतिशत Gen Z ने 2024-2025 में बेसिक जरूरतों जैसे किराया, ग्रॉसरी और यूटिलिटी बिल्स के लिए भी लोन लिया, जो आय और खर्च के बीच बढ़ती खाई को दर्शाता है। हाई हाउसिंग प्राइसेज और जॉब मार्केट में अनिश्चितता ने युवाओं को घर खरीदने के सपने छोड़ने पर मजबूर किया है, जिससे वे शॉर्ट-टर्म प्लेजर या सरवाइवल के लिए कर्ज पर निर्भर हो रहे हैं। फिनटेक और NBFC ने छोटे टिकट साइज लोन (50 हजार से कम) को आसान बनाया है, जिससे युवा बिना सोचे-समझे मल्टीपल लोन ले लेते हैं, और बाद में रीपेमेंट में दिक्कत आती है।

डिफॉल्ट के मामले विशेष रूप से छोटे लोन में तेजी से बढ़े हैं। छोटे टिकट लोन (50 हजार से कम) में डेलिनक्वेंसी 25 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है, जबकि क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट Gen Z में 1.4 प्रतिशत से बढ़कर 1.8 प्रतिशत हो गया है। क्रेडिट ब्यूरो डेटा दिखाता है कि युवा उम्र वालों (30 साल से कम) में अर्ली-स्टेज डेलिनक्वेंसी (31-90 दिन ओवरड्यू) अन्य आयु वर्गों से ज्यादा है, खासकर क्रेडिट कार्ड, टू-व्हीलर और पर्सनल लोन में। NBFC और फिनटेक पोर्टफोलियो में स्ट्रेस ज्यादा है, जहां युवा अक्सर लोन को रोलओवर करने की बजाय डायरेक्ट डिफॉल्ट कर देते हैं। RBI ने 2023-2024 में असुरक्षित लोन पर रिस्क वेट बढ़ाए, जिससे बैंक लेंडिंग क्राइटेरिया सख्त किए, लेकिन फिर भी युवाओं में डिफॉल्ट ट्रेंड जारी है। कई युवा 50-54 लोन अकाउंट्स तक पहुंच जाते हैं, जहां छोटे-छोटे लोन मिलकर बड़ा बोझ बन जाते हैं।

EMI का बोझ युवाओं की फाइनेंशियल हेल्थ पर गहरा असर डाल रहा है। कई मामलों में EMI मासिक आय का 50 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है, जो RBI की सलाह से कहीं अधिक है कि कुल EMI 40 प्रतिशत से कम रहनी चाहिए। इससे युवा पे-चेक्स टू पे-चेक्स जीने लगते हैं, जहां कोई इमरजेंसी फंड या सेविंग्स नहीं बचती। लंबे टेन्योर वाले लोन से मंथली EMI कम होती है, लेकिन कुल इंटरेस्ट बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, छोटे लोन पर हाई इंटरेस्ट रेट (10-25 प्रतिशत) के कारण ब्याज बोझ बढ़ता है। युवा अक्सर नए लोन लेकर पुराने चुकाते हैं, जो डेट ट्रैप में फंसने का क्लासिक तरीका है। इससे क्रेडिट स्कोर गिरता है, भविष्य में अच्छे लोन मिलना मुश्किल होता है, और मेंटल स्ट्रेस बढ़ता है।

यह ट्रेंड सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टेमिक रिस्क भी पैदा कर रहा है। Gen Z भारत की फ्यूचर वर्कफोर्स है, और अगर उनकी फाइनेंशियल मैनेजमेंट कमजोर रही तो लॉन्ग-टर्म में सेविंग्स, इन्वेस्टमेंट और इकोनॉमिक ग्रोथ प्रभावित होगी। क्रेडिट मार्केट में युवाओं का हाई पार्टिसिपेशन अच्छा है, लेकिन बिना फाइनेंशियल लिटरेसी के यह खतरनाक हो जाता है। RBI की रिपोर्ट्स में हाउसहोल्ड डेट में तेज बढ़ोतरी दिखाई गई है, जहां कंजम्पशन लोन हाउसिंग या बिजनेस लोन से तेज बढ़ रहे हैं। प्राइवेट बैंक और NBFC ने युवाओं को टारगेट किया है, लेकिन रेगुलेटरी टाइटनिंग से कुछ सुधार आया है, जैसे कि पर्सनल लोन ग्रोथ स्लो होना। फिर भी, छोटे लोन में स्ट्रेस जारी है।

युवाओं को इस स्थिति से बचने के लिए फाइनेंशियल एजुकेशन जरूरी है। बजटिंग, इमरजेंसी फंड बनाना, और क्रेडिट यूज को लिमिट में रखना महत्वपूर्ण है। लोन लेने से पहले आय का 40 प्रतिशत से ज्यादा EMI न रखें, और BNPL या जीरो-कॉस्ट EMI का इस्तेमाल सावधानी से करें। अगर डिफॉल्ट हो रहा है, तो डेट रिजॉल्यूशन सर्विसेज या काउंसलिंग लें, पासवर्ड बदलें और क्रेडिट रिपोर्ट चेक करें। सोशल मीडिया के प्रभाव से बचें, जहां दिखावा लोन लेने को प्रोत्साहित करता है। लंबे समय में, जॉब स्टेबिलिटी और इनकम ग्रोथ पर फोकस करें ताकि कर्ज बोझ कम हो।

यह ट्रेंड भारत की इकोनॉमी के लिए अलार्मिंग है, क्योंकि युवा कंजम्प्शन ड्राइव कर रहे हैं, लेकिन डेट ट्रैप में फंसने से उनका योगदान कमजोर पड़ सकता है। RBI और क्रेडिट ब्यूरो लगातार मॉनिटर कर रहे हैं, और कुछ सेगमेंट में स्टेबलाइजेशन दिख रहा है, लेकिन युवाओं में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। सुरक्षित उधार और जिम्मेदार खर्च से ही यह संतुलन बन सकता है।

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